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Blog / 24 Apr 2026

भारत–रूस  पारस्परिक लॉजिस्टिक्स विनिमय समझौता

भारतरूस  पारस्परिक लॉजिस्टिक्स विनिमय समझौता

संदर्भ:

हाल ही में भारत और रूस ने पारस्परिक लॉजिस्टिक्स विनिमय समझौता (RELOS) को क्रियान्वित किया, जिसे फरवरी 2025 में हस्ताक्षरित किया गया था और बाद में रूस द्वारा इसका अनुमोदन किया गया। यह समझौता द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के विकास में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है, जो पारंपरिक हथियारों के आदान-प्रदान से आगे बढ़कर गहन परिचालन सहयोग की ओर जाता है।

RELOS के प्रमुख प्रावधान:

      • भारत और रूस के बीच पारस्परिक लॉजिस्टिक्स विनिमय समझौता (RELOS) एक-दूसरे के क्षेत्र में अधिकतम 3,000 सैनिकों की तैनाती की अनुमति देता है, साथ ही एक साथ अधिकतम पाँच युद्धपोत और दस विमानों की तैनाती भी संभव है।
      • यह समझौता प्रारंभिक रूप से पाँच वर्षों के लिए मान्य है और आपसी सहमति से इसे पाँच और वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है। यह नौसैनिक जहाजों के लिए बंदरगाह पहुँच, मरम्मत सेवाएँ और आवश्यक आपूर्ति सहित व्यापक लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करता है, साथ ही विमानों के लिए हवाई यातायात नियंत्रण, नेविगेशन सहायता और रखरखाव सुविधाएँ भी उपलब्ध कराता है।
      • इसके अतिरिक्त, यह समझौता संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण पहल तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत अभियानों के प्रावधानों को भी शामिल करता है, जिससे दोनों देशों के बीच परिचालन सहयोग और अधिक मजबूत होता है।

India–Russia RELOS Pact

समझौते का दायरा:

      • संयुक्त सैन्य अभ्यास
      • प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण
      • मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR)
      • सैन्य बलों की तैनाती
      • नौसैनिक अड्डों और हवाई अड्डों तक पहुँच, जिसमें आर्कटिक क्षेत्र भी शामिल हैं

रणनीतिक महत्व:

      • सैन्य लॉजिस्टिक्स में सुधार: भारत और रूस के बीच यह समझौता लॉजिस्टिक्स सहायता तक सुनिश्चित पहुँच प्रदान करके दीर्घकालिक सैन्य तैनाती को संभव बनाता है, साथ ही भारत द्वारा उपयोग किए जाने वाले रूसी मूल के उपकरणों के समय पर रखरखाव और सर्विसिंग को भी सुनिश्चित करता है।
      • आर्कटिक तक पहुँच: यह भारत को आर्कटिक क्षेत्र में स्थित रूसी सुविधाओं तक रणनीतिक पहुँच प्रदान करता है, जिससे वह ऐसे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा सकता है जो बढ़ते भू-राजनीतिक और आर्थिक महत्व का है।
      • परिचालन तत्परता: यह समझौता दोनों देशों की सेनाओं के बीच अंतर-संचालन क्षमता (interoperability) को बेहतर बनाता है और मिशनों तथा आपात स्थितियों में तेज़ तैनाती की क्षमता को मजबूत करता है।
      • रणनीतिक स्वायत्तता: तीसरे पक्ष पर लॉजिस्टिक्स और सहायता के लिए निर्भरता को कम करके यह समझौता बढ़ते वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की क्षमता को मजबूत करता है।

भारतरूस रक्षा संबंध:

      • भारत और रूस के बीच विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारीहै, जिसमें रक्षा सहयोग एक प्रमुख स्तंभ है।
      • सैन्य-तकनीकी सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के लगभग 60–70% सैन्य उपकरण रूसी/सोवियत मूल के हैं, जिनमें S-400 ट्रायम्फ, T-90 टैंक और Su-30MKI जैसे सिस्टम शामिल हैं।
      • यह साझेदारी अब संयुक्त विकास और उत्पादन की ओर विकसित हो चुकी है, जिसका उदाहरण ब्रह्मोस और AK-203 जैसी परियोजनाएँ हैं।
      • रक्षा संबंध भारत-रूस सैन्य और सैन्य-तकनीकी सहयोग पर अंतर-सरकारी आयोग (Intergovernmental Commission) के संस्थागत ढांचे द्वारा संचालित होते हैं।
      • नियमित संयुक्त अभ्यास जैसे INDRA अभ्यास दोनों देशों के बीच अंतर-संचालन क्षमता और परिचालन समन्वय को मजबूत करते हैं।

निष्कर्ष:

RELOS समझौता भारतरूस रक्षा संबंधों को खरीदारविक्रेता मॉडल से आगे बढ़ाकर गहन परिचालन और लॉजिस्टिक सहयोग की ओर ले जाता है। भू-राजनीतिक चुनौतियों और भारत के विविधीकरण प्रयासों के बावजूद, यह आपसी विश्वास और अंतर-संचालन क्षमता को मजबूत करता है। भारत के लिए यह सैन्य तैयारी, रणनीतिक पहुँच को बढ़ाता है और बहुध्रुवीय विश्व में उसकी रणनीतिक स्वायत्तता के लक्ष्य को सुदृढ़ करता है।