भारत की ऑनलाइन सेंसरशिप व्यवस्था का बढ़ता दायरा
संदर्भ:
भारत सरकार ऑनलाइन सामग्री को नियंत्रित करने की प्रणाली को विकेंद्रीकृत करने की योजना बना रही है, जिसके तहत गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय जैसे कई मंत्रालयों को आईटी अधिनियम के तहत सामग्री हटाने (टेकडाउन) के आदेश जारी करने की अनुमति दी जाएगी। वर्तमान में यह अधिकार मुख्यतः इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के पास है। इस कदम ने ऑनलाइन सेंसरशिप के बढ़ते दायरे और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं।
ऑनलाइन सेंसरशिप के बारे में:
भारत में ऑनलाइन सेंसरशिप मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत कानूनी प्रावधानों के माध्यम से लागू की जाती है। इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए वेबसाइट, यूआरएल और सोशल मीडिया सामग्री को ब्लॉक कर सकती हैं।
कानूनी ढांचा और तंत्र:
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- भारत में ऑनलाइन सामग्री का नियमन मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के माध्यम से किया जाता है।
- धारा 69A सरकार को संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कारणों से ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की अनुमति देती है।
- ब्लॉकिंग प्रक्रिया 2009 के नियमों के तहत एक समिति-आधारित प्रणाली द्वारा संचालित होती है।
- धारा 79(3)(b) के तहत एक अन्य तंत्र विभिन्न एजेंसियों को टेकडाउन नोटिस जारी करने की अनुमति देता है, विशेष रूप से ‘सहयोग’ पोर्टल के माध्यम से।
- धारा 69A सरकार को संप्रभुता, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कारणों से ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने की अनुमति देती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ मामले में धारा 69A को बरकरार रखा, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों पर जोर दिया।
- भारत में ऑनलाइन सामग्री का नियमन मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के माध्यम से किया जाता है।
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मुख्य प्रवृत्तियाँ और आँकड़े:
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- एक वर्ष में ‘सहयोग’ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को 2,300 से अधिक ब्लॉकिंग आदेश जारी किए गए।
- 2025 में सुरक्षा-संबंधी अभियानों के दौरान लगभग 8,000 खातों को ब्लॉक किया गया।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को अब 36 घंटे के बजाय 2–3 घंटे के भीतर सामग्री हटानी होती है।
- X (पूर्व में ट्विटर) जैसी कंपनियों ने 91% तक टेकडाउन अनुरोधों का पालन किया है, जो बढ़ते नियामक दबाव को दर्शाता है।
- उपयोगकर्ताओं ने यह भी रिपोर्ट किया है कि सख्त अनुपालन आवश्यकताओं के कारण व्यंग्यात्मक या आलोचनात्मक सामग्री भी हटाई जा रही है।
- एक वर्ष में ‘सहयोग’ पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को 2,300 से अधिक ब्लॉकिंग आदेश जारी किए गए।
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मुख्य समस्याएँ:
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- अत्यधिक सेंसरशिप और शक्तियों के दुरुपयोग का जोखिम
- पारदर्शिता की कमी (ब्लॉकिंग के कारण अक्सर सार्वजनिक नहीं किए जाते)
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर “चिलिंग इफेक्ट”
- मध्यस्थों (इंटरमीडियरी) पर सामग्री जल्दी हटाने का दबाव
- अत्यधिक सेंसरशिप और शक्तियों के दुरुपयोग का जोखिम
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आगे की राह:
ऑनलाइन सेंसरशिप को संतुलित बनाने के लिए अवैध सामग्री की स्पष्ट और सीमित परिभाषा तय करना आवश्यक है। साथ ही, न्यायिक निगरानी और समीक्षा तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए। ब्लॉकिंग आदेशों में पारदर्शिता बढ़ानी होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
निष्कर्ष:
भारत की ऑनलाइन सेंसरशिप व्यवस्था गलत सूचना, एआई सामग्री और सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए विस्तार कर रही है। हालांकि, एक निष्पक्ष डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी नियमन और लोकतांत्रिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

