संदर्भ:
हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने नेपाल की संसद में “भारत–नेपाल सीमा विवाद” विषय को उठाते हुए इसके समाधान के लिए चीन और ब्रिटेन की भागीदारी की मांग की। इसके प्रत्युत्तर में भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हुए दोहराया कि सीमा विवाद एक द्विपक्षीय विषय है, जिसका समाधान दोनों देशों के बीच विद्यमान कूटनीतिक तंत्र के माध्यम से किया जाना चाहिए।
विवाद की पृष्ठभूमि:
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- विवाद की जड़ें 1816 की सुगौली संधि में निहित हैं, जो आंग्ल–नेपाल युद्ध के उपरांत संपन्न हुई थी। इस संधि के अनुसार सीमा का निर्धारण महाकाली (काली) नदी के आधार पर किया गया था। नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल के अधिकार में तथा पश्चिम का क्षेत्र ब्रिटिश भारत के नियंत्रण में रखा गया था।
- विवाद का मुख्य कारण महाकाली नदी के वास्तविक उद्गम-स्थल के संबंध में अस्पष्टता है। नेपाल का मत है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, जबकि भारत इसे कालापानी–लिपुलेख क्षेत्र के समीप स्थित मानता है। इसी भिन्न व्याख्या के कारण कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों पर दोनों देशों के बीच परस्पर विरोधी दावे उत्पन्न हुए हैं।
- विवाद की जड़ें 1816 की सुगौली संधि में निहित हैं, जो आंग्ल–नेपाल युद्ध के उपरांत संपन्न हुई थी। इस संधि के अनुसार सीमा का निर्धारण महाकाली (काली) नदी के आधार पर किया गया था। नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल के अधिकार में तथा पश्चिम का क्षेत्र ब्रिटिश भारत के नियंत्रण में रखा गया था।
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नेपाल का दृष्टिकोण:
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- नेपाल का दावा है कि कालापानी, लिपुलेख तथा लिम्पियाधुरा महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं, अतः सुगौली संधि के अनुसार ये क्षेत्र नेपाल के अभिन्न अंग हैं।
- अपने दावे के समर्थन में नेपाल ऐतिहासिक मानचित्रों, प्रशासनिक अभिलेखों तथा नदी-प्रणाली संबंधी व्याख्याओं का उल्लेख करता है।
- वर्ष 2020 में नेपाल ने एक संशोधित राजनीतिक मानचित्र जारी किया, जिसमें इन क्षेत्रों को अपने भूभाग के रूप में दर्शाया गया। बाद में इस मानचित्र को नेपाल के संविधान में भी सम्मिलित कर लिया गया।
- नेपाल ने लिपुलेख मार्ग से संबंधित उन अवसंरचनात्मक परियोजनाओं तथा भारत–चीन समझौतों पर भी आपत्ति व्यक्त की है, जो उसकी भागीदारी के बिना संपन्न किए गए।
- नेपाल का दावा है कि कालापानी, लिपुलेख तथा लिम्पियाधुरा महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं, अतः सुगौली संधि के अनुसार ये क्षेत्र नेपाल के अभिन्न अंग हैं।
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भारत का दृष्टिकोण:
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- भारत विवादित क्षेत्र को उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा मानता है तथा इस क्षेत्र पर अपने दीर्घकालिक प्रशासनिक नियंत्रण को अपने दावे का आधार बताता है।
- भारत यह भी रेखांकित करता है कि 1954 से कैलाश–मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे का उपयोग किया जाता रहा है, जो इस क्षेत्र में ऐतिहासिक प्रशासनिक व्यवस्था और संपर्क का प्रमाण है।
- भारत का निरंतर मत रहा है कि इस विवाद का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और शांतिपूर्ण संवाद के माध्यम से किया जाना चाहिए। भारत नेपाल द्वारा जारी संशोधित मानचित्र को एकतरफा कदम मानता है तथा सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान हेतु वर्तमान कूटनीतिक तंत्र को ही उपयुक्त माध्यम मानता है।
- भारत विवादित क्षेत्र को उत्तराखंड राज्य का अभिन्न हिस्सा मानता है तथा इस क्षेत्र पर अपने दीर्घकालिक प्रशासनिक नियंत्रण को अपने दावे का आधार बताता है।
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सामरिक एवं भू-राजनीतिक महत्त्व:
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- विवादित क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत–नेपाल–चीन के ट्राई-जंक्शन के निकट स्थित है। इस क्षेत्र पर नियंत्रण का प्रभाव सीमा सुरक्षा, सैन्य रसद व्यवस्था तथा हिमालयी क्षेत्र में संपर्क एवं आवागमन पर पड़ता है।
- लिपुलेख दर्रा कैलाश–मानसरोवर यात्रा का एक प्रमुख मार्ग भी है, जिससे यह क्षेत्र सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है। इसके अतिरिक्त, इस मार्ग के माध्यम से भारत और चीन के बीच बढ़ते संपर्क एवं सहयोग ने नेपाल की सामरिक चिंताओं को और अधिक बढ़ा दिया है।
- विवादित क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत–नेपाल–चीन के ट्राई-जंक्शन के निकट स्थित है। इस क्षेत्र पर नियंत्रण का प्रभाव सीमा सुरक्षा, सैन्य रसद व्यवस्था तथा हिमालयी क्षेत्र में संपर्क एवं आवागमन पर पड़ता है।
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विवाद क्यों बना हुआ है?
यह विवाद अनेक कारणों से आज भी बना हुआ है:
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- महाकाली नदी के वास्तविक उद्गम-स्थल को लेकर अस्पष्टता।
- औपनिवेशिक काल के मानचित्रों की परस्पर विरोधी व्याख्याएँ।
- नेपाल में राष्ट्रवाद और संप्रभुता से जुड़ी संवेदनशीलताएँ।
- भारत और चीन के लिए इस क्षेत्र का सामरिक महत्त्व।
- हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना तथा संपर्क परियोजनाओं का विकास।
- इन सभी कारणों ने दोनों देशों के लिए सर्वमान्य समाधान तक पहुँचना कठिन बना दिया है।
- महाकाली नदी के वास्तविक उद्गम-स्थल को लेकर अस्पष्टता।
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आगे की राह:
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- भारत–नेपाल संयुक्त सीमा कार्य समूह को अधिक सशक्त बनाया जाए।
- GIS, उपग्रह चित्रों एवं वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर सीमा-निर्धारण को गति दी जाए।
- तकनीकी विशेषज्ञों के साथ संयुक्त सर्वेक्षण आयोग का गठन किया जाए।
- एकतरफा कदमों से बचते हुए द्विपक्षीय कूटनीतिक संवाद जारी रखा जाए।
- विश्वास-निर्माण उपायों, जन-से-जन संपर्कों एवं राजनीतिक वार्ताओं को बढ़ावा दिया जाए।
- बाहरी हस्तक्षेपों को सीमित रखते हुए विवाद का समाधान द्विपक्षीय स्तर पर किया जाए।
- व्यापार, संपर्क और जल संसाधन सहयोग के माध्यम से आपसी विश्वास को मजबूत किया जाए।
- भारत–नेपाल संयुक्त सीमा कार्य समूह को अधिक सशक्त बनाया जाए।
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निष्कर्ष:
ऐतिहासिक साक्ष्यों, वैज्ञानिक सर्वेक्षणों तथा निरंतर कूटनीतिक संवाद पर आधारित संतुलित दृष्टिकोण ही भारत-नेपाल सीमा विवाद के स्थायी, न्यायसंगत और दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान की दिशा में सबसे उपयुक्त मार्ग प्रदान कर सकता है।

