संदर्भ:
हाल के समय में भारत सरकार मखाना को उच्च-मूल्य वाली कृषि उपज और निर्यात वस्तु के रूप में बढ़ावा दे रही है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना तथा मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र योजना का उद्देश्य मखाना की खेती को आधुनिक बनाना, किसानों की आय बढ़ाना, मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना और निर्यात का विस्तार करना है।
मखाना क्या है?
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- मखाना, जिसका वैज्ञानिक नाम यूरयाले फेरोक्स (Euryale ferox) है, एक जलीय फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों में की जाती है। इसके खाने योग्य बीजों को भूनकर और फुलाकर वह प्रसिद्ध मखाना बनाया जाता है, जिसे सामान्यतः फॉक्स नट कहा जाता है।
- भारत, विश्व का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है। देश के कुल उत्पादन में बिहार का हिस्सा लगभग तीन-चौथाई है और विश्व की कुल आपूर्ति में बिहार की हिस्सेदारी लगभग 80–85 प्रतिशत है। मखाने की खेती मुख्य रूप से उत्तर बिहार में केंद्रित है, विशेषकर कोसी बेसिन के सुपौल, सहरसा और मधेपुरा जैसे जिलों में।
- मखाना, जिसका वैज्ञानिक नाम यूरयाले फेरोक्स (Euryale ferox) है, एक जलीय फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से उथले तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों में की जाती है। इसके खाने योग्य बीजों को भूनकर और फुलाकर वह प्रसिद्ध मखाना बनाया जाता है, जिसे सामान्यतः फॉक्स नट कहा जाता है।
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सरकारी पहल:
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- राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की घोषणा केंद्रीय बजट 2025–26 में की गई थी और सितंबर 2025 में बिहार में इसका शुभारंभ किया गया। इसका उद्देश्य मखाना की पूरी मूल्य शृंखला को मजबूत करना है।
- सरकार ने मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र योजना को भी मंजूरी दी है, जिसके लिए 2025–26 से 2030–31 तक ₹476.03 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसका मुख्य ध्यान निम्नलिखित क्षेत्रों पर है:
- गुणवत्तापूर्ण बीज और अनुसंधान
- किसानों का प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण
- बेहतर कटाई तथा कटाई के बाद प्रबंधन
- मूल्य संवर्धन और ब्रांड निर्माण
- विपणन और निर्यात
- गुणवत्ता नियंत्रण
- गुणवत्तापूर्ण बीज और अनुसंधान
- राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की घोषणा केंद्रीय बजट 2025–26 में की गई थी और सितंबर 2025 में बिहार में इसका शुभारंभ किया गया। इसका उद्देश्य मखाना की पूरी मूल्य शृंखला को मजबूत करना है।
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उत्पादन और बाजार की प्रवृत्तियाँ:
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- भारत ने 2024–25 में 63,910 मीट्रिक टन मखाना उत्पादन किया, जबकि 2025–26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार उत्पादन 80,590 मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। अकेले बिहार में 2025–26 के दौरान लगभग 60,000 मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान है।
- स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों की बढ़ती मांग तथा ब्रांडेड खाद्य पदार्थों के विस्तार के कारण घरेलू मांग तेजी से बढ़ी है। घरेलू मखाना बाजार के 2029–30 तक ₹11,000–12,000 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
- भारत ने 2024–25 में 63,910 मीट्रिक टन मखाना उत्पादन किया, जबकि 2025–26 के दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार उत्पादन 80,590 मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। अकेले बिहार में 2025–26 के दौरान लगभग 60,000 मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान है।
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निर्यात की संभावनाएँ:
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- भारत ने 2025–26 में 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य लगभग ₹192.96 करोड़ रहा। इसके प्रमुख बाजारों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
- हालाँकि, कुछ सीमित बाजारों पर निर्यात की अधिक निर्भरता जोखिम पैदा करती है। जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और नेपाल जैसे उच्च-मूल्य वाले बाजारों में प्रति इकाई अधिक कीमत प्राप्त होती है। इससे बाजारों में विविधता लाने और मखाना से अधिक मूल्य प्राप्त करने की पर्याप्त संभावना दिखाई देती है।
- भारत ने 2025–26 में 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य लगभग ₹192.96 करोड़ रहा। इसके प्रमुख बाजारों में संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
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पोषण संबंधी महत्व:
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- मखाने में प्रोटीन, आहार रेशा, कार्बोहाइड्रेट, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और लौह तत्व पाए जाते हैं। इसमें वसा और सोडियम की मात्रा कम होती है तथा इसमें कोलेस्ट्रॉल नहीं होता।
- इसका निम्न रक्त-शर्करा भार और प्रोटीन की उच्च पाचनशीलता इसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ के रूप में लोकप्रिय बनाने में सहायक रही है। इसी कारण मखाने की पहचान तेजी से एक स्वास्थ्यवर्धक और वनस्पति-आधारित सुपरफूड के रूप में बन रही है।
- मखाने में प्रोटीन, आहार रेशा, कार्बोहाइड्रेट, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस और लौह तत्व पाए जाते हैं। इसमें वसा और सोडियम की मात्रा कम होती है तथा इसमें कोलेस्ट्रॉल नहीं होता।
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मूल्य शृंखला और प्रौद्योगिकी:
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- मखाना की मूल्य शृंखला में खेती, कटाई, सुखाना, सफाई, भूनना, फुलाना, श्रेणीकरण, चमकाना, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
- पारंपरिक खेती अभी भी श्रम-प्रधान है, विशेषकर इसलिए क्योंकि मखाने की कटाई प्रायः पानी के भीतर हाथ से की जाती है।
- राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र (NRCM) उन्नत किस्मों, किसान प्रशिक्षण, मशीनों तथा बीज धोने वाली मशीन, श्रेणीकरण मशीन, भूनने वाली मशीन और मखाना फुलाने वाली मशीन जैसी आधुनिक तकनीकों के माध्यम से इस क्षेत्र के आधुनिकीकरण में सहायता कर रहा है।
- मखाना की मूल्य शृंखला में खेती, कटाई, सुखाना, सफाई, भूनना, फुलाना, श्रेणीकरण, चमकाना, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन जैसी प्रक्रियाएँ शामिल हैं।
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प्रमुख चुनौतियाँ:
अपार संभावनाओं के बावजूद मखाना क्षेत्र के सामने कई चुनौतियाँ हैं:
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- श्रम-प्रधान खेती और कटाई
- सीमित मशीनीकरण
- पारंपरिक प्रसंस्करण विधियाँ
- गुणवत्ता और श्रेणीकरण संबंधी समस्याएँ
- सीमित शीत-शृंखला और प्रसंस्करण अवसंरचना
- कुछ ही बाजारों में निर्यात का अत्यधिक संकेंद्रण
- मजबूत ब्रांड निर्माण और अंतरराष्ट्रीय मानकों की आवश्यकता
- श्रम-प्रधान खेती और कटाई
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निष्कर्ष:
मखाना एक पारंपरिक क्षेत्रीय फसल से वैश्विक बाजार में बिकने वाले सुपरफूड में परिवर्तन का उदाहरण प्रस्तुत करता है। बिहार इसके उत्पादन का केंद्र है। सरकारी सहयोग, तकनीकी नवाचार और स्वास्थ्यवर्धक वनस्पति-आधारित खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के माध्यम से मखाना क्षेत्र ग्रामीण रोजगार, किसानों की आय, मूल्य संवर्धन और कृषि निर्यात का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है।

