सन्दर्भ:
हाल ही में, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) ने सहकर्मी-समीक्षित (Peer-reviewed) पत्रिका ज़ूटैक्सा (Zootaxa) में "कैटलॉग ऑफ लेपिडोप्टेरा (तितलियाँ एवं पतंगे) ऑफ इंडिया" प्रकाशित किया है।
मुख्य निष्कर्ष:
भारत में लेपिडोप्टेरा की 13,703 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो विश्व में ज्ञात तितलियों एवं पतंगों की कुल विविधता का 8.25% प्रतिनिधित्व करती हैं। इनमें 1,417 तितलियाँ तथा 12,286 पतंगे शामिल हैं। इस कैटलॉग में 3,705 वंश (Genera), 240 उपकुल (Subfamilies), 102 कुल (Families) और 31 अधिपरिवार (Superfamilies) का दस्तावेजीकरण किया गया है, जो जैव विविधता अनुसंधान एवं संरक्षण के लिए एक प्रामाणिक आधार प्रदान करता है। इसमें जियोमेट्रोइडिया (Geometroidea) अधिपरिवार की 2,205 प्रजातियाँ भी दर्ज की गई हैं, जो इस अधिपरिवार की विश्व में ज्ञात प्रजातियों का 8.8% हैं।
लेपिडोप्टेरा क्या है?
लेपिडोप्टेरा वह कीट गण (Order) है जिसमें तितलियाँ और पतंगे शामिल होते हैं। इनमें कुछ समान विशेषताएँ होती हैं, जैसे पूर्ण कायांतरण (अंडा–लार्वा–प्यूपा–वयस्क), सूक्ष्म शल्कों (Scales) से ढके पंख तथा सूंड (Proboscis) कहलाने वाली कुंडलित भोजन नली। इन समानताओं के बावजूद, इनके व्यवहार एवं शारीरिक संरचना में महत्वपूर्ण अंतर होते हैं:
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- सक्रियता: तितलियाँ दिन में सक्रिय (दिवाचर) होती हैं, जबकि अधिकांश पतंगे रात में सक्रिय (निशाचर) होते हैं।
- स्पर्शक (Antennae): तितलियों के स्पर्शक गदा (Club) के आकार के होते हैं, जबकि पतंगों के स्पर्शक पंखदार या कंघी जैसे होते हैं।
- विश्राम की अवस्था में पंख: तितलियाँ अपने पंखों को सीधा ऊपर की ओर रखती हैं, जबकि पतंगे अपने पंखों को सपाट या तंबू के आकार में फैलाकर रखते हैं।
- प्यूपा अवस्था: तितलियाँ क्रिसेलिस (Chrysalis) बनाती हैं, जबकि पतंगे सामान्यतः रेशमी कोकून (Silk Cocoon) बनाते हैं।
- शरीर: तितलियों का शरीर पतला और चिकना होता है, जबकि पतंगों का शरीर सामान्यतः अधिक मोटा और रोयेंदार होता है।
- सक्रियता: तितलियाँ दिन में सक्रिय (दिवाचर) होती हैं, जबकि अधिकांश पतंगे रात में सक्रिय (निशाचर) होते हैं।
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पारिस्थितिक महत्व:
लेपिडोप्टेरा पारिस्थितिक तंत्र के कार्यों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। तितलियाँ दिन में फूलों का परागण करती हैं, जबकि पतंगे रात्रि में परागण करते हैं, जिससे निरंतर परागण सेवाएँ सुनिश्चित होती हैं। ये शाकाहारी, अपघट्य पदार्थों का उपभोग करने वाले (Detritivores) तथा पक्षियों, चमगादड़ों, सरीसृपों एवं अन्य कीटभक्षी जीवों के लिए महत्वपूर्ण भोजन स्रोत के रूप में भी कार्य करते हैं। आवास क्षरण, प्रदूषण तथा जलवायु परिवर्तन के प्रति इनकी संवेदनशीलता इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के उत्कृष्ट जैव-संकेतक (Bioindicators) बनाती है।
लेपिडोप्टेरा के लिए खतरे:
लेपिडोप्टेरा (तितलियाँ और पतंगे) वनों की कटाई, शहरीकरण तथा भूमि उपयोग में परिवर्तन के कारण होने वाले आवास विनाश से बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं, जिससे उनके प्रजनन एवं भोजन के स्थान कम हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन उनके वितरण, जीवन चक्र तथा आश्रयी पौधों के साथ उनकी अंतःक्रियाओं को बदल देता है, जबकि कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग सीधे लार्वा एवं वयस्कों को मार देता है। इसके अतिरिक्त, प्रकाश प्रदूषण निशाचर पतंगों के व्यवहार एवं दिशा-निर्धारण को बाधित करता है तथा आक्रामक पौधों की प्रजातियाँ देशज आश्रयी पौधों का स्थान ले लेती हैं, जिससे उनके अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
संरक्षण उपाय:
लेपिडोप्टेरा के संरक्षण के लिए वनों, घासभूमियों तथा अन्य प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का पुनर्स्थापन एवं संरक्षण आवश्यक है, जो उनके जीवन चक्र का समर्थन करते हैं। परागणकर्ता-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना, कीटनाशकों के उपयोग को कम करना तथा देशज वनस्पतियों का संरक्षण उनकी आबादी को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। जैव विविधता सूचीकरण के माध्यम से वैज्ञानिक निगरानी के साथ-साथ जन-जागरूकता एवं नागरिक विज्ञान (Citizen Science) पहलों से संरक्षण प्रयासों को सुदृढ़ किया जा सकता है तथा इन पारिस्थितिकीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कीटों के बारे में समझ को बेहतर बनाया जा सकता है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के बारे में:
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पहलू |
विवरण |
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स्थापना |
1916 |
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मुख्यालय |
कोलकाता |
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मंत्रालय |
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय |
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भूमिका |
भारत में जीव-जंतुओं के अन्वेषण, वर्गिकी (Taxonomy) तथा जैव विविधता आकलन के लिए प्रमुख संस्थान |
निष्कर्ष:
ZSI के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि हिमालय में बढ़ते तापमान के कारण तितलियों एवं पतंगों की कई प्रजातियाँ अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो रही हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को दर्शाता है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जारी अन्वेषणों के दौरान इस्ट्रियानिस लद्दाखेंसिस (Istrianis ladakhensis) जैसी नई स्थानिक (Endemic) प्रजातियों की खोज जारी है, जो भारत की समृद्ध, किंतु अभी भी कम अन्वेषित, लेपिडोप्टेरा विविधता को रेखांकित करती है।
