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Blog / 28 Feb 2026

भारत–इज़राइल संबंध: तकनीक, सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन

संदर्भ:

हाल ही में 25-26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इज़राइल की राजकीय यात्रा पर थे, इस दौरान, दोनों देशों की द्विपक्षीय संबंधों में शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी तक उन्नत करने की घोषणा की गई। यह कदम भारत–इज़राइल संबंधों को केवल रक्षा-केन्द्रित सहयोग से आगे बढ़ाकर एक व्यापक प्रौद्योगिकी-आधारित गठबंधन की दिशा में गुणात्मक परिवर्तन को दर्शाता है।

यात्रा के मुख्य बिंदु:

1. रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग
• दोनों देशों ने रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र में मजबूत साझेदारी की पुनः पुष्टि की, जिसमें उन्नत रक्षा सहयोग, संयुक्त विकास और उत्पादन, तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण शामिल हैं।
• आतंकवाद के विरुद्ध साझा रुख दोहराया, यह स्पष्ट करते हुए कि “दुनिया में इसका कोई स्थान नहीं है।”

2. महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियाँ
• कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, महत्वपूर्ण खनिज, साइबर सुरक्षा और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग हेतु एक महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर साझेदारी हुई।

3. आर्थिक और व्यापारिक सहयोग
• भारत और इज़राइल ने वर्ष के अंत तक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) को अंतिम रूप देने की दिशा में कार्य करने पर सहमति व्यक्त की, जिससे आर्थिक सहयोग को महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा।
• डिजिटल भुगतान सहयोग का विस्तार, जिसमें UPI प्रणालियों के परस्पर संयोजन के माध्यम से सीमा-पार वित्तीय एकीकरण को प्रोत्साहन।

4. कृषि और ग्रामीण विकास
• ऐतिहासिक रूप से भारत–इज़राइल संबंधों का प्रमुख स्तंभ रही कृषि साझेदारी का विस्तार किया जाएगा। इसमें उत्कृष्टता केंद्रों (Centres of Excellence) का विस्तार और “विलेजेज ऑफ एक्सीलेंस” की स्थापना शामिल है, ताकि इज़राइली कृषि तकनीकों को भारतीय खेतों तक पहुंचाया जा सके।

5. जनसंपर्क और श्रम गतिशीलता
• शिक्षा, संस्कृति, अनुसंधान और शैक्षणिक आदान-प्रदान में सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति।
• इज़राइल ने 2030 तक 50,000 अतिरिक्त भारतीय श्रमिकों को अनुमति देने पर सहमति व्यक्त की, जिससे रोजगार और आजीविका के अवसर बढ़ेंगे।

6. क्षेत्रीय पहल एवं बहुपक्षीय सहभागिता
• दोनों नेताओं ने I2U2 (भारत–इज़राइल–यूएई–अमेरिका) तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे ढांचों के अंतर्गत सहयोग पर बल दिया, जिससे संपर्क और आर्थिक एकीकरण को समर्थन मिलेगा।

India, Israel elevate ties to special strategic partnership; sign 16 MoUs -  The Economic Times

भारत–इज़राइल संबंधों का विकास:

    • भारत ने 1950 में इज़राइल को मान्यता दी, किंतु पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। शीत युद्ध की भू-राजनीतिक वास्तविकताएँ, गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की अग्रणी भूमिका तथा फिलिस्तीनी मुद्दे के प्रति नैतिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता—इन सभी ने दशकों तक संबंधों को सीमित रखा।
    • 1992 के बाद वैश्विक व्यवस्था बदली। सोवियत संघ का विघटन, आर्थिक उदारीकरण और नई सुरक्षा चुनौतियों ने भारत को व्यवहारिक कूटनीति की ओर अग्रसर किया। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इज़राइल ने कम समय में आवश्यक रक्षा उपकरण उपलब्ध कराए। उस संकट-क्षण ने विश्वास की नींव रखी।
    • 2017 में प्रधानमंत्री मोदी की इज़राइल यात्रा ने “डी-हाइफनेशन” नीति को औपचारिक रूप दिया अर्थात भारत इज़राइल के साथ अपने संबंधों को फिलिस्तीन प्रश्न से अलग रखकर देखेगा। इससे भारत को एक संतुलित त्रिकोणीय रणनीति अपनाने का अवसर मिला, जैसे- इज़राइल के साथ तकनीकी एवं रक्षा सहयोग, अरब देशों के साथ ऊर्जा और प्रवासी संबंध, तथा फिलिस्तीन के प्रति ऐतिहासिक समर्थन।

वर्तमान में भारत–इज़राइल संबंध एक सीमित रक्षा-आयात संबंध से आगे बढ़कर बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित हो चुके हैं, जिसमें शामिल हैं:
• उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग
• रक्षा सह-विकास
• व्यापार विस्तार
• जल और कृषि नवाचार
• I2U2 जैसे लघु-बहुपक्षीय ढांचे
• भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC)

रक्षा और तकनीक-आधारित गठबंधन:

      • भारत–इज़राइल संबंधों की रीढ़ रक्षा सहयोग रहा है। फाल्कन AWACS, हेरॉन और सर्चर ड्रोन, स्पाइडर वायु रक्षा प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरण जैसे प्लेटफॉर्म भारतीय सशस्त्र बलों की क्षमता वृद्धि में महत्वपूर्ण रहे हैं। बराक-8 मिसाइल प्रणाली का सह-विकास इस बात का प्रतीक है कि भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि सह-विकासक की भूमिका में है।
      • किन्तु वर्तमान उन्नयन का महत्व इस तथ्य में है कि संबंध अब केवल रक्षा-केन्द्रित नहीं रहे। “महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी साझेदारी” के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार किया गया है। यह सहयोग वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा के युग में भारत को रणनीतिक बढ़त दिला सकता है।
      • इज़राइल का स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र विश्व में अग्रणी माना जाता है। दूसरी ओर, भारत के पास विशाल डिजिटल आधार, कुशल मानव संसाधन और विनिर्माण क्षमता है। इन दोनों की पूरकता एक ऐसी तकनीकी साझेदारी को जन्म दे सकती है, जो केवल द्विपक्षीय लाभ तक सीमित न रहकर वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भी प्रभाव डाले।

आर्थिक आयाम:

      • द्विपक्षीय व्यापार 1992 के लगभग 200 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2024–25 में 3.75 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। फिर भी यह संभावनाओं की तुलना में सीमित है। प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (FTA) इस संभावनाशीलता को वास्तविकता में बदल सकता है।
      • हीरा व्यापार और रसायनों से आगे बढ़कर कृषि-प्रौद्योगिकी, जल प्रबंधन, रक्षा सह-उत्पादन, साइबर सुरक्षा और डिजिटल भुगतान जैसे क्षेत्रों में सहयोग आर्थिक संबंधों को नई ऊँचाई दे सकता है। UPI प्रणालियों के संभावित संयोजन से सीमा-पार भुगतान तंत्र में सहजता आएगी, जो भविष्य की डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार बन सकता है।

कृषि और जल संबंधित सहयोग:

      • भारत–इज़राइल सहयोग का एक अत्यंत व्यावहारिक आयाम कृषि और जल प्रबंधन है। भारत में स्थापित 43 उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) इज़राइली सटीक कृषि, ड्रिप सिंचाई और संरक्षित खेती तकनीकों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू कर रहे हैं।
      • जलवायु परिवर्तन और जल संकट की चुनौती के बीच, विलवणीकरण, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और समेकित जल प्रबंधन में सहयोग भारत के पश्चिमी और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार यह साझेदारी केवल सामरिक या आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय आयाम भी समेटे हुए है।

क्षेत्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य:

      • भारत–इज़राइल संबंधों का उन्नयन पश्चिम एशिया की व्यापक भू-राजनीति से अलग नहीं देखा जा सकता। I2U2 (भारत–इज़राइल–यूएई–अमेरिका) और भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसे मंच इस बात का संकेत हैं कि भारत बहुपक्षीय, लघु-बहुपक्षीय और संपर्क-आधारित कूटनीति के माध्यम से अपने भू-आर्थिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है।
      • IMEC जैसी परियोजनाएँ भारत को यूरोप से जोड़ने वाले वैकल्पिक मार्ग प्रदान कर सकती हैं, जिससे समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण को बढ़ावा मिलेगा।

चुनौतियाँ:

मजबूत प्रगति के बावजूद, कुछ संरचनात्मक चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

ईरान दुविधा
इज़राइल ईरान को अस्तित्वगत खतरा मानता है। भारत के लिए ईरान ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार बंदरगाह के माध्यम से संपर्क के लिए महत्वपूर्ण है। संतुलन बनाना जटिल है।

फिलिस्तीनी प्रश्न
भारत आधिकारिक रूप से दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करता है। मध्य पूर्व में तनाव के दौरान डी-हाइफनेशन नीति को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

चीन कारक
चीन एशिया में इज़राइल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है। इज़राइली अवसंरचना और तकनीकी क्षेत्रों में चीनी निवेश भारत के लिए रणनीतिक संवेदनशीलता उत्पन्न करता है।

बौद्धिक संपदा चिंताएँ
इज़राइली कंपनियाँ भारत की अपेक्षाकृत उदार IPR व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं। स्रोत कोड और गहन तकनीकी जानकारी के हस्तांतरण में हिचकिचाहट रक्षा स्वदेशीकरण को धीमा कर सकती है।

महापरियोजनाओं पर जोखिम
IMEC जैसे संपर्क परियोजनाएँ हाइफ़ा बंदरगाह जैसे अवसंरचना पर निर्भर हैं। क्षेत्रीय संघर्ष इनकी सुरक्षा और व्यवहार्यता को प्रभावित कर सकते हैं।

आगे की राह:

विशेष रणनीतिक साझेदारी को वास्तविक परिणामों में बदलने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक होंगे। पहला, रक्षा सह-उत्पादन और संयुक्त बौद्धिक संपदा स्वामित्व की दिशा में आगे बढ़ना। इससे आत्मनिर्भर भारत को बल मिलेगा। दूसरा, I2U2 और IMEC जैसे मंचों को संस्थागत रूप देना, ताकि संपर्क और ऊर्जा परियोजनाएँ स्थिरता के साथ आगे बढ़ सकें। तीसरा, नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार, जैसे- AI, सेमीकंडक्टर, हरित प्रौद्योगिकी और जल प्रबंधन में संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देना। चौथा, शैक्षणिक और ट्रैक-2 कूटनीति को मजबूत करना, ताकि जन-से-जन संपर्क और दीर्घकालिक विश्वास को बढ़ाया जा सके।

निष्कर्ष:

भारत–इज़राइल संबंधों को विशेष रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिलना 21वीं सदी की उस कूटनीति का प्रतीक है, जिसमें रक्षा, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यह साझेदारी भारत को पश्चिम एशिया में संतुलित, स्वायत्त और प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देती है। यदि दोनों देश चुनौतियों को संतुलन, पारदर्शिता और दीर्घकालिक दृष्टि से संभालते हैं, तो यह संबंध केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक तकनीकी और आर्थिक संरचना में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। विशेष रणनीतिक साझेदारी वास्तव में एक नई शुरुआत है जहाँ रक्षा सहयोग की ठोस नींव पर नवाचार, समृद्धि और शांति की व्यापक इमारत खड़ी की जा रही है।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न : रक्षा सहयोग से आगे बढ़ते हुए भारत–इज़राइल संबंध किस प्रकार प्रौद्योगिकी-आधारित साझेदारी में परिवर्तित हो रहे हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

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