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Blog / 25 Feb 2026

भारत में बढ़ती वैश्विक कीटनाशक विषाक्तता

संदर्भ:

हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि भारत उन चार देशों में शामिल है जो वैश्विक कीटनाशक विषाक्तता का लगभग 70 % योगदान करते हैं। इसे कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) के रूप में मापा गया, जिसमें कीटनाशकों की मात्रा और गैर-लक्षित प्रजातियों पर उनके प्रभाव दोनों को शामिल किया गया। अन्य प्रमुख योगदानकर्ता चीन, ब्राज़ील और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं। 

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

      • बढ़ती विषाक्तता: 2013–2019 के दौरान 65 देशों और 600 से अधिक कीटनाशकों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) लगातार बढ़ रही है, विशेषकर भारत जैसे बड़े कृषि अर्थतंत्रों में।
      • जैव-विविधता पर गंभीर प्रभाव: स्थलीय कीट, मिट्टी के सूक्ष्मजीव, मछलियाँ, परागण करने वाले जीव और जलीय पौधे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इससे पारिस्थितिकी तंत्र की मूलभूत प्रक्रियाएँ खतरे में पड़ रही हैं।
      • फसल पैटर्न और अधिक उपयोग: फल, सब्जियाँ, अनाज, चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर अधिक मात्रा और अधिक विषैले कीटनाशकों का प्रयोग पर्यावरणीय क्षति को बढ़ा रहा है।
      • कमज़ोर निगरानी तंत्र: कई देशों (विशेषकर विकासशील देशों) में कीटनाशक उपयोग का विस्तृत और पारदर्शी राष्ट्रीय डेटा उपलब्ध नहीं है, जिससे अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों की प्रगति का आकलन कठिन हो जाता है।
      • वर्तमान में चिली 2030 तक कीटनाशक जोखिम में 50 % कमी के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर एकमात्र देश है।  

Global Pesticide Toxicity

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव:

      • जैव-विविधता में गिरावट: कीट और मिट्टी के जीवों में विषाक्तता की वृद्धि से परागण, पोषक तत्व चक्र और खाद्य श्रृंखला पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
      • मानव स्वास्थ्य पर खतरा: कीटनाशकों का संबंध तंत्रिका तंत्र संबंधी रोगों, प्रजनन समस्याओं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जोड़ा गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा (UN Environment Assembly) सहित कई वैश्विक मंच 2035 तक अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने की मांग कर रहे हैं।

भारत में नीतिगत और कानूनी कमियाँ:

      • पुराना कानून: कीटनाशक अधिनियम, 1968 मुख्य रूप से कृषि उपयोग तक सीमित है। घरेलू, सार्वजनिक स्वास्थ्य या अन्य गैर-कृषि उपयोगों को समुचित रूप से शामिल नहीं किया गया है, जिससे यह वर्तमान परिस्थितियों में अपर्याप्त प्रतीत होता है।
      • प्रतिबंधित रसायनों का उपयोग: भारत में कम से कम 66 ऐसे कीटनाशक अभी भी उपयोग में हैं, जिन्हें अन्य देशों में प्रतिबंधित किया जा चुका है। इनमें अत्यधिक विषैला रसायन पेराक्वाट (Paraquat) भी शामिल है।
      • प्रस्तावित कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025: इसका उद्देश्य पर्यावरणीय जोखिम कम करना और जैव-कीटनाशकों को बढ़ावा देना है, किंतु यदि इसमें विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की पर्याप्त भागीदारी नहीं हुई तो इसका प्रभाव सीमित रह सकता है।

उच्च विषाक्तता के प्रमुख कारण:

      • हरित क्रांति की विरासत: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अत्यधिक निर्भर कृषि प्रणाली ने कीटनाशकों के निरंतर उपयोग को बढ़ावा दिया।
      • कृषि का तीव्रीकरण: अधिक फसल चक्र और एकल फसल प्रणाली (मोनोकल्चर) ने कीटों का दबाव बढ़ाया, जिससे रसायनों का उपयोग बढ़ा।
      • विकल्पों का सीमित प्रसार: एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और जैव-कीटनाशकों के उपयोग को व्यापक स्तर पर अपनाने में धीमी प्रगति हुई है।

नीतिगत प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ:

      • वैश्विक प्रतिबद्धता: भारत ने वैश्विक जैव-विविधता ढांचे के तहत 2030 तक कीटनाशक जोखिम को आधा करने का संकल्प लिया है, किंतु वर्तमान कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) रुझान दर्शाते हैं कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए और ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
      • बेहतर डेटा और पारदर्शिता: सक्रिय घटकों (Active Ingredients) के आधार पर कीटनाशकों के उपयोग की नियमित और सार्वजनिक रिपोर्टिंग आवश्यक है, ताकि अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सही मूल्यांकन हो सके।

निष्कर्ष:

वैश्विक कीटनाशक विषाक्तता में भारत की बड़ी हिस्सेदारी यह स्पष्ट करती है कि कृषि उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। बढ़ती विषाक्तता यह संकेत देती है कि व्यापक नीतिगत सुधार, प्रभावी निगरानी, टिकाऊ कीट प्रबंधन और सशक्त कानून लागू करना समय की मांग है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय लक्ष्यों के अनुरूप घरेलू नीतियों को सुदृढ़ बनाना ही पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।