भारत के मेंढक और उभयचर: स्थिति, खतरे और संरक्षण
संदर्भ:
प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को विश्व मेंढक दिवस (World Frog Day) मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य मेंढकों की विभिन्न प्रजातियों के महत्व और उनके संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना है। वैश्विक स्तर पर उभयचर सबसे अधिक संकटग्रस्त कशेरुकी समूह हैं, जिनकी लगभग 40.7% प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे में हैं। भारत, जो एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट है, में 450 से अधिक उभयचर प्रजातियाँ पाई जाती हैं, फिर भी यहाँ उच्च स्तर का खतरा और डेटा की कमी बनी हुई है, हालांकि संरक्षण प्रयासों में तेजी आ रही है।
मेंढकों का पारिस्थितिक महत्व:
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- मेंढक और अन्य उभयचर जलीय तथा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। उनका महत्व कई आयामों में समझा जा सकता है:
- कीट नियंत्रण: मेंढक बड़ी मात्रा में कीटों, विशेषकर कृषि कीटों का सेवन करते हैं, जिससे फसल उत्पादकता को समर्थन मिलता है।
- खाद्य श्रृंखला में भूमिका: ये पक्षियों, सरीसृपों और स्तनधारियों के लिए भोजन का स्रोत हैं, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।
- जैव संकेतक (Bioindicators): उनकी पारगम्य त्वचा और पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति संवेदनशीलता के कारण, उभयचर पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के प्रारंभिक संकेतक होते हैं।
- कीट नियंत्रण: मेंढक बड़ी मात्रा में कीटों, विशेषकर कृषि कीटों का सेवन करते हैं, जिससे फसल उत्पादकता को समर्थन मिलता है।
- उभयचरों के लुप्त होने से कई श्रृंखलाबद्ध प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं:
- कीटों की संख्या में वृद्धि, जिससे फसलों को नुकसान
- खाद्य श्रृंखला का विघटन, जिससे उच्च कशेरुकी प्रभावित होते हैं
- मीठे पानी और स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र का क्षरण
- कीटों की संख्या में वृद्धि, जिससे फसलों को नुकसान
- इस प्रकार, उभयचर संरक्षण केवल एक प्रजाति समूह की रक्षा नहीं, बल्कि पारिस्थितिक स्थिरता और खाद्य सुरक्षा बनाए रखने से भी जुड़ा है।
- मेंढक और अन्य उभयचर जलीय तथा स्थलीय पारिस्थितिक तंत्रों के बीच एक सेतु का कार्य करते हैं। उनका महत्व कई आयामों में समझा जा सकता है:
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भारत में स्थिति और प्रमुख खतरे:
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- भारत उभयचर विविधता में विश्व में छठे स्थान पर है, जहाँ 85% से अधिक प्रजातियाँ स्थानिक (endemic) हैं। हालांकि:
- लगभग 136–139 प्रजातियाँ संकटग्रस्त हैं
- लगभग 60% प्रजातियाँ डेटा-अभाव (data deficient) श्रेणी में हैं, जिससे संरक्षण योजना प्रभावित होती है
- पश्चिमी घाट सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहाँ “डांसिंग फ्रॉग्स” जैसी अत्यधिक संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं
- प्रमुख चुनौतियाँ हैं:
- जलवायु परिवर्तन (अब गिरावट का मुख्य कारण)
- आवास का विनाश और विखंडन
- काइट्रिड फंगल रोग (Batrachochytrium dendrobatidis)
- प्रदूषण, कीटनाशकों का उपयोग और सड़क दुर्घटनाएँ
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत सीमित कानूनी संरक्षण
- जलवायु परिवर्तन (अब गिरावट का मुख्य कारण)
- भारत उभयचर विविधता में विश्व में छठे स्थान पर है, जहाँ 85% से अधिक प्रजातियाँ स्थानिक (endemic) हैं। हालांकि:
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संरक्षण प्रयास:
भारत में अब वैज्ञानिक और सहभागितापूर्ण संरक्षण की ओर बदलाव देखा जा रहा है:
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- संस्थागत पहल: अभयारण्य, संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम, और नैतिक सुधार (जैसे विच्छेदन पर प्रतिबंध)
- परियोजनाएँ: केरल में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया का उभयचर पुनर्प्राप्ति परियोजना (Amphibian Recovery Project) संकटग्रस्त प्रजातियों पर केंद्रित है
- राज्य स्तरीय प्रयास: तमिलनाडु का संरक्षण कोष, जिसमें पर्पल फ्रॉग जैसी प्रजातियों को प्राथमिकता दी गई है।
- वैज्ञानिक नवाचार: CSIR-CCMB द्वारा बिना नुकसान पहुँचाए रोगों की निगरानी
- जन-सहभागिता: iNaturalist जैसे प्लेटफॉर्म, जो डेटा संग्रह में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।
- संस्थागत पहल: अभयारण्य, संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम, और नैतिक सुधार (जैसे विच्छेदन पर प्रतिबंध)
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ये प्रयास डेटा की कमी को दूर करने और संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक हैं।
आगे की राह:
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- अनुसंधान और दीर्घकालिक निगरानी को मजबूत करना
- वन्यजीव कानूनों के तहत कानूनी संरक्षण का विस्तार
- जलवायु रणनीतियों में उभयचर संरक्षण को शामिल करना
- नागरिक विज्ञान (Citizen Science) को बढ़ावा देना
- केवल आकर्षक प्रजातियों से आगे बढ़कर पारिस्थितिकी तंत्र आधारित संरक्षण अपनाना
- अनुसंधान और दीर्घकालिक निगरानी को मजबूत करना
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निष्कर्ष:
भारत के उभयचर देश की समृद्ध जैव-विविधता का प्रतीक हैं, साथ ही एक बड़ी संरक्षण चुनौती भी प्रस्तुत करते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान, नीतिगत समर्थन और जन-सहभागिता का समन्वय एक सकारात्मक दिशा प्रदान करता है। उभयचरों का संरक्षण न केवल जैव-विविधता के लिए आवश्यक है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

