भारत का पहला सैटेलाइट-टैग किया गया गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ
संदर्भ:
हाल ही में, भारत का पहला सैटेलाइट-टैग्ड (Satellite Tagged) गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ असम स्थित 1,302 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाले काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया।
इस पहल का महत्व:
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- यह सैटेलाइट-टैगिंग परियोजना, विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में, कछुए की मौसमी गतिविधियों, आवास उपयोग, प्रजनन क्षेत्रों और प्रजनन व्यवहार का अध्ययन करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
- यह पहल भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) द्वारा असम वन विभाग और काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान प्राधिकरण के सहयोग से संचालित की गई, जिसमें नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी का वित्तीय सहयोग भी शामिल है।
- इस परियोजना से संरक्षण अधिकारियों को बेहतर आवास प्रबंधन रणनीतियाँ बनाने और असम में मीठे पानी (freshwater) की जैव विविधता के संरक्षण को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
- यह सैटेलाइट-टैगिंग परियोजना, विशेष रूप से ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में, कछुए की मौसमी गतिविधियों, आवास उपयोग, प्रजनन क्षेत्रों और प्रजनन व्यवहार का अध्ययन करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
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गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ के बारे में:
गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ (Ganges Soft-Shell Turtle - Nilssonia gangetica) दक्षिण एशिया का मूल निवासी एक बड़ा मीठे पानी का कछुआ प्रजाति है। यह अपने सपाट चमड़े जैसे खोल, लंबी गर्दन और नलीनुमा थूथन (snout) के लिए जाना जाता है, जो इसे पानी के अंदर रहते हुए भी सांस लेने में मदद करता है।
प्रमुख विशेषताएँ:
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- इस कछुए का खोल जैतूनी हरा या हल्का मटमैला हरा होता है, जिसके किनारे पीले रंग के होते हैं।
- इसका खोल चपटा और लचीला होता है, जिससे यह पानी में तेजी से तैर सकता है।
- यह दुनिया के सबसे बड़े मीठे पानी के कछुओं में से एक है, जिसकी खोल की लंबाई 94 सेमी तक हो सकती है।
- यह सर्वाहारी (omnivorous) और मृतभक्षी (scavenging) प्रकृति का होता है, जो मछली, मेंढक, घोंघे (mollusks), जलीय पौधे, कीड़े और मृत जीवों को खाता है।
- इसकी एक महत्वपूर्ण पहचान इसके सिर के ऊपरी भाग पर पाया जाने वाला तीर के आकार (arrowhead-shaped) का निशान है।
- इस कछुए का खोल जैतूनी हरा या हल्का मटमैला हरा होता है, जिसके किनारे पीले रंग के होते हैं।
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आवास और वितरण:
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- यह प्रजाति दक्षिण एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों में पाई जाती है, जिनमें शामिल हैं:
- गंगा
- ब्रह्मपुत्र
- सिंधु
- यमुना
- महानदी
- गंगा
- यह गहरे, धीमी गति से बहने वाली नदियों, झीलों, जलाशयों, नहरों और रेत या कीचड़ वाले तल वाले जल क्षेत्रों में निवास करती है।
- भारत में असम को मीठे पानी के कछुओं के संरक्षण के लिए विश्व के प्रमुख (priority) क्षेत्रों में माना जाता है। भारत में पाई जाने वाली आठ सॉफ्ट-शेल कछुआ प्रजातियों में से पाँच काजीरंगा परिदृश्य (Kaziranga landscape) में दर्ज की गई हैं।
- यह प्रजाति दक्षिण एशिया की प्रमुख नदी प्रणालियों में पाई जाती है, जिनमें शामिल हैं:
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पारिस्थितिक महत्व:
गंगा सॉफ्ट-शेल कछुआ एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाता है, क्योंकि यह नदियों में सफाई (scavenger) और शिकारी (predator) के रूप में कार्य करता है। यह मृत और सड़ते हुए जैविक पदार्थों को खाकर मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में जल की गुणवत्ता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
संरक्षण स्थिति:
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- अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में संवेदनशील (Vulnerable) श्रेणी में सूचीबद्ध।
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के अंतर्गत संरक्षित।
- वन्य जीव एवं वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के परिशिष्ट I (Appendix I) में शामिल।
- अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में संवेदनशील (Vulnerable) श्रेणी में सूचीबद्ध।
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प्रमुख खतरे:
इस प्रजाति को कई प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ता है:
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- रेत खनन, बांध निर्माण और नदी प्रदूषण के कारण आवास का विनाश।
- मछली पकड़ने के जालों में आकस्मिक फँसकर मृत्यु।
- मांस और कछुए के पंजों से जुड़ी पारंपरिक मान्यताओं के कारण अवैध शिकार।
- मानवीय गतिविधियों के कारण मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र का लगातार क्षरण।
- रेत खनन, बांध निर्माण और नदी प्रदूषण के कारण आवास का विनाश।
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निष्कर्ष:
गंगा सॉफ्ट-शेल कछुए की सैटेलाइट टैगिंग भारत के मीठे पानी के संरक्षण प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल वन्यजीव प्रबंधन में तकनीक के बढ़ते उपयोग को दर्शाती है और दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता के लिए नदी तंत्र और संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करती है।
