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Blog / 01 May 2026

कांडला में भारत का पहला ग्रीन मेथेनॉल प्लांट

संदर्भ:

भारत गुजरात के कांडला स्थित दीनदयाल पोर्ट अथॉरिटी में अपना पहला ग्रीन मेथेनॉल उत्पादन संयंत्र विकसित कर रहा है। इस संयंत्र को थर्मैक्स लिमिटेड द्वारा अंकुर साइंटिफिक एनर्जी टेक्नोलॉजीज की गैसीफिकेशन तकनीक की मदद से विकसित किया जा रहा है।

परियोजना की मुख्य विशेषताएँ:

      • इस परियोजना में मुख्य रूप से आक्रामक (invasive) बायोमास का उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जा रहा है, विशेष रूप से Prosopis juliflora, जिसे गुजरात में गंडो बावल और उत्तर भारत में विलायती कीकर के नाम से जाना जाता है।
      • यह पौधा कच्छ के बन्नी घास के मैदानों में बड़े पैमाने पर फैल चुका है, जिससे देशी घासों का स्थान घटा है और जैव विविधता को नुकसान पहुँचा है। अब इस पर्यावरणीय चुनौती को स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।
      • यह संयंत्र गुजरात के कांडला पोर्ट पर स्थित है और इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 5 टन मेथेनॉल प्रतिदिन है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के ग्रीन पोर्ट्स की ओर संक्रमण को समर्थन देना और स्वच्छ शिपिंग ईंधन को बढ़ावा देना है, जिससे सतत विकास और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य पूरे किए जा सकें।
      • इस तकनीक में दो मुख्य चरण शामिल हैंगैसीफिकेशन और मेथेनॉल संश्लेषण। गैसीफिकेशन प्रक्रिया में बायोमास को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में गर्म करके सिंगैस (हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण) बनाया जाता है। इसके बाद दूसरे चरण में इस सिंगैस को प्रोसेस करके ग्रीन मेथेनॉल तैयार किया जाता है, जो पारंपरिक ईंधनों का एक स्वच्छ विकल्प है।

India’s First Green Methanol Plant at Kandla

ग्रीन मेथेनॉल क्या है?

ग्रीन मेथेनॉल एक कम-कार्बन वाला तरल ईंधन है, जिसे नवीकरणीय स्रोतों जैसे बायोमास (बायो-मेथेनॉल) या ग्रीन हाइड्रोजन और कैप्चर किए गए कार्बन डाइऑक्साइड (ई-मेथेनॉल) से तैयार किया जाता है। इसे पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों के एक टिकाऊ विकल्प के रूप में विकसित किया गया है।

पर्यावरणीय महत्व:

      • ग्रीन मेथेनॉल उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी लाता है:
        • लगभग 95% तक CO उत्सर्जन में कमी
        • लगभग 80% तक NO उत्सर्जन में कमी
        • सल्फर ऑक्साइड और कणीय प्रदूषण का लगभग पूर्ण उन्मूलन
      • इसे शिपिंग जैसे कठिन-से-डिकार्बोनाइज होने वाले क्षेत्रों के लिए एक प्रमुख संक्रमण ईंधन माना जाता है।

नीतिगत और वैश्विक संदर्भ:

      • यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के नियमों के अनुरूप है।
      • IMO के 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन लक्ष्य का समर्थन करता है।
      • भारत प्रमुख बंदरगाहों को कम-उत्सर्जन ग्रीन पोर्ट्समें बदल रहा है।
      • कांडला परियोजना सर्कुलर इकोनॉमी आधारित पोर्ट विकास का एक मॉडल है।

आर्थिक और रणनीतिक महत्व:

      • यह वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल को बढ़ावा देता है, जिसमें आक्रामक बायोमास को मूल्यवान ईंधन में बदला जाता है।
      • जीवाश्म ईंधनों पर आयात निर्भरता को कम करता है।
      • कृषि अवशेष (जैसे बैगास, कपास के डंठल) और नगर ठोस कचरे के उपयोग से विस्तार की संभावना है।
      • ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में सहायक है।

चुनौतियाँ:

      • जीवाश्म-आधारित मेथेनॉल की तुलना में उच्च उत्पादन लागत
      • बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे की सीमित उपलब्धता
      • बायोमास संग्रह के लिए जटिल आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन)
      • पायलट स्तर (5 TPD) से औद्योगिक स्तर तक तकनीक का विस्तार

भारत के लिए महत्व:

      • ग्रीन समुद्री ईंधन (maritime fuel) पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा में पहला कदम
      • यह निम्न लक्ष्यों के अनुरूप है:
        • नेट ज़ीरो उत्सर्जन प्रतिबद्धताएँ
        • राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा रणनीति
        • स्वच्छ बंदरगाह आधुनिकीकरण
      • जलवायु कार्रवाई के लिए आक्रामक प्रजातियों के नवाचारपूर्ण उपयोग का उदाहरण

निष्कर्ष:

कांडला ग्रीन मेथेनॉल परियोजना पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, स्वच्छ ऊर्जा नवाचार और समुद्री क्षेत्र के कार्बन उत्सर्जन में कमी का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। आक्रामक प्रजाति Prosopis juliflora को टिकाऊ ईंधन में बदलकर भारत एक चक्रीय और कम-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, साथ ही कच्छ जैसे क्षेत्रों में पारिस्थितिक क्षरण की समस्या का समाधान भी कर रहा है। यदि यह मॉडल सफलतापूर्वक बड़े पैमाने पर लागू होता है, तो यह अपशिष्ट बायोमास और आक्रामक प्रजातियों के राष्ट्रीय ऊर्जा प्रणाली में उपयोग के तरीके को पूरी तरह बदल सकता है।

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj