सन्दर्भ:
हाल के वर्षों में भारत का शीत-जल मत्स्य क्षेत्र तीव्र गति से नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) का एक महत्वपूर्ण घटक बनकर उभर रहा है। इसका विकास मुख्यतः हिमालयी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में केंद्रित है।
शीत-जल मत्स्यपालन के बारे में:
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- शीत-जल मत्स्यपालन उन उच्च पर्वतीय नदियों, जलधाराओं, झीलों तथा जलाशयों में किया जाता है, जहाँ जल का तापमान 5°C से 25°C के बीच रहता है, ऑक्सीजन का स्तर 6 mg/L से अधिक होता है तथा pH मान 6.5 से 8.0 के बीच रहता है।
- ये पारिस्थितिक तंत्र जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय और नागालैंड सहित पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के पर्वतीय क्षेत्रों में फैले हुए हैं। सामूहिक रूप से ये क्षेत्र लगभग 5.33 लाख वर्ग किलोमीटर पर्वतीय भूभाग को आच्छादित करते हैं।
- भारत में 278 से अधिक शीत-जल मछली प्रजातियों की पहचान की गई है, जो इनके पारिस्थितिक एवं संरक्षण महत्व को दर्शाती हैं।
- शीत-जल मत्स्यपालन उन उच्च पर्वतीय नदियों, जलधाराओं, झीलों तथा जलाशयों में किया जाता है, जहाँ जल का तापमान 5°C से 25°C के बीच रहता है, ऑक्सीजन का स्तर 6 mg/L से अधिक होता है तथा pH मान 6.5 से 8.0 के बीच रहता है।
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उत्पादन स्थिति एवं योगदान:
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- यद्यपि शीत-जल मत्स्यपालन भारत के कुल मत्स्य उत्पादन का केवल लगभग 3% हिस्सा है, फिर भी इसका महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
- शीत-जल मछली उत्पादन लगभग 7,000 मीट्रिक टन है, जिसमें ट्राउट मछली का योगदान लगभग 6,000 मीट्रिक टन है। प्रमुख प्रजातियों में रेनबो ट्राउट, स्नो ट्राउट तथा गोल्डन महासीर शामिल हैं। इनका पालन आधुनिक प्रणालियों जैसे हैचरी, रेसवे, पुनर्चक्रित जलीय कृषि प्रणाली (RAS) तथा बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से किया जाता है।
- ट्राउट उत्पादन में जम्मू-कश्मीर लगभग 3,010 मीट्रिक टन के साथ अग्रणी है, जिसके बाद हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड का स्थान आता है।
- यद्यपि शीत-जल मत्स्यपालन भारत के कुल मत्स्य उत्पादन का केवल लगभग 3% हिस्सा है, फिर भी इसका महत्व निरंतर बढ़ रहा है।
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सरकारी समर्थन एवं प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY):
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- सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के माध्यम से इस क्षेत्र को मजबूत नीतिगत समर्थन प्रदान किया है। योजना के कुल बजट का 25% से अधिक हिस्सा शीत-जल मत्स्यपालन के लिए आवंटित किया गया है।
- इन निवेशों में हैचरी, रेसवे, RAS इकाइयाँ, शीत भंडारण केंद्र, तालाब तथा परिवहन अवसंरचना का निर्माण शामिल है। इन पहलों से हिमालयी एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का उल्लेखनीय विकास हुआ है।
- सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के माध्यम से इस क्षेत्र को मजबूत नीतिगत समर्थन प्रदान किया है। योजना के कुल बजट का 25% से अधिक हिस्सा शीत-जल मत्स्यपालन के लिए आवंटित किया गया है।
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प्रौद्योगिकी एवं अवसंरचना विकास:
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- आधुनिक जलीय कृषि तकनीकों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है। RAS, बायोफ्लॉक प्रणाली तथा शीत-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स जैसी तकनीकों से उत्पादकता एवं स्थिरता में सुधार हुआ है।
- सामान्यतः ट्राउट पालन 1,500 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में किया जाता है, जबकि महासीर पालन अपेक्षाकृत कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
- अवसंरचना विकास के अंतर्गत हैचरी, परिवहन वाहन तथा शीत भंडारण प्रणाली विकसित की जा रही हैं, जिससे उत्पादन एवं विपणन अधिक प्रभावी बन सके।
- आधुनिक जलीय कृषि तकनीकों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन लाया है। RAS, बायोफ्लॉक प्रणाली तथा शीत-श्रृंखला लॉजिस्टिक्स जैसी तकनीकों से उत्पादकता एवं स्थिरता में सुधार हुआ है।
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भारत का मत्स्य क्षेत्र:
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- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग 8% योगदान देता है। यह क्षेत्र लगभग 3 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करता है तथा कृषि सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में 7.43% और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 1.1% योगदान देता है।
- आंतरिक मत्स्यपालन अब कुल उत्पादन का 75% से अधिक हिस्सा बन चुका है, जो इस क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है।
- भारत झींगा उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान पर है तथा वर्ष 2024–25 में ₹62,408 करोड़ मूल्य के समुद्री उत्पादों का निर्यात किया गया।
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग 8% योगदान देता है। यह क्षेत्र लगभग 3 करोड़ लोगों को आजीविका प्रदान करता है तथा कृषि सकल मूल्य संवर्धन (GVA) में 7.43% और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 1.1% योगदान देता है।
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निष्कर्ष:
यद्यपि भारत का शीत-जल मत्स्य क्षेत्र उत्पादन की दृष्टि से अपेक्षाकृत छोटा है, फिर भी इसका रणनीतिक महत्व अत्यंत व्यापक है। यह नीली अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने, संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र में सतत विकास को बढ़ावा देने तथा ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मजबूत नीतिगत समर्थन और आधुनिक तकनीकी एकीकरण के साथ यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में समावेशी एवं सतत आर्थिक विकास का एक प्रमुख आधार बन सकता है।

