संदर्भ:
हाल ही में ईरान द्वारा खाड़ी देशों और जॉर्डन पर किए गए हमलों की निंदा हेतु संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पारित एक प्रस्ताव का भारत ने सह-प्रायोजन (Co-Sponsors) किया है। यह कदम उस समय उठाया गया जब पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ रहा है। प्रस्ताव में तत्काल हिंसा रोकने की मांग की गई है और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकियों के विरुद्ध चेतावनी भी दी गई है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के बारे में:
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 2817 (2026) को पारित किया, जिसमें कहा गया कि ईरान ने अपने पड़ोसी देशों पर “गंभीर और अस्वीकार्य हमले” किए हैं। इन देशों में बहरीन, कुवैत, ओमान, क़तर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ:
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- ईरान से तुरंत सभी हमले रोकने की मांग की गई है।
- खाड़ी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की कड़ी निंदा की गई है।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी के विरुद्ध चेतावनी दी गई है, क्योंकि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है।
- ईरान से उकसाने वाली और क्षेत्र को अस्थिर करने वाली गतिविधियाँ बंद करने का आह्वान किया गया है।
- यह प्रस्ताव 13 मतों के समर्थन से पारित हुआ, जबकि चीन और रूस ने मतदान में भाग नहीं लिया।
- ईरान से तुरंत सभी हमले रोकने की मांग की गई है।
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प्रस्ताव का महत्व:
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- ऊर्जा सुरक्षा: भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर है।
- मुख्य तथ्य:
- भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है।
- भारत के लगभग 40–50 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात होर्मुज़ जलडमरूमध्य के मार्ग से होकर आता है।
- भारत के लगभग 85 प्रतिशत द्रवीकृत प्राकृतिक गैस का आयात भी इसी मार्ग से गुजरता है।
- प्रतिदिन लगभग 2.5–2.7 मिलियन बैरल कच्चा तेल इसी जलडमरूमध्य से होकर भारत तक पहुँचता है।
- इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था को बाधित कर सकता है और भारत में ईंधन की कीमतों में वृद्धि का कारण बन सकता है।
- भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है।
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य का महत्व: होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रणनीतिक मार्गों में से एक है।
- महत्वपूर्ण तथ्य:
- विश्व में होने वाली कुल पेट्रोलियम खपत का लगभग 20 प्रतिशत प्रतिदिन इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
- प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल तेल इस जलडमरूमध्य से होकर परिवहन किया जाता है।
- इस मार्ग से गुजरने वाले तेल का लगभग 89 प्रतिशत भाग एशियाई देशों को प्राप्त होता है।
- इस कारण इस क्षेत्र में अस्थिरता का प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
- विश्व में होने वाली कुल पेट्रोलियम खपत का लगभग 20 प्रतिशत प्रतिदिन इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
- खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासी: खाड़ी क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीयों की उपस्थिति के कारण यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- मुख्य तथ्य:
- लगभग 90 लाख भारतीय फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में रहते और काम करते हैं।
- विदेशों में रहने वाले भारतीयों से प्रतिवर्ष लगभग 125 अरब डॉलर से अधिक की धनराशि भारत की अर्थव्यवस्था में आती है।
- यदि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है तो इससे रोजगार, धन प्रेषण और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने की आवश्यकता जैसी चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- लगभग 90 लाख भारतीय फ़ारस की खाड़ी क्षेत्र में रहते और काम करते हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर है।
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भारत की कूटनीतिक स्थिति:
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- इस प्रस्ताव के समर्थन से यह स्पष्ट होता है कि भारत:
- अंतरराष्ट्रीय कानून और देशों की संप्रभुता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को महत्व देता है।
- पश्चिम एशिया में स्थिरता बनाए रखने का पक्षधर है, क्योंकि यह क्षेत्र भारत का महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है।
- ऊर्जा आपूर्ति मार्गों और समुद्री सुरक्षा की रक्षा करना चाहता है।
- अंतरराष्ट्रीय कानून और देशों की संप्रभुता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को महत्व देता है।
- साथ ही, भारत पारंपरिक रूप से ईरान और खाड़ी देशों दोनों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है। इसलिए इस स्थिति में कूटनीतिक संवाद और संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
- इस प्रस्ताव के समर्थन से यह स्पष्ट होता है कि भारत:
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निष्कर्ष:
ईरान की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का भारत द्वारा सह-प्रायोजन यह दर्शाता है कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता है, साथ ही अपनी ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा को भी प्राथमिकता देता है। यह कदम यह भी स्पष्ट करता है कि पश्चिम एशिया में प्रतिस्पर्धी शक्तियों के बीच संतुलित रणनीतिक संबंध बनाए रखना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती है।

