संदर्भ:
हाल ही में, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने सेना, नौसेना और वायुसेना के लिए लगभग 1.10 लाख करोड़ रुपये के रक्षा अधिग्रहण प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति (AoN),अर्थात सैद्धांतिक प्रशासनिक मंजूरी, प्रदान की। स्वीकृत खरीद का लगभग 98% भारतीय उद्योग से किया जाएगा, जिससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC):
-
-
- रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रमुख रक्षा खरीद और पूंजीगत अधिग्रहण से संबंधित मामलों में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है। इसका गठन 2001 में कारगिल युद्ध के बाद “राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली में सुधार” संबंधी मंत्रियों के समूह की सिफारिशों के बाद किया गया था।
- इसकी अध्यक्षता केंद्रीय रक्षा मंत्री करते हैं और यह थलसेना, नौसेना, वायुसेना तथा भारतीय तटरक्षक बल सहित सशस्त्र बलों की खरीद आवश्यकताओं को देखती है।
- रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत प्रमुख रक्षा खरीद और पूंजीगत अधिग्रहण से संबंधित मामलों में सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है। इसका गठन 2001 में कारगिल युद्ध के बाद “राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली में सुधार” संबंधी मंत्रियों के समूह की सिफारिशों के बाद किया गया था।
-
प्रमुख उद्देश्य एवं कार्य:
DAC का उद्देश्य सैन्य उपकरणों की समयबद्ध खरीद सुनिश्चित करना, परिचालन आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन बनाना तथा रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत को बढ़ावा देना है।
इसके प्रमुख कार्यों में शामिल हैं:
-
-
- आवश्यकता की स्वीकृति (AoN): प्रमुख खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले अनिवार्य सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान करना।
- खरीद का मार्ग: रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) के अंतर्गत भारतीय-स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित खरीद (Buy Indian-IDDM), खरीद एवं निर्माण (Buy & Make) तथा निर्माण (Make) जैसी श्रेणियाँ निर्धारित करना।
- दीर्घकालिक योजना: दीर्घकालिक सैन्य क्षमता-विकास योजनाओं के लिए मंजूरी और दिशा प्रदान करना।
- नीति निर्माण: पारदर्शिता, दक्षता और स्वदेशीकरण में सुधार के लिए खरीद प्रक्रियाओं में बदलाव की सिफारिश करना।
- आवश्यकता की स्वीकृति (AoN): प्रमुख खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले अनिवार्य सैद्धांतिक मंजूरी प्रदान करना।
-
प्रमुख रक्षा अधिग्रहण:
-
-
- भारतीय थलसेना: स्वीकृतियों में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल एवं परमाणु (CBRN) टोही वाहन, उच्च गतिशीलता वाहन, स्वचालित यांत्रिक बारूदी सुरंग बिछाने वाले वाहन, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, ट्रॉल टैंक तथा सर्वत्र पुल प्रणाली शामिल हैं। ये गतिशीलता, रसद, रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल एवं परमाणु तैयारी और युद्धक्षेत्र में संचालन क्षमता को बेहतर बनाएँगे।
- भारतीय नौसेना: नौसेना के लिए अरुध्र रडार तथा समुद्री गैस टर्बाइनों के डिजाइन, विकास और बाद में खरीद को मंजूरी दी गई है। स्वदेशी समुद्री गैस टर्बाइन महत्वपूर्ण युद्धपोत प्रणोदन के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
- भारतीय वायुसेना: स्वीकृतियों में लड़ाकू विमान, परिवहन विमान और हेलीकॉप्टरों से संबंधित क्षमताएँ, साथ ही भूमि-आधारित बहुउद्देश्यीय जैमर (GBMPJ) और रक्षा बल सुरक्षित अभिगम कार्ड (DEFSAC) प्रणाली शामिल हैं।
- भारतीय थलसेना: स्वीकृतियों में रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल एवं परमाणु (CBRN) टोही वाहन, उच्च गतिशीलता वाहन, स्वचालित यांत्रिक बारूदी सुरंग बिछाने वाले वाहन, उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, ट्रॉल टैंक तथा सर्वत्र पुल प्रणाली शामिल हैं। ये गतिशीलता, रसद, रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल एवं परमाणु तैयारी और युद्धक्षेत्र में संचालन क्षमता को बेहतर बनाएँगे।
-
आत्मनिर्भर भारत के लिए महत्व:
-
-
- लगभग 98% भारतीय स्रोतों से खरीद इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इससे:
- विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी।
- घरेलू रक्षा विनिर्माण को मजबूती मिलेगी।
- स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा मिलेगा।
- रोजगार सृजन और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को मजबूती मिलेगी।
- भारत की रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ेगी।
- भविष्य के रक्षा निर्यात को समर्थन मिलेगा।
- विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम होगी।
- भारत का रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जबकि रक्षा निर्यात 38,424 करोड़ रुपये रहा, जो देश के बढ़ते घरेलू रक्षा तंत्र को दर्शाता है।
- लगभग 98% भारतीय स्रोतों से खरीद इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। इससे:
-
निष्कर्ष:
1.10 लाख करोड़ रुपये की स्वीकृतियाँ केवल सैन्य आधुनिकीकरण तक सीमित नहीं हैं। 98% घरेलू खरीद के साथ ये भारत के परिचालन तैयारियों और रणनीतिक आत्मनिर्भरता के दोहरे उद्देश्यों को आगे बढ़ाती हैं। स्वदेशी डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास तथा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में निरंतर निवेश भारत को एक बड़े रक्षा आयातक से वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी रक्षा प्रौद्योगिकी एवं विनिर्माण शक्ति में बदलने के लिए आवश्यक होगा।

