संदर्भ:
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत ने चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बनने की उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2024–25 में भारत का कुल चावल उत्पादन 150.18 मिलियन टन दर्ज किया गया, जबकि इसी अवधि में चीन का उत्पादन 145.28 मिलियन टन रहा। यह महत्वपूर्ण उपलब्धि कृषि क्षेत्र में निरंतर नीतिगत समर्थन, किसानों की मेहनत और आधुनिक कृषि तकनीकों के सफल उपयोग का परिणाम है।
पृष्ठभूमि:
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- ऐतिहासिक रूप से चीन लंबे समय तक वैश्विक चावल उत्पादन में अग्रणी देश रहा है। इसका प्रमुख कारण वहाँ प्रति हेक्टेयर अधिक उपज, उन्नत कृषि मशीनीकरण और आधुनिक कृषि इनपुट्स का व्यापक उपयोग रहा। धीरे-धीरे भारत ने इस अंतर को कम किया। इसके पीछे चावल की खेती वाले क्षेत्र का विस्तार, सिंचाई सुविधाओं में निरंतर सुधार, उच्च उपज देने वाली किस्मों को अपनाना और सरकार की सहायक व प्रोत्साहनकारी नीतियाँ अहम भूमिका में रहीं।
- भारत में चावल की खेती मुख्यतः खरीफ मौसम में होती है, जिसमें बुआई जून–जुलाई के दौरान और कटाई नवंबर–दिसंबर में की जाती है। पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, बिहार, असम, तमिलनाडु तथा पूर्वोत्तर भारत के कई राज्य प्रमुख चावल उत्पादक क्षेत्र हैं। चावल का उत्पादन न केवल देश की घरेलू खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करता है, बल्कि निर्यात मांग को पूरा करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।
- ऐतिहासिक रूप से चीन लंबे समय तक वैश्विक चावल उत्पादन में अग्रणी देश रहा है। इसका प्रमुख कारण वहाँ प्रति हेक्टेयर अधिक उपज, उन्नत कृषि मशीनीकरण और आधुनिक कृषि इनपुट्स का व्यापक उपयोग रहा। धीरे-धीरे भारत ने इस अंतर को कम किया। इसके पीछे चावल की खेती वाले क्षेत्र का विस्तार, सिंचाई सुविधाओं में निरंतर सुधार, उच्च उपज देने वाली किस्मों को अपनाना और सरकार की सहायक व प्रोत्साहनकारी नीतियाँ अहम भूमिका में रहीं।
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जलवायु आवश्यकताएँ और खेती की विधियाँ:
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- चावल की फसल के लिए 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान, अधिक आर्द्रता और लगभग 100–200 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है। यह फसल समतल भूमि तथा पानी को लंबे समय तक रोकने वाली दोमट या चिकनी मिट्टी में सबसे अच्छी तरह विकसित होती है।
- पानी और श्रम लागत को कम करने के उद्देश्य से किसान अब तेजी से सीधे बुवाई की विधि (डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस) को अपना रहे हैं। इसके साथ ही जीनोम-संपादित चावल की नई किस्में, जैसे ‘कमला’ और ‘पूसा डीएसटी’, ने उपज क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ जल उपयोग की दक्षता में भी सुधार किया है। चावल सघनता प्रणाली, यद्यपि श्रम-प्रधान है, फिर भी यह बीज और पानी की आवश्यकता को काफी हद तक घटाती है और जलवायु दबाव वाले क्षेत्रों में एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प के रूप में उभर रही है।
- चावल की फसल के लिए 25 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान, अधिक आर्द्रता और लगभग 100–200 सेंटीमीटर वर्षा की आवश्यकता होती है। यह फसल समतल भूमि तथा पानी को लंबे समय तक रोकने वाली दोमट या चिकनी मिट्टी में सबसे अच्छी तरह विकसित होती है।
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उच्च चावल उत्पादकता के प्रमुख कारण:
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- विज्ञान आधारित कृषि: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसे अग्रणी अनुसंधान संस्थानों ने अधिक उपज देने वाली, जलवायु-सहिष्णु तथा कम अवधि में तैयार होने वाली चावल की उन्नत किस्में विकसित की हैं। हाल ही में उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से 184 नई फसल किस्में जारी की गईं।
- नीतिगत समर्थन: न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुनिश्चित व्यवस्था, सिंचाई ढाँचे का निरंतर विस्तार तथा प्रभावी बीज वितरण प्रणाली जैसी सरकारी पहलों ने किसानों को चावल की खेती अपनाने और उसका विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
- खाद्य सुरक्षा और निर्यात: मजबूत घरेलू उत्पादन से देश की खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ होती है। साथ ही, भारत विश्व के प्रमुख चावल निर्यातकों में अपनी स्थिति और मजबूत करता है, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जन बढ़ता है और अंतरराष्ट्रीय कृषि बाजारों में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ता है।
- विज्ञान आधारित कृषि: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसे अग्रणी अनुसंधान संस्थानों ने अधिक उपज देने वाली, जलवायु-सहिष्णु तथा कम अवधि में तैयार होने वाली चावल की उन्नत किस्में विकसित की हैं। हाल ही में उत्पादकता बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से 184 नई फसल किस्में जारी की गईं।
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उपलब्धि का महत्व:
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- वैश्विक खाद्य सुरक्षा: चावल उत्पादन में भारत की अग्रणी भूमिका वैश्विक खाद्य प्रणाली को मजबूती और स्थिरता प्रदान करेगी, विशेष रूप से एशिया जैसे क्षेत्रों में, जहाँ चावल मुख्य आहार है।
- आर्थिक प्रभाव: अधिक उत्पादन से घरेलू खाद्य कीमतों में स्थिरता आती है, ग्रामीण आजीविका को सहारा मिलता है और वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की भागीदारी बढ़ती है।
- कृषि नेतृत्व: यह उपलब्धि वैश्विक कृषि मंच पर भारत के बढ़ते प्रभाव और नेतृत्व को रेखांकित करती है तथा यह प्रमाणित करती है कि नीति निरंतरता, आधुनिक तकनीकों का प्रभावी उपयोग और किसानों की सक्रिय भागीदारी मिलकर बड़े और टिकाऊ परिणाम दे सकती हैं।
- वैश्विक खाद्य सुरक्षा: चावल उत्पादन में भारत की अग्रणी भूमिका वैश्विक खाद्य प्रणाली को मजबूती और स्थिरता प्रदान करेगी, विशेष रूप से एशिया जैसे क्षेत्रों में, जहाँ चावल मुख्य आहार है।
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चुनौतियाँ:
इस उल्लेखनीय सफलता के बावजूद भारत में प्रति हेक्टेयर चावल की औसत उपज अब भी चीन की तुलना में कम बनी हुई है। इसके अलावा, चावल की खेती अत्यधिक जल-आधारित है, जिसके कारण भूजल स्तर में गिरावट, मिट्टी की उर्वरता में कमी और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी चिंताएँ लगातार बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सटीक कृषि तकनीकों को अपनाने, टिकाऊ और कुशल जल प्रबंधन को बढ़ावा देने, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने तथा कृषि मशीनीकरण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष:
दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक बनना भारत के लिए वैज्ञानिक नवाचार, नीति निरंतरता और किसानों की मेहनत का प्रमाण है। यह उपलब्धि न केवल वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करती है, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ बनाती है। अब विकास का अगला चरण टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर आधारित होना चाहिए, ताकि लंबे समय तक उत्पादन बना रहे, पर्यावरण सुरक्षित रहे और पारिस्थितिक संतुलन कायम रह सके।

