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Blog / 09 Jan 2026

भारत बना जैव-बिटुमेन का वाणिज्यिक उत्पादन करने वाला विश्व का पहला देश

संदर्भ:

हाल ही में भारत, सड़क निर्माण में उपयोग के लिए जैव-बिटुमेन (Bio Bitumen) का वाणिज्यिक उत्पादन करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि की घोषणा नई दिल्ली में आयोजित एक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम में की गई। यह पहल सीएसआईआरकेंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) और सीएसआईआरभारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित एक स्वदेशी नवाचार का परिणाम है, जिसने यह सिद्ध किया कि कृषि अपशिष्ट को उच्च-मूल्य निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है। मेघालय में जोराबाटशिलांग एक्सप्रेसवे (एनएच-40) पर 100 मीटर लंबे परीक्षण खंड ने वास्तविक सड़क निर्माण में जैव-बिटुमेन की व्यवहार्यता को प्रमाणित किया।

जैव-बिटुमेन के बारे में:

      • जैव-बिटुमेन एक जैव-बाइंडर है, जिसे धान की पराली जैसे कृषि अथवा बायोमास अवशेषों से पायरोलिसिस नामक तापीय प्रक्रिया के माध्यम से तैयार किया जाता है।
        इस प्रक्रिया में बायोमास को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में गर्म किया जाता है, जिससे यह बायो-ऑयल, गैस और चार (char) में टूट जाता है। प्राप्त बायो-ऑयल को परिष्कृत कर पारंपरिक पेट्रोलियम बिटुमेन के साथ मिश्रित किया जाता है और फिर डामर (asphalt) निर्माण में उपयोग किया जाता है।
      • जैव-बिटुमेन को पेट्रोलियम बिटुमेन के साथ 20–30% तक मिश्रित किया जा सकता है और यह टिकाऊपन, रटिंग, दरारें तथा नमी प्रतिरोध जैसे मानकों पर कठोर परीक्षणों के बाद प्रदर्शन मानकों को पूरा करता है।

Soon, national highways to be built with bio-bitumen made using biomas?  Nitin Gadkari personally overseeing the project - Times of India

इस उपलब्धि के प्रभाव:

1. पर्यावरणीय लाभ
पराली जलाने का एक वैकल्पिक उपयोग प्रदान कर वायु प्रदूषण को कम करता है।
जीवाश्म-आधारित बिटुमेन की तुलना में जीवन-चक्र कार्बन उत्सर्जन को घटाता है और स्वच्छ, हरित राजमार्गों के निर्माण में सहायक है।

2. आर्थिक और रणनीतिक लाभ
आयातित बिटुमेन पर निर्भरता कम करता है, जिस पर भारत वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग ₹25,000–₹30,000 करोड़ खर्च करता है।
केवल 15% जैव-बिटुमेन मिश्रण से भी विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है तथा कृषि अपशिष्ट को मूल्यवान संसाधन में बदलकर ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा मिलता है।

परिपत्र अर्थव्यवस्था और ग्रामीण लाभ:

• अपशिष्ट से मूल्य सृजन कर परिपत्र अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों के अनुरूप है और संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
किसानों के लिए नई आय के स्रोत खोलता है तथा बायोमास संग्रह और प्रसंस्करण के माध्यम से ग्रामीण रोजगार को समर्थन देता है।

नीति और विकास से जुड़ाव:

      • जैव-बिटुमेन विकसित भारत 2047 की परिकल्पना में योगदान देता है, जो सततता, आत्मनिर्भरता और तकनीकी नवाचार को एकीकृत करता है।
      • विज्ञान-सरकार-उद्योग सहयोग का प्रभावी उदाहरण प्रस्तुत करता है, जिसमें सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय का समर्थन शामिल है।
      • जीवाश्म ईंधन आयात घटाकर और सतत सामग्री में घरेलू क्षमता बढ़ाकर आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों को मजबूती देता है।

चुनौतियाँ:

      • राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन का विस्तार करने के लिए ऐसी नीतिगत रूपरेखाओं की आवश्यकता होगी जो जैव-बिटुमेन मिश्रण मानकों को अनिवार्य बनाएं और सार्वजनिक अवसंरचना में इसके उपयोग को प्रोत्साहित करें।
      • बायोमास कच्चे माल की आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करना, मौसमी उतार-चढ़ाव का समाधान करना तथा पायरोलिसिस संयंत्रों के लिए लॉजिस्टिक्स विकसित करना व्यापक अपनाने के लिए आवश्यक होगा।

निष्कर्ष:
जैव-बिटुमेन का वाणिज्यिक उत्पादन भारत के लिए सतत अवसंरचना नवाचार की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है, जिसके पर्यावरणीय, आर्थिक और रणनीतिक लाभ हैं। यद्यपि यह उपलब्धि हरित प्रौद्योगिकी अपनाने में भारत के नेतृत्व को दर्शाती है, लेकिन वास्तविक प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए नीतिगत समावेशन, उत्पादन के विस्तार और राष्ट्रीय राजमार्ग कार्यक्रमों में इसके एकीकरण की आवश्यकता होगी, ताकि उत्सर्जन में कमी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण और आत्मनिर्भर विकास के लक्ष्य हासिल किए जा सकें।