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Blog / 20 Jul 2026

भारत में खराब कोलेस्ट्रॉल का संकट: 10 में से लगभग 9 वयस्कों में लिपिड का स्तर असामान्य है।

संदर्भ:

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR)-INDIAB सर्वेक्षण के तहत किए गए एक हालिया राष्ट्रव्यापी अध्ययन से पता चला है कि भारत के 87.3% वयस्कों में कम से कम एक असामान्य लिपिड (वसा) पैरामीटर पाया गया है, जो बढ़ते सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को दर्शाता है।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

      • अध्ययन में पाया गया कि लो हाई-डेंसिटी लिपोप्रोटीन (HDL), जिसे आमतौर पर "अच्छा कोलेस्ट्रॉल" कहा जाता है, सबसे अधिक पाई जाने वाली लिपिड असामान्यता है, जो लगभग दो-तिहाई वयस्कों को प्रभावित करती है।
      • अध्ययन में लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन (LDL) या "खराब कोलेस्ट्रॉल" के उच्च स्तर, बढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स और उच्च कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर की भी जानकारी दी गई।
      • चिंताजनक रूप से, लगभग 35.5 करोड़ भारतीय, जिनका शरीर का वजन, रक्तचाप और रक्त शर्करा सामान्य है, फिर भी असामान्य लिपिड स्तर से प्रभावित हैं। यह इस धारणा को चुनौती देता है कि केवल मोटापे या मधुमेह से पीड़ित लोग ही जोखिम में होते हैं।
      • लिपिड असामान्यता की सबसे अधिक व्यापकता 30–39 वर्ष आयु वर्ग के वयस्कों में देखी गई, जबकि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इसका बोझ थोड़ा अधिक पाया गया।

India's Bad Cholesterol Crisis

डिस्लिपिडेमिया (Dyslipidemia) क्या है?

      • डिस्लिपिडेमिया रक्त में वसा (लिपिड) की असामान्य सांद्रता को दर्शाता है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
        • उच्च LDL कोलेस्ट्रॉल।
        • कम HDL कोलेस्ट्रॉल।
        • उच्च ट्राइग्लिसराइड्स।
        • बढ़ा हुआ कुल कोलेस्ट्रॉल।
        • चूंकि इसमें आमतौर पर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते, इसलिए इसे अक्सर "मौन महामारी" कहा जाता है।
      • समय के साथ ये असामान्यताएं धमनियों में प्लाक के निर्माण (Atherosclerosis) का कारण बनती हैं, जिससे हृदयाघात, स्ट्रोक और अन्य हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है।

बढ़ते बोझ के कारण:

      • अध्ययन के अनुसार, भारत में डिस्लिपिडेमिया की उच्च व्यापकता के पीछे आनुवंशिक प्रवृत्ति और जीवनशैली से जुड़े कारकों का संयुक्त प्रभाव है।
      • दक्षिण एशियाई लोगों में स्वाभाविक रूप से:
        • HDL का स्तर कम,
        • और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अधिक होने की प्रवृत्ति होती है।
        • यह जोखिम निम्नलिखित कारणों से और बढ़ जाता है:
        • कार्बोहाइड्रेट से भरपूर आहार।
        • अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन।
        • शारीरिक निष्क्रियता।
        • मोटापा।
        • तंबाकू का सेवन।
        • बढ़ता शहरीकरण।
      • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच का अंतर कम होना यह दर्शाता है कि अस्वास्थ्यकर जीवनशैली अब ग्रामीण भारत में भी तेजी से फैल रही है।

आगे की राह:

      • ये निष्कर्ष युवाओं सहित सभी लोगों में समय पर और सार्वभौमिक लिपिड जांच की आवश्यकता को दर्शाते हैं, न कि केवल मधुमेह या मोटापे से पीड़ित व्यक्तियों तक जांच को सीमित करने की।
      • सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलों को निम्नलिखित को बढ़ावा देना चाहिए:
        • संतुलित आहार।
        • नियमित शारीरिक गतिविधि।
        • तंबाकू छोड़ना।
        • रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और ट्रांस फैट का कम सेवन।
      • राष्ट्रीय गैर-संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (NP-NCD), आयुष्मान आरोग्य मंदिर और ईट राइट इंडिया जैसे कार्यक्रमों को मजबूत करने से जागरूकता और शुरुआती पहचान में सुधार किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

ICMR अध्ययन इस बात को रेखांकित करता है कि डिस्लिपिडेमिया अब केवल बुजुर्गों या स्पष्ट रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युवाओं और सामान्य रूप से स्वस्थ दिखने वाले वयस्कों को प्रभावित करने वाली एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। हृदय संबंधी बीमारियों के बोझ को कम करने और स्वस्थ भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रारंभिक जांच, जीवनशैली में बदलाव और अधिक जन-जागरूकता के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य देखभाल अपनाना आवश्यक होगा।

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