होम > Blog

Blog / 15 Oct 2026

रक्षा मंत्री ने भारत-आसियान के बीच रक्षा सहयोग को और गहरा करने का आह्वान किया

संदर्भ:

हाल ही में, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नई दिल्ली में आयोजित आसियान–भारत रक्षा थिंक टैंक फोरम में भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (ASEAN) के बीच रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग को और गहरा करने का आह्वान किया। उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए समुद्री सुरक्षा, रक्षा विनिर्माण, सूचना साझाकरण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर जोर दिया।

पृष्ठभूमि: भारत–आसियान संबंध:

      • भारत और आसियान के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और समुद्री संबंध हैं। भारत वर्ष 1992 में क्षेत्रीय संवाद भागीदार (Sectoral Dialogue Partner), वर्ष 2002 में शिखर सम्मेलन स्तर का भागीदार (Summit-level Partner) और वर्ष 2012 में रणनीतिक भागीदार (Strategic Partner) बना।
      • वर्ष 2014 में भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए एक्ट ईस्ट नीति शुरू की। वर्ष 2022 में इन संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर तक उन्नत किया गया। आसियान भारत की हिंद-प्रशांत संबंधी परिकल्पना और क्षेत्रीय कूटनीति में केंद्रीय स्थान रखता है।

India–ASEAN Relations

फोरम की प्रमुख विशेषताएँ:

      • समुद्री सुरक्षा: समुद्री क्षेत्र के प्रति जागरूकता, पानी के भीतर निगरानी, सूचना साझाकरण तथा नौसेनाओं और तटरक्षक बलों के बीच सहयोग को बढ़ाना।
      • रक्षा प्रौद्योगिकी: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष-आधारित प्रणालियों में सहयोग।
      • संयुक्त रक्षा उत्पादन: गश्ती पोतों, रडार, वायु रक्षा प्रणालियों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन के क्षेत्र में साझेदारी।
      • अनुसंधान और नवाचार: भारत की रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार (iDEX) और प्रौद्योगिकी विकास कोष (TDF) जैसी पहलें स्टार्टअप, विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को सुगम बना सकती हैं।
      • क्षमता निर्माण: प्रशिक्षण, रखरखाव, मरम्मत एवं ओवरहॉल (MRO), तकनीकी सहायता तथा मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) के क्षेत्र में सहयोग।
      • 14–15 अक्टूबर 2026 को मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान (MP-IDSA) में आयोजित इस दो दिवसीय फोरम में भारत और आसियान के सभी 11 सदस्य देशों के प्रतिभागियों ने भाग लिया।

भारत के लिए महत्त्व:

गहरे रक्षा संबंध भारत की एक्ट ईस्ट नीति और स्वतंत्र, खुले तथा समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना को समर्थन देते हैं। ये भारत की समुद्री उपस्थिति को मजबूत कर सकते हैं, रक्षा साझेदारियों में विविधता ला सकते हैं, स्वदेशी रक्षा उत्पादों के लिए बाजारों का विस्तार कर सकते हैं और समुद्री डकैती, तस्करी तथा अवैध मछली पकड़ने जैसी सीमापार चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकते हैं। यह सहयोग क्षेत्रीय सुरक्षा में आसियान की केंद्रीय भूमिका को भी मजबूत करता है।

प्रमुख चुनौतियाँ:

भारत–आसियान रक्षा सहयोग के समक्ष रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर, सैन्य क्षमताओं में असमानता और प्रमुख शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा से जुड़ी संवेदनशीलताएँ जैसी चुनौतियाँ हैं। ये विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण हैं। सीमित संसाधन, तकनीकी अंतराल और कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ भी संयुक्त परियोजनाओं को सीमित कर सकती हैं। आसियान के सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित अलग-अलग हैं, इसलिए आम सहमति आवश्यक है।

आगे की राह:

भारत को सूचना साझाकरण तंत्र को मजबूत करना चाहिए, संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों का विस्तार करना चाहिए और किफायती रक्षा प्रौद्योगिकियों के सह-विकास को बढ़ावा देना चाहिए। प्रशिक्षण, रखरखाव सुविधाओं और आपदा प्रतिक्रिया समन्वय में अधिक निवेश से आपसी विश्वास बढ़ाया जा सकता है। सहयोग में राष्ट्रीय संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय संस्थानों में आसियान की केंद्रीय भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

भारत–आसियान के बीच गहरा रक्षा सहयोग क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान दे सकता है, समुद्री व्यापार मार्गों को सुरक्षित कर सकता है और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत कर सकता है। शांतिपूर्ण और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र के निर्माण के लिए रणनीतिक संवाद को व्यावहारिक सहयोग में बदलना आवश्यक है, साथ ही आसियान की विविधता और स्वायत्तता का सम्मान भी किया जाना चाहिए।

 

Aliganj Gomti Nagar Prayagraj