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Blog / 03 Oct 2026

भारत का 2026 मानसून 13% वर्षा की कमी के साथ समाप्त

संदर्भ:

भारत का 2026 दक्षिण-पश्चिम मानसून 30 सितंबर को समाप्त हुआ और इस दौरान सामान्य से लगभग 13% कम वर्षा हुई। यह 2015 के बाद सबसे शुष्क मानसून और 2001 के बाद चौथा सबसे कम वर्षा वाला मानसून रहा। भारत में लगभग 759.4 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जबकि दीर्घकालिक औसत (LPA) 868.6 मिमी है। यानी वर्षा LPA की लगभग 87% रही।

भारतीय मानसून क्या है?

मानसून शब्द अरबी शब्द मौसिम (mausim) से लिया गया है, जिसका अर्थ “ऋतु” है। यह भूमि और समुद्र के असमान तापमान के कारण हवाओं की मौसमी दिशा में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है।

भारत में दो प्रमुख मानसून प्रणालियाँ हैं:

      • दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून–सितंबर): यह भारत की वार्षिक वर्षा का लगभग 75–80% प्रदान करता है और इसकी दो शाखाएँ हैं-  अरब सागर शाखा और बंगाल की खाड़ी शाखा।
      • उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर–दिसंबर): इस दौरान हवाएँ भूमि से समुद्र की ओर दिशा बदलती हैं, बंगाल की खाड़ी के ऊपर से नमी ग्रहण करती हैं और तमिलनाडु, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा तथा केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में महत्वपूर्ण वर्षा लाती हैं।

प्रमुख नियंत्रक कारक:

भारतीय मानसून निम्नलिखित कारकों से प्रभावित होता है:

      • भूमि और समुद्र का असमान ताप
      • अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का स्थानांतरण
      • तिब्बती पठार का गर्म होना
      • उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट का पीछे हटना और उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट की स्थापना
      • दक्षिणी हिंद महासागर के ऊपर मस्कारेन उच्च दाब क्षेत्र
      • ENSO, IOD और यूरेशियाई हिम आवरण

India’s 2026 Monsoon Ends with 13% Rainfall Deficit

2026 का मानसून कमजोर क्यों रहा?

      • अल नीनो: मुख्य कारक अल नीनो था, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के जल का असामान्य रूप से गर्म होना शामिल है। यह सामान्यतः वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन करके भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर करता है। IMD ने मानसून के दौरान अल नीनो की स्थितियों के मजबूत होने की सूचना दी।
      • वर्षा का असमान वितरण: वर्षा की कमी पूरे देश में समान नहीं थी। दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में LPA की लगभग 76% वर्षा हुई, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में लगभग 74% वर्षा हुई, जो क्षेत्रीय स्तर पर गंभीर असमानता को दर्शाता है। इसी समय, बंगाल की खाड़ी के ऊपर बने निम्न दाब तंत्रों ने मध्य और पूर्वी क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में वर्षा लाने में मदद की और राष्ट्रीय स्तर पर वर्षा की कमी को और अधिक बढ़ने से रोका।

दीर्घकालिक औसत (LPA) और वर्षा वर्गीकरण को समझना:

दीर्घकालिक औसत (LPA) किसी लंबी संदर्भ अवधि के दौरान हुई औसत वर्षा को दर्शाता है। भारत के लिए वर्तमान मौसमी LPA 868.6 मिमी (लगभग 87 सेमी), 1971–2020 की अवधि पर आधारित है।

अखिल भारतीय वर्गीकरण:

      • अधिक: >110% LPA
      • सामान्य से अधिक: 104–110%
      • सामान्य: 96–104%
      • सामान्य से कम: 90–95%
      • अल्प: <90%

इस प्रकार, 2026 में लगभग 87% LPA वर्षा अल्प वर्षा की श्रेणी में आती है।

भारत पर प्रभाव:

      • कृषि: लंबे समय तक रहने वाले शुष्क दौर से विशेष रूप से वर्षा-आधारित क्षेत्रों में धान, कपास और मक्का की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
      • जल सुरक्षा: कम वर्षा से भूजल पुनर्भरण और जलाशयों में जल भंडारण कम हो सकता है।
      • जलविद्युत: जलाशयों में जल स्तर कम होने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
      • मुद्रास्फीति: फसल को नुकसान होने से खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
      • ग्रामीण अर्थव्यवस्था: कृषि आय में कमी से ग्रामीण मांग और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं।
      • पारिस्थितिकी: जल की कमी से प्रभावित वन, आर्द्रभूमि और पारिस्थितिक तंत्र जलवायु संबंधी तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

आगे की राह:

      • सूक्ष्म सिंचाई और वर्षा जल संचयन का विस्तार करना।
      • सूखा-रोधी और कम अवधि में तैयार होने वाली फसल किस्मों को बढ़ावा देना।
      • भूजल पुनर्भरण और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन को मजबूत करना।
      • जिला स्तर पर मौसम पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी प्रणालियों में सुधार करना।
      • फसल बीमा और जलवायु-अनुकूल कृषि का विस्तार करना।
      • अवलोकन प्रणालियों और संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान में सुधार के लिए मिशन मौसम जैसे कार्यक्रमों का उपयोग करना।

निष्कर्ष:

2026 का मानसून यह दर्शाता है कि भारत में वर्षा की चुनौती केवल वर्षा की मात्रा से संबंधित नहीं है, बल्कि इसके समय, अवधि और स्थानिक वितरण से भी जुड़ी है। मानसून में बढ़ती परिवर्तनशीलता के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को कम करने के लिए जलवायु-अनुकूल कृषि, बेहतर जल प्रबंधन और पूर्वानुमान क्षमता को मजबूत करना आवश्यक है।

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