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Blog / 16 Jul 2026

दवा निर्माण क्षेत्र में आईआईटी बॉम्बे की नई खोज

सन्दर्भ: 

हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे के रसायन विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने औषधि विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण खोज की है, जो भविष्य में दवाओं के निर्माण को अधिक तीव्र, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल (सस्टेनेबल) बनाएगी। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।

नई खोज के विषय में:

      • प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कई औषधीय और व्यावसायिक उत्पाद जटिल वलय (Ring-shaped) संरचनाओं वाले होते हैं। अब तक वैज्ञानिकों के लिए सरल और सीधे कार्बन यौगिकों (जैसे फैटी एसिड) को इन जटिल छल्लों में बदलना एक बेहद कठिन और लंबी प्रक्रिया थी।
      • आईआईटी बॉम्बे की टीम ने एक विशेष उत्प्रेरक (Custom Chemical Entity) विकसित किया है। यह उत्प्रेरक लंबी कार्बन श्रृंखला में से एक विशिष्ट कार्बन परमाणु की पहचान करता है और पूरी श्रृंखला को एक वलय या छल्ले (Ring-shaped) में तब्दील कर देता है। इस रासायनिक प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में "लिगैंड-इनेबल्ड डिस्टल डिसेचुरेटिव लैक्टोनाइजेशन" (Ligand-enabled distal desaturative lactonization) कहा जाता है। यह तकनीक एक ही चरण (Single-step) में जटिल अणुओं का निर्माण कर देती है।

New Discovery by IIT Bombay in the Pharmaceutical Manufacturing Sector

औद्योगिक अनुप्रयोग:

यह खोज केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यावसायिक और औद्योगिक उपयोग अत्यंत व्यापक हैं:

      • फार्मास्युटिकल उद्योग: जटिल कैंसर रोधी यौगिकों (जैसे म्यूरीकाटासिन) और जीवन रक्षक दवाओं का निर्माण अब प्रयोगशाला में बहुत कम समय और लागत में किया जा सकेगा।
      • इत्र और सुगंध उद्योग (Perfumery): कई प्राकृतिक सुगंधित यौगिकों की संरचना रिंग-आकार की होती है। इस तकनीक से महंगे इत्रों के कच्चे माल का कृत्रिम उत्पादन आसान हो जाएगा।
      • कृषि रसायन (Agrochemicals): पर्यावरण के अनुकूल और लक्षित (Targeted) कीटनाशकों और उर्वरकों के निर्माण में यह सहायक होगी।
      • हरित रसायन विज्ञान (Green Chemistry): रासायनिक चरणों की संख्या कम होने से औद्योगिक कचरे और हानिकारक सह-उत्पादों (By-products) के उत्सर्जन में भारी गिरावट आएगी।

खोज का महत्व:

      • फार्मा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता: आईआईटी बॉम्बे की यह स्वदेशी तकनीक भारत को कच्चे माल (APIs) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और चीन पर निर्भरता को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
      • पारंपरिक चिकित्सा (Ayurveda) का आधुनिकीकरण: भारत के पास समृद्ध पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान है। इस तकनीक की मदद से आयुर्वेद और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों में मौजूद जटिल औषधीय तत्वों (Bioactive Molecules) को प्रयोगशाला में आसानी से सिंथेटिक रूप देकर आधुनिक दवाओं में बदला जा सकता है।
      • किफायती स्वास्थ्य सेवा (Affordable Healthcare): दवाओं के निर्माण की लागत घटने से जीवन रक्षक दवाएं आम नागरिकों के लिए अधिक सुलभ और सस्ती हो सकेंगी, जो 'सतत विकास लक्ष्य-3' (Good Health and Well-being) को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

भारतीय फार्मा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियाँ:

यद्यपि भारत को "दुनिया की फार्मेसी" कहा जाता है, लेकिन यह क्षेत्र कई गंभीर ढांचागत चुनौतियों से जूझ रहा है:

      • कच्चे माल (APIs) के लिए आयात पर निर्भरता: भारत जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन इनके निर्माण के लिए आवश्यक 'एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स' (APIs) के लिए वह आज भी 70-80% तक चीन पर निर्भर है।
      • अनुसंधान एवं विकास (R&D) में कम निवेश: वैश्विक दिग्गजों की तुलना में भारतीय फार्मा कंपनियां नवीन दवाओं की खोज (New Drug Discovery) के बजाय जेनेरिक दवाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करती हैं, क्योंकि R&D में भारी पूंजी और जोखिम की आवश्यकता होती है।
      • गुणवत्ता और नियामक बाधाएं: अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (USFDA) जैसे वैश्विक नियामकों द्वारा भारतीय विनिर्माण संयंत्रों में गुणवत्ता मानकों के उल्लंघन को लेकर अक्सर सख्त रुख अपनाया जाता है।
      • मूल्य नियंत्रण नीतियां: सरकार द्वारा आवश्यक दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण (DPCO) रखने से कंपनियों के लाभ मार्जिन पर असर पड़ता है, जिससे वे नए अनुसंधान में निवेश नहीं कर पातीं।
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