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Blog / 29 Dec 2025

मलेरिया मामलों पर आईसीएमआर रिपोर्ट 2025

संदर्भ:

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मलेरिया रिसर्च (ICMR–NIMR) और नेशनल सेंटर फॉर वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल (NCVBDC) द्वारा संयुक्त रूप से जारी की गई तकनीकी रिपोर्ट "इंडियाज प्रोग्रेस टुवर्ड्स मलेरिया एलिमिनेशनटेक्निकल रिपोर्ट 2025" के अनुसार, भारत ने अपने मलेरिया बोझ में उल्लेखनीय कमी हुई है।

मलेरिया के बारे में:

मलेरिया एक वेक्टर-जनित संक्रामक बीमारी है जो प्लास्मोडियम परजीवियों के कारण होती है और संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छरों के काटने से फैलती है।

      • लक्षण: बुखार, ठंड लगना, सिरदर्द, थकान, और गंभीर मामलों में अंग विफलता और मृत्यु।
      • प्लास्मोडियम के प्रकार: पी. फाल्सीपेरम, पी. विवैक्स, पी. मलेरी, पी. ओवेल, और पी. नोलेसी।
      • वैश्विक बोझ: उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता।

ICMR Report 2025 on Malaria Cases

रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष:

मामलों और मौतों में गिरावट:

2015 में मामले 1.17 मिलियन थे, जो 2024 में घटकर लगभग 2.27 लाख रह गए हैं, जिससे 80–85 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। इसी तरह, मौतें 384 से घटकर लगभग 83 हो गई हैं, जो करीब 78 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। साथ ही, लगभग 92 प्रतिशत जिलों में वार्षिक परजीवी घटना (API) 1 से कम दर्ज की गई है, जो यह संकेत देता है कि भारत बड़े पैमाने पर उन्मूलन-पूर्व चरण में पहुँच चुका है। 

प्रगति के चालक:

      • मजबूत की गई रोग निगरानी प्रणालियाँ।
      • समय पर निदान और प्रभावी उपचार तक विस्तारित पहुँच।
      • लक्षित वेक्टर नियंत्रण हस्तक्षेप।
      • राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर निरंतर राजनीतिक और कार्यक्रमबद्ध प्रतिबद्धता।

उन्मूलन चरण में उभरती चुनौतियाँ:

      • असमान और स्थानीय संचरण: शेष मामले अब अधिकतर स्थानीय, छिटपुट या बाहर से आए हुए हैं।
      • जमीनी कार्य में कठिनाई: संचरण कम होने पर मामलों की पहचान, जाँच और त्वरित कार्रवाई करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
      • शहरी क्षेत्रों की चुनौतियाँ: कंटेनरों में मच्छरों का पनपना, निर्माण स्थल, अनौपचारिक बस्तियाँ, अधिक जनसंख्या घनत्व और बिखरी हुई स्वास्थ्य सेवाएँ।
      • स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियाँ: निजी क्षेत्र की कमजोर रिपोर्टिंग, सीमित कीट-विज्ञान क्षमता, दवाओं और कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोध, दूरदराज़ और जनजातीय क्षेत्रों में काम करने की दिक्कतें तथा कभी-कभी जाँच और इलाज की कमी।
      • सीमा-पार संक्रमण: म्यांमार और बांग्लादेश से मामलों का आना, जिससे पूर्वोत्तर सीमावर्ती जिले प्रभावित हो रहे हैं।

नीतिगत निहितार्थ:

      • मजबूत निगरानी: रोग का शीघ्र पता लगाना और त्वरित प्रतिक्रिया बेहद आवश्यक है, विशेषकर कम संचरण वाले और शहरी क्षेत्रों में।
      • डेटा-आधारित हस्तक्षेप: स्थानीय पारिस्थितिक, जनसांख्यिकीय और व्यावसायिक परिस्थितियों के अनुसार सूक्ष्म और लक्षित रणनीतियाँ अपनाई जानी चाहिए।
      • बहुक्षेत्रीय समन्वय: स्वास्थ्य के साथ-साथ शहरी विकास, जल एवं स्वच्छता, तथा सीमा प्रबंधन क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है।
      • आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती: जाँच किट, दवाओं और वेक्टर-नियंत्रण सामग्री की निरंतर और निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
      • निजी क्षेत्र की भागीदारी: निजी स्वास्थ्य संस्थानों में अनिवार्य रिपोर्टिंग लागू करना और उनकी क्षमता-वृद्धि करना जरूरी है।

निष्कर्ष:

भारत पर मलेरिया के बोझ में गिरावट सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रशासन, निगरानी, उपचार प्रोटोकॉल और वेक्टर नियंत्रण रणनीतियों की सफलता को दर्शाती है। हालाँकि, मलेरिया नियंत्रण से उन्मूलन की ओर संक्रमण जटिल परिचालन चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है। लक्षित, डेटा-संचालित और बहुक्षेत्रीय दृष्टिकोणों के माध्यम से इन्हें संबोधित करना, 2030 तक मलेरिया-मुक्त भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।