सन्दर्भ:
हाल के समय में भारत के प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के जलाशयों का जल-स्तर अप्रैल–जुलाई अवधि में वर्ष 2023 के बाद के न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है। इसका प्रमुख कारण एल-नीनो (El Niño) से संबंधित अनियमित मौसमीय परिस्थितियाँ हैं। विद्युत मंत्रालय के अनुसार, जल की उपलब्धता में कमी के कारण जलविद्युत उत्पादन प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है, जिससे विशेषकर उच्चतम विद्युत मांग (Peak Demand) के समय विद्युत आपूर्ति को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
पृष्ठभूमि:
जलविद्युत भारत के ऊर्जा मिश्रण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो स्वच्छ, नवीकरणीय एवं लचीले विद्युत स्रोत के रूप में कार्य करता है। विशेष रूप से सूर्यास्त के पश्चात, जब सौर ऊर्जा उत्पादन में कमी आती है, तब यह सायंकालीन उच्चतम विद्युत मांग की पूर्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
हालाँकि, मानसून वर्षा की कमी तथा वर्षा के असमान वितरण के कारण देशभर के जलाशयों में जल-संग्रहण क्षमता में उल्लेखनीय कमी आई है।
प्रमुख तथ्य:
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- देश के 30 प्रमुख जलविद्युत जलाशयों में से 23 जलाशयों में 1 अप्रैल से 30 जुलाई, 2026 के दौरान जल-स्तर पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम दर्ज किया गया।
- बड़े जलविद्युत संयंत्रों से विद्युत उत्पादन में 10.75 प्रतिशत की कमी आई, जो 60,522.95 मिलियन यूनिट (MU) से घटकर 54,019.42 मिलियन यूनिट रह गया।
- जलाशयों की ऊर्जा-सामर्थ्य (Energy Content), जो संग्रहित जल से संभावित विद्युत उत्पादन को दर्शाती है, वर्ष-दर-वर्ष आधार पर 43 प्रतिशत, वर्ष 2024 की तुलना में 39 प्रतिशत तथा वर्ष 2023 की तुलना में 17 प्रतिशत घट गई।
- दक्षिणी क्षेत्र में सर्वाधिक गिरावट दर्ज की गई, जहाँ जलाशयों की ऊर्जा-सामर्थ्य में 63 प्रतिशत की कमी आई। इसके बाद पूर्वी (28 प्रतिशत), उत्तरी (25 प्रतिशत), उत्तर-पूर्वी (22 प्रतिशत) तथा पश्चिमी (13 प्रतिशत) क्षेत्रों का स्थान रहा।
- देश के 30 प्रमुख जलविद्युत जलाशयों में से 23 जलाशयों में 1 अप्रैल से 30 जुलाई, 2026 के दौरान जल-स्तर पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम दर्ज किया गया।

एल-नीनो की भूमिका:
एल-नीनो मध्य एवं पूर्वी विषुवतीय प्रशांत महासागर के समुद्री सतही तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि की घटना है, जो वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करती है।
भारत में सामान्यतः एल-नीनो का संबंध दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमजोर वर्षा से होता है। इसके परिणामस्वरूप जलाशयों में जल की आवक कम हो जाती है, जलविद्युत उत्पादन घटता है, सिंचाई हेतु जल की मांग बढ़ती है तथा शीतलन (Cooling) की आवश्यकता के कारण विद्युत की खपत में वृद्धि होती है।
प्रभाव:
जलविद्युत उत्पादन में कमी के कारण भारत की कोयला-आधारित तापीय विद्युत पर निर्भरता बढ़ गई है।
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- अप्रैल–जुलाई 2026 के दौरान कोयला-आधारित विद्युत उत्पादन में 9.49 प्रतिशत तथा केवल जुलाई 2026 में 13 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, ताकि जलविद्युत उत्पादन में आई कमी की भरपाई की जा सके।
- कोयले पर बढ़ती निर्भरता से हरितगृह गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि होती है, ईंधन लागत बढ़ती है तथा स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण एवं जलवायु संबंधी राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की पूर्ति चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
- जलाशयों में जल-संग्रहण घटने से सिंचाई, पेयजल उपलब्धता तथा समग्र जल सुरक्षा भी प्रभावित होती है।
- अप्रैल–जुलाई 2026 के दौरान कोयला-आधारित विद्युत उत्पादन में 9.49 प्रतिशत तथा केवल जुलाई 2026 में 13 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई, ताकि जलविद्युत उत्पादन में आई कमी की भरपाई की जा सके।
आगे की राह:
भारत को समेकित जल संसाधन प्रबंधन को सुदृढ़ करना चाहिए तथा उन्नत पूर्वानुमान प्रणालियों के माध्यम से जलाशयों के संचालन को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त-
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- ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण,
- पंप्ड-स्टोरेज जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार,
- ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देकर उच्चतम विद्युत मांग को कम करना,
- जल, ऊर्जा तथा मौसम संबंधी संस्थाओं के मध्य बेहतर समन्वय स्थापित करना,
- तथा जलवायु-अनुकूल अवसंरचना का विकास करना आवश्यक होगा।
- ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के साथ नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण,
निष्कर्ष:
जलविद्युत जलाशयों के जल-स्तर में तीव्र गिरावट भारत के ऊर्जा क्षेत्र की जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता को रेखांकित करती है। विविधीकृत ऊर्जा स्रोतों, प्रभावी जल प्रबंधन तथा जलवायु-अनुकूल योजना पर आधारित सुदृढ़ एवं लचीली विद्युत प्रणाली का निर्माण विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।
