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Blog / 01 Jul 2026

हरियाणा–राजस्थान यमुना जल समझौता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में हरियाणा और राजस्थान ने वर्ष 1994 के अपर यमुना नदी बोर्ड (Upper Yamuna River Board- UYRB) समझौते को लागू करने के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस परियोजना का उद्देश्य पेयजल उपलब्धता बढ़ाना, सिंचाई सुविधाओं को सुदृढ़ करना, भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को प्रोत्साहित करना तथा जल प्रबंधन में अंतर्राज्यीय सहयोग को मजबूत करना है।

पृष्ठभूमि:

      • इस समझौते की आधारशिला 12 मई 1994 को हस्ताक्षरित अपर यमुना बेसिन के उपयोग योग्य सतही जल के बंटवारे संबंधी समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding on the Sharing of Utilisable Surface Waters of the Upper Yamuna Basin) में निहित है। इस समझौते पर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली तथा हिमाचल प्रदेश ने हस्ताक्षर किए थे। वर्ष 2000 में उत्तराखंड के गठन के बाद वह भी अपर यमुना बेसिन का एक हितधारक (Stakeholder) बन गया।
      • इस समझौते का उद्देश्य यमुना नदी के उपयोग योग्य जल का विभिन्न बेसिन राज्यों के बीच न्यायसंगत वितरण करना था, ताकि बढ़ती पेयजल, सिंचाई तथा अन्य विकासात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके।
      • समझौते के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जल शक्ति मंत्रालय के अधीन अपर यमुना नदी बोर्ड (UYRB) की स्थापना की गई, जिसका कार्य जल आवंटन का विनियमन, नदी के प्रवाह की निगरानी तथा सहभागी राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करना है।

नए समझौते की आवश्यकता क्यों पड़ी?

      • यद्यपि वर्ष 1994 के समझौते के अंतर्गत राजस्थान को यमुना नदी के जल का 10.4% हिस्सा आवंटित किया गया था, लेकिन समर्पित जल परिवहन प्रणाली (Dedicated Water Conveyance System) के अभाव में राज्य अपने हिस्से के जल का पूर्ण उपयोग नहीं कर सका। परिणामस्वरूप, कई वर्षों तक उसके हिस्से का बड़ा भाग अनुपयोगी बना रहा।
      • इस समस्या के समाधान के लिए हाल ही में हरियाणा और राजस्थान के बीच एक नया समझौता ज्ञापन (MoU) किया गया है, जिससे वर्ष 1994 के समझौते को व्यावहारिक रूप से लागू किया जा सके।
      • इस व्यवस्था के तहत हरियाणा, जुलाई से अक्टूबर के बीच प्रतिवर्ष 580 मिलियन घन मीटर (MCM) यमुना जल लगभग 300 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से हथिनीकुंड के निकट से राजस्थान को उपलब्ध कराएगा।
      • इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 3,900 करोड़ रुपये है, जिसे दोनों राज्य संयुक्त रूप से क्रियान्वित करेंगे।

समझौते का महत्व:

      • यह समझौता राजस्थान के सीकर, चूरू और झुंझुनूं जिलों में पेयजल की विश्वसनीय उपलब्धता सुनिश्चित करेगा तथा हरियाणा के कुछ क्षेत्रों को भी लाभान्वित करेगा।
      • इसके अतिरिक्त, इससे
        • सिंचाई सुविधाओं में सुधार होगा।
        • भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को बढ़ावा मिलेगा।
        • मानसून के दौरान उपलब्ध अतिरिक्त जल की बर्बादी कम होगी।
      • यह समझौता रेणुका, किशाऊ और लखवार बहुउद्देशीय बांध परियोजनाओं के निर्माण को भी गति प्रदान कर सकता है। ये परियोजनाएँ यमुना बेसिन में जल भंडारण क्षमता बढ़ाने तथा दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

      • अनुच्छेद 262 संसद को अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान हेतु कानून बनाने का अधिकार प्रदान करता है।
      • इसी अधिकार के तहत संसद ने अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया, जिसके माध्यम से जल विवाद न्यायाधिकरणों (Water Dispute Tribunals) की स्थापना का प्रावधान किया गया।
      • राज्य सूची की प्रविष्टि 17 राज्यों को जल संबंधी विषयों पर अधिकार प्रदान करती है, जबकि संघ सूची की प्रविष्टि 56 के अंतर्गत राष्ट्रीय हित में केंद्र सरकार को अंतर्राज्यीय नदियों और नदी घाटियों के विनियमन एवं विकास का अधिकार प्राप्त है।

निष्कर्ष:

हरियाणाराजस्थान यमुना जल समझौता सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसने वर्ष 1994 के अपर यमुना समझौते को व्यावहारिक रूप से लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। यह समझौता जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ नदी बेसिन आधारित समेकित योजना, जल अवसंरचना के विकास तथा संवैधानिक तंत्र के माध्यम से भारत के अंतर्राज्यीय नदी जल संसाधनों के न्यायसंगत एवं सतत प्रबंधन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

 

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