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Blog / 28 Feb 2026

भारत में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और फ्रीबीज़ की चुनौती

संदर्भ:

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावों से पहले राज्य सरकारों द्वारा नागरिकों को फ्रीबीज़ (मुफ्त सुविधाएँ/वस्तुएँ) देने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी दी कि ऐसी प्रथाएँ वित्तीय अनुशासन को खतरे में डाल सकती हैं, आर्थिक विकास को कमजोर कर सकती हैं, बाज़ार व्यवस्था को विकृत कर सकती हैं और यहाँ तक कि नागरिकों की कार्य संस्कृति को भी प्रभावित कर सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने यह भी प्रश्न उठाया कि बिना वास्तविक जरूरतमंदों को लक्षित किए इस प्रकार की घोषणाएँ क्या राजनीतिक तुष्टीकरण का रूप नहीं हैं। इन टिप्पणियों ने कल्याण और लोकलुभावनवाद के बीच की रेखा पर राष्ट्रीय बहस को पुनर्जीवित कर दिया है।

फ्रीबीज़ क्या होता है:

      • हालाँकि राजनीतिक विमर्श में इस शब्द का व्यापक उपयोग होता है, लेकिन फ्रीबीज़की कोई सटीक कानूनी परिभाषा नहीं है। भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार, फ्रीबी वह सार्वजनिक कल्याण उपाय है जो निःशुल्क प्रदान किया जाता है।
      • आमतौर पर फ्रीबीज़ चुनाव अभियानों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा घोषित की जाती हैं, जिनमें अल्पकालिक लाभ जैसे मुफ्त बिजली, पानी, लैपटॉप, साइकिल या ऋण माफी आदि शामिल होते हैं। वर्षों से ये उपाय भारतीय चुनावी राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं, जिससे कल्याण और मुफ्त वितरण के बीच का अंतर अक्सर धुंधला हो जाता है।

कल्याणवाद बनाम फ्रीबीज़:

यह आवश्यक है कि कल्याणकारी कार्यक्रमों और राजनीतिक फ्रीबीज़ के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। जहाँ कल्याण पहलें दीर्घकालिक सामाजिक विकास का लक्ष्य रखती हैं, वहीं फ्रीबीज़ अक्सर वोट हासिल करने के उद्देश्य से घोषित अस्थायी उपाय होते हैं।

पहलू

कल्याणवाद

फ्रीबीज़

मूल आधार

संवैधानिक कर्तव्य

अल्पकालिक राजनीतिक प्रोत्साहन

उदाहरण

खाद्य सुरक्षा (PDS), रोजगार (MGNREGA), शिक्षा/स्वास्थ्य सहायता

मुफ्त बिजली, पानी, ऋण माफी

स्थिरता

दीर्घकालिक

प्रायः अस्थिर

आर्थिक प्रभाव

मानव पूंजी का निर्माण

बाजार विकृति, ऋण संस्कृति का ह्रास, कार्य-प्रेरणा में कमी

दृष्टिकोण

अधिकार-आधारित, आवश्यकता-आधारित या दान-आधारित

लोकलुभावन वितरण

कल्याणवाद के दृष्टिकोण:

      • दान-आधारित दृष्टिकोण: यह इनपुट पर अधिक ध्यान देता है, परिणामों पर कम। यह समृद्ध वर्ग की नैतिक जिम्मेदारी को मान्यता देता है और व्यक्तियों को परिस्थितियों का शिकार मानता है।
      • आवश्यकता-आधारित दृष्टिकोण: यह इनपुट और परिणाम दोनों को संबोधित करता है, पहचानी गई आवश्यकताओं की पूर्ति करता है और व्यक्तियों को विकास हस्तक्षेपों का विषय मानता है।
      • अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: यह प्रक्रिया और परिणाम दोनों पर जोर देता है, जहाँ नागरिक अपने अधिकारों का दावा कर सकते हैं और समस्याओं के संरचनात्मक कारणों का समाधान किया जाता है।

भारत में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और फ्रीबीज़ की चुनौती

फ्रीबीज़ पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ:

तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा फ्रीबीज़ वितरण को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि आय के आधार पर भेदभाव किए बिना सार्वभौमिक मुफ्त वितरण, जैसे- मुफ्त बिजली, वित्तीय विवेक और राजनीतिक मंशा पर प्रश्न खड़े करता है।

सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ:

      • राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव: ज़रूरतमंदों को लक्षित किए बिना मुफ्त सुविधाएँ देने से राज्यों की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ सकता है, विशेष रूप से उन राज्यों में जो पहले से ही राजस्व घाटे (Revenue Deficit) में चल रहे हैं।
      • कार्य संस्कृति (Work Culture) पर प्रभाव: राजनीतिक मुफ्त उपहार नागरिकों की कार्य संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इससे लोग उत्पादक रोजगार में शामिल होने के बजाय सरकारी मुफ्त सुविधाओं पर आश्रित (Reliant) हो सकते हैं।
      • दीर्घकालिक विकास पर ध्यान: जन कल्याण का मुख्य फोकस क्षणिक उपहारों के बजाय दीर्घकालिक विकास, रोजगार सृजन और स्थायी सामाजिक सहायता पर होना चाहिए, ताकि केवल वोट पाने के लिए संसाधनों का दुरुपयोग न हो।

संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण:

सुप्रीम कोर्ट ने फ्रीबीज़ के मुद्दे को संविधान और राज्य के नीति निदेशक तत्वों (DPSP) के संदर्भ में देखा है:

      • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38, 39, 41 राज्य की जिम्मेदारी पर बल देते हैं कि वह:
        • सामाजिक कल्याण और आर्थिक न्याय को बढ़ावा दें।
        • नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करें।
        • धन के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोके।
        • कार्य, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के अधिकार प्रदान करें।

मुख्य न्यायिक हस्तक्षेप:

      • सुब्रमण्यम बालाजी मामला (2013): दो-न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया कि लैपटॉप और टीवी जैसी वस्तुओं का वितरण, यदि पात्र नागरिकों को दिया जाए, तो DPSP के अनुरूप है और न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
      • अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ: यह मामला चुनाव अभियानों के दौरान फ्रीबीज़ की पेशकश और वितरण की वैधता को चुनौती देता है।

निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देश:

भारत निर्वाचन आयोग ने चुनावी वादों में पारदर्शिता पर बल दिया है और राजनीतिक दलों से आग्रह किया है कि वे फ्रीबीज़ के वित्तपोषण के स्रोतों का खुलासा करें। इसका उद्देश्य अत्यधिक लोकलुभावनवाद पर अंकुश लगाना और चुनावी जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

फ्रीबीज़ के प्रभाव:

फ्रीबीज़ कभी-कभी तात्कालिक राहत प्रदान करती हैं, लेकिन इनके आर्थिक और सामाजिक जोखिम भी गंभीर हैं।

सकारात्मक (कल्याणवाद)

नकारात्मक (फ्रीबीज़)

मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति (भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा)

सरकार पर वित्तीय बोझ, राजकोषीय घाटा

सामाजिक और लैंगिक असमानताओं का समाधान

निर्भरता संस्कृति, उत्पादकता में कमी

समावेशन और सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा

टिकाऊ विकास में बाधा, पीढ़ीगत असमानता

राजनीतिक सहभागिता

वोट प्राप्त करने का साधन

बाज़ार विफलताओं का समाधान

निवेश से संसाधनों का विचलन, प्रतिस्पर्धात्मकता में कमी

विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में कल्याण और फ्रीबीज़ के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है और दोनों शब्द राजनीतिक विमर्श में परस्पर उपयोग किए जा रहे हैं।

नीतिगत सुधार और सिफारिशें:

यह सुनिश्चित करने के लिए कि कल्याण योजनाएँ टिकाऊ बनी रहें और राजनीतिक फ्रीबीज़ आर्थिक एवं सामाजिक विकास को प्रभावित न करें, निम्नलिखित कदम प्रस्तावित किए गए हैं:

      • राजकोषीय अनुशासन और ऋण प्रबंधन: वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हुए समयबद्ध प्रावधान (सनसेट क्लॉज) के साथ टिकाऊ कल्याण योजनाओं को प्राथमिकता दी जाए।
      • लीकेज और भ्रष्टाचार की रोकथाम: यह सुनिश्चित किया जाए कि सब्सिडी बिना किसी हेरफेर या धोखाधड़ी के लक्षित लाभार्थियों तक पहुँचे।
      • बीमा कवरेज का विस्तार: महामारी या प्राकृतिक आपदाओं जैसे झटकों से कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
      • राजनीतिक सहमति: केंद्र और राज्य सरकारें समन्वय स्थापित करें ताकि कल्याण योजनाओं का वोट-बैंक राजनीति के लिए दुरुपयोग न हो।
      • निर्वाचन आयोग की निगरानी: प्रतिस्पर्धात्मक लोकलुभावनवाद से बचने के लिए घोषणापत्रों और फ्रीबीज़ के वित्तपोषण में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
      • कौशल विकास और आत्मनिर्भरता: व्यक्तियों को सशक्त बनाया जाए ताकि दीर्घकालिक रूप से फ्रीबीज़ पर निर्भरता कम हो।
      • मतदाता जागरूकता कार्यक्रम: नागरिकों को फ्रीबीज़ की दीर्घकालिक लागत और प्रभावों के बारे में शिक्षित किया जाए ताकि वे सूचित मतदान कर सकें।
      • न्यायिक निगरानी और विशेषज्ञ समितियाँ: नीति आयोग, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और वित्त आयोग के सदस्यों से युक्त समितियाँ फ्रीबीज़ के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन कर सकती हैं।

वैश्विक उदाहरण:

      • श्रीलंका (2019): चुनावी वादों के तहत कर कटौती और मुफ्त वितरण ने गंभीर राजकोषीय संकट को जन्म दिया।
      • वेनेजुएला: लोकलुभावन फ्रीबीज़ और ऋण माफी ने दीर्घकालिक आर्थिक पतन में योगदान दिया।

कल्याण बनाम लोकलुभावनवाद:

      • सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ इस बात की याद दिलाती हैं कि संवैधानिक रूप से निर्धारित कल्याणकारी दायित्वों को पूरा करने और अस्थिर लोकलुभावन वितरण से बचने के बीच संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। कल्याणकारी कार्यक्रमों का उद्देश्य मानव पूंजी का निर्माण, गरीबी उन्मूलन और नागरिकों का सशक्तिकरण है, जबकि अनियंत्रित फ्रीबीज़ राजकोषीय अनुशासन को कमजोर कर सकती हैं, बाज़ार तंत्र को विकृत कर सकती हैं और निर्भरता की संस्कृति को जन्म दे सकती हैं।
      • यद्यपि कल्याण कानूनी और नैतिक दृष्टि से आवश्यक है, परंतु विशेषकर चुनावों के दौरान बिना भेदभाव के किए गए वितरण दीर्घकालिक विकास और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। न्यायपालिका की चेतावनियाँ इस बात पर बल देती हैं कि नीतियाँ लक्षित, टिकाऊ और पारदर्शी हों, जो अल्पकालिक राजनीतिक लाभों के बजाय मानव विकास और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता दें।

निष्कर्ष:

भारत का लोकतंत्र और संवैधानिक ढांचा राज्य के सामाजिक कल्याण सुनिश्चित करने के दायित्व पर जोर देता है, किंतु कल्याण और राजनीतिक फ्रीबीज़ के बीच की रेखा धुंधली हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इस बात की महत्वपूर्ण याद दिलाता है कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग विवेकपूर्ण, टिकाऊ और न्यायसंगत तरीके से किया जाना चाहिए। फ्रीबीज़ वास्तव में मुफ्तनहीं होतीं, इनकी कीमत भविष्य की पीढ़ियाँ, राजकोषीय स्थिरता और आर्थिक विकास चुकाते हैं। पारदर्शिता, वित्तीय जिम्मेदारी और सशक्तिकरण पहलों के साथ टिकाऊ कल्याण आवश्यक है, ताकि भारत समावेशी और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में निरंतर आगे बढ़ता रहे। नागरिकों, नीति-निर्माताओं और राजनीतिक दलों को वोट-आधारित वितरण के दीर्घकालिक परिणामों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सामाजिक कल्याण संवैधानिक अनिवार्यता बना रहे, न कि केवल एक राजनीतिक साधन।

 

UPSC/PCS मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न: फ्रीबीज़ की बढ़ती प्रवृत्ति भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।