होम > Blog

Blog / 23 Jan 2026

वैश्विक जल ‘दिवालियापन’ की शुरुआत

संदर्भ:

यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ की एक हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक जल दिवालियापन (ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी) के एक नए दौर की चेतावनी दी है। इसका तात्पर्य यह है कि मीठे पानी के स्रोत इतनी तेज़ी से समाप्त हो रहे हैं कि अनेक क्षेत्रों में उनकी प्राकृतिक भरपाई अब संभव नहीं रह जाएगी। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ती मांग के बीच टिकाऊ जल प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो गया है।

वैश्विक जल दिवालियापन क्या है?

पहले प्रचलित अवधारणाओं (जैसे जल तनाव या जल संकट) से अलग, जल दिवालियापन का अर्थ है मीठे पानी के स्रोतों का स्थायी और अपरिवर्तनीय रूप से क्षय होना। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब नदियों, भूजल भंडारों और हिमनदों से पानी की निकासी उनकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक हो जाती है। यह अवधारणा दर्शाती है कि समस्या केवल पानी की उपलब्धता की नहीं, बल्कि असंतुलित और अव्यवहारिक जल प्रबंधन की है।

वैश्विक स्तर पर प्रमुख निष्कर्ष:

      • लगभग 6.1 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ जल असुरक्षा या गंभीर जल असुरक्षा की स्थिति है।
      • लगभग 4 अरब लोग हर वर्ष कम से कम एक महीने तक अत्यधिक जल कमी का सामना करते हैं।
      • अनेक शहरों में डे ज़ीरोजैसी घटनाओं की बढ़ती संख्या नगर जल प्रणालियों के लगभग ध्वस्त होने का संकेत देती है।
      • जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, वाष्पीकरण, जंगलों में आग और मिट्टी में लवणता बढ़ रही है, वहीं भूजल का अत्यधिक दोहन और आर्द्रभूमियों का विनाश इस संकट को और गंभीर बना रहा है।

नीति संबंधी सुझाव:

      • वैश्विक और राष्ट्रीय नीति चर्चाओं में जल दिवालियापनकी अवधारणा को स्पष्ट रूप से मान्यता दी जाए।
      • मीठे पानी के संसाधनों की निगरानी हेतु एक प्रभावी वैश्विक ढांचा विकसित किया जाए।
      • ऐसे विकास परियोजनाओं पर नियंत्रण लगाया जाए जो स्थानीय जल स्रोतों को और अधिक क्षति पहुँचाती हैं।
      • पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, कुशल सिंचाई तथा शहरी जल संरक्षण जैसे टिकाऊ भूमि और जल प्रबंधन उपायों को प्रोत्साहित किया जाए।
      • जल योजना को जलवायु अनुकूलन और जलवायु सहनशीलता की व्यापक रणनीतियों के साथ एकीकृत किया जाए।

भारत और जल दिवालियापन का जोखिम:

      • भारत में टिकाऊ जल प्रबंधन एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है।
      • लगभग 60 करोड़ भारतीय उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं।
      • भारत विश्व की लगभग 18% आबादी का भार वहन करता है, जबकि उसके पास वैश्विक मीठे पानी का केवल 4% संसाधन उपलब्ध है।
      • वर्ष 2030 तक जल की मांग उपलब्ध आपूर्ति से लगभग 70% अधिक होने का अनुमान है, जिससे खाद्य सुरक्षा, शहरी स्थिरता और आर्थिक विकास पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

प्रमुख सरकारी ढांचे और योजनाएँ:

जल शक्ति मंत्रालय (स्थापना: 2019) भारत के जल शासन को कई महत्वपूर्ण पहलों के माध्यम से दिशा प्रदान करता है:

      • जल जीवन मिशन (2028 तक विस्तारित): अब लगभग 80% ग्रामीण घरों में कार्यात्मक नल जल कनेक्शन उपलब्ध हैं।
      • अटल भूजल योजना: सात राज्यों में समुदाय आधारित भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है।
      • जल शक्ति अभियान (कैच द रेन): वर्षा जल संचयन और जल स्रोतों के पुनर्जीवन पर केंद्रित है।
      • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: प्रति बूंद अधिक फसलके सिद्धांत के अंतर्गत सूक्ष्म सिंचाई को प्रोत्साहित करती है।
      • राष्ट्रीय जल नीति (संशोधनाधीन): जलवायु सहनशीलता और समन्वित जल शासन पर विशेष बल देती है।

टिकाऊ जल प्रबंधन की रणनीतियाँ:

      • चक्राकार जल प्रबंधन: शहरों में उपयोग किए गए कम से कम 20% जल के पुनः उपयोग को अनिवार्य बनाना।
      • प्रकृति आधारित समाधान: जोहड़, बावड़ी, तालाब, टैंक और आर्द्रभूमि जैसे पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन।
      • कृषि सुधार: कम जल-आवश्यकता वाली फसलोंजैसे मोटे अनाज और दलहनकी ओर फसल विविधीकरण।
      • स्मार्ट तकनीक: जल रिसाव की पहचान हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता, संवेदक तकनीक और भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग।

मुख्य चुनौतियाँ:

      • भूजल की कमी: भारत विश्व में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जहाँ कुल निकासी का 80–90% भाग सिंचाई के लिए होता है।
      • जल प्रदूषण: लगभग 70% सतही जल स्रोत किसी न किसी रूप में दूषित हो चुके हैं।
      • जलवायु परिवर्तन: अनियमित मानसून और हिमालयी हिमनदों का पीछे हटना जल असुरक्षा को और बढ़ा रहा है।
      • खंडित शासन व्यवस्था: विभिन्न संस्थाओं के बीच कमजोर समन्वय प्रभावी जल प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करता है।

निष्कर्ष:

संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि जल की कमी अब केवल तनाव या अस्थायी संकट नहीं रही, बल्कि अनेक क्षेत्रों में यह अपरिवर्तनीय रूप लेती जा रही है। व्यापक मानव पीड़ा और पर्यावरणीय क्षरण को रोकने के लिए टिकाऊ जल प्रबंधन, समन्वित नीतिगत दृष्टिकोण और मजबूत वैश्विक सहयोग अनिवार्य हैं।