संदर्भ:
हाल ही में, विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2026 जारी की, जो सूचकांक का 20वाँ संस्करण है। भारत ने 145 अर्थव्यवस्थाओं में 131वाँ स्थान बरकरार रखा, जबकि आइसलैंड, फिनलैंड और नॉर्वे ने शीर्ष तीन स्थान प्राप्त किए। वैश्विक स्तर पर, लैंगिक अंतर का 69.2% समाप्त हो चुका है, लेकिन WEF का अनुमान है कि वर्तमान गति से पूर्ण लैंगिक समानता प्राप्त करने में अभी भी लगभग 120 वर्ष लग सकते हैं।
वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक के बारे में:
2006 में शुरू किया गया, वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक असमानताओं को चार आयामों में मापता है:
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- आर्थिक भागीदारी और अवसर
- शैक्षिक उपलब्धि
- स्वास्थ्य और उत्तरजीविता
- राजनीतिक सशक्तिकरण
- आर्थिक भागीदारी और अवसर
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सूचकांक समानता-आधारित दृष्टिकोण का उपयोग करता है, जहाँ 100% पूर्ण लैंगिक समानता को दर्शाता है।
भारत का प्रदर्शन:
भारत का समग्र लैंगिक समानता स्कोर 64.5% रहा, जो वैश्विक औसत से कम है। हालांकि, भारत ने 2006 से 4.3 प्रतिशत अंक का सुधार किया है, जो मुख्य रूप से शिक्षा में हुई प्रगति के कारण है।
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- आर्थिक भागीदारी: भारत ने आर्थिक भागीदारी में 41.2% समानता दर्ज की। श्रम-बल भागीदारी में समानता 44.1% रही। पेशेवर और तकनीकी कर्मचारियों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से बढ़ा, जो 2006 में 26.6% से बढ़कर 2026 में 49.9% हो गया। हालांकि, विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13.1% पर कम रहा।
- शैक्षिक उपलब्धि: भारत ने शैक्षिक उपलब्धि में 96.6% समानता हासिल की, जो शिक्षा तक महिलाओं की पहुँच में महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है। हालांकि, आर्थिक भागीदारी में बड़े अंतर का बने रहना यह दर्शाता है कि शैक्षिक उपलब्धियों को रोजगार और नेतृत्व के अवसरों में पूरी तरह परिवर्तित नहीं किया जा सका है।
- स्वास्थ्य और उत्तरजीविता: भारत ने इस आयाम में 95.6% समानता दर्ज की। फिर भी, जन्म के समय लिंगानुपात चिंता का विषय बना हुआ है, जो लैंगिक आधार पर असमानताओं के बने रहने का संकेत देता है।
- राजनीतिक सशक्तिकरण: राजनीतिक सशक्तिकरण भारत का सबसे बेहतर रैंक वाला उप-सूचकांक रहा, जिसमें लैंगिक अंतर का 24.5% समाप्त हुआ और वैश्विक स्तर पर 67वाँ स्थान प्राप्त हुआ। हालांकि, संसद और मंत्रिस्तरीय पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी सीमित है।
- आर्थिक भागीदारी: भारत ने आर्थिक भागीदारी में 41.2% समानता दर्ज की। श्रम-बल भागीदारी में समानता 44.1% रही। पेशेवर और तकनीकी कर्मचारियों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से बढ़ा, जो 2006 में 26.6% से बढ़कर 2026 में 49.9% हो गया। हालांकि, विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के बीच महिलाओं का प्रतिनिधित्व 13.1% पर कम रहा।
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प्रमुख चुनौतियाँ:
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- कम महिला श्रम-बल भागीदारी
- अवैतनिक देखभाल कार्य का असमान बोझ
- लैंगिक वेतन और व्यावसायिक अंतर
- नेतृत्व के पदों पर कम प्रतिनिधित्व
- STEM और उभरती प्रौद्योगिकियों में सीमित भागीदारी
- लगातार बनी हुई सामाजिक और संस्थागत बाधाएँ
- कम महिला श्रम-बल भागीदारी
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सरकारी पहल:
भारत ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मुद्रा, स्टैंड-अप इंडिया, DAY-NRLM के तहत स्वयं सहायता समूह (SHG) कार्यक्रम, मातृत्व संबंधी श्रम सुरक्षा और महिलाओं के राजनीतिक आरक्षण संबंधी उपायों सहित कई कदम उठाए हैं।
आगे की राह:
भारत को महिला विकास से महिला-नेतृत्व वाले विकास की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, जिसके लिए बाल देखभाल के बुनियादी ढाँचे, कार्यस्थल की सुरक्षा, लचीले रोजगार, कौशल विकास, महिला उद्यमिता और नेतृत्व में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में सुधार आवश्यक है। STEM शिक्षा में अधिक निवेश और अवैतनिक देखभाल कार्य की मान्यता महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को और मजबूत कर सकती है।
निष्कर्ष:
वैश्विक लैंगिक अंतर सूचकांक एक महत्वपूर्ण विरोधाभास को उजागर करता है। भारत ने शैक्षिक लैंगिक समानता में पर्याप्त प्रगति की है, लेकिन आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण अभी भी पीछे है। समावेशी विकास और वास्तविक लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए शैक्षिक उपलब्धियों को रोजगार, नेतृत्व और निर्णय लेने की शक्ति में परिवर्तित करना आवश्यक है।

