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Blog / 02 Nov 2026

G20 विदेश मंत्रियों की बैठक 2026

संदर्भ:

हाल ही में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 30–31 अक्टूबर 2026 को अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के अटलांटा में आयोजित G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लिया। इस बैठक की मेजबानी अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने की। भारत ने आतंकवाद, नागरिक जहाजों पर हमलों, वैश्विक संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान से संबंधित चिंताएँ उठाईं।

G20 के बारे में:

      • ग्रुप ऑफ ट्वेंटी (G20) की स्थापना वर्ष 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। वर्ष 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट के मद्देनजर इसे राष्ट्राध्यक्षों एवं शासनाध्यक्षों के शिखर सम्मेलन (Leaders’ Summit) के स्तर पर उन्नत किया गया।
      • इसमें 19 देश, यूरोपीय संघ (EU) और अफ्रीकी संघ (AU) शामिल हैं, जिससे इसके कुल सदस्यों की संख्या 21 हो जाती है। सामूहिक रूप से G20 के सदस्य वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 85%, अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 75% से अधिक और विश्व की लगभग दो-तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। G20 का कोई स्थायी सचिवालय नहीं है और इसकी अध्यक्षता प्रतिवर्ष बदलती रहती है।

G20 Foreign Ministers’ Meeting 2026 -About G20

वर्ष 2026 की बैठक की पृष्ठभूमि:

वर्ष 2026 में G20 की अध्यक्षता अमेरिका के पास है। अटलांटा में विदेश मंत्रियों की बैठक का आयोजन 14–15 दिसंबर 2026 को फ्लोरिडा के मियामी में प्रस्तावित G20 शिखर सम्मेलन से पहले किया गया। चर्चा के प्रमुख क्षेत्रों में वैश्विक आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी नवाचार, अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ शामिल थीं।

चर्चा के प्रमुख मुद्दे:

      • ऊर्जा सुरक्षा: मंत्रियों ने सस्ती, विश्वसनीय और निर्बाध ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता पर चर्चा की। भू-राजनीतिक संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंदेब जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों के आसपास उत्पन्न व्यवधान वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करते हैं।
      • आपूर्ति शृंखला का लचीलापन (Supply Chain Resilience): बैठक में आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने, महत्त्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता में सुधार करने तथा आवश्यक संसाधनों के लिए कुछ विशेष देशों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के महत्त्व को रेखांकित किया गया।
      • समुद्री सुरक्षा: अंतरराष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक स्थिरता के लिए नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) तथा अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से सुरक्षित आवागमन को आवश्यक बताया गया। भारत और लाइबेरिया ने 25 सितंबर 2026 को जहाजरानी एवं नाविकों की सुरक्षा और संरक्षा पर मित्र देशों का समूह (Group of Friends on Safety and Security of Shipping and Seafarers-GoF on S4) शुरू किया। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना, नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को हतोत्साहित करना है।
      • वैश्विक संघर्ष: रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, अमेरिका के टैरिफ और दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों को लेकर मतभेदों का बैठक की चर्चाओं पर प्रभाव पड़ा। बैठक का समापन किसी संयुक्त विज्ञप्ति (Joint Communiqué) के बिना हुआ। इसके स्थान पर अमेरिका ने अध्यक्ष का वक्तव्य (Chair's Statement) जारी किया।

भारत की प्रमुख चिंताएँ:

      • भारत ने इस बात पर जोर दिया कि अल्पकालिक रणनीतिक हितों के लिए आतंकवाद के मुद्दे की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। भारत ने अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के समाधान के लिए सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीति को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।
      • भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानून, विशेष रूप से समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के अनुरूप नौवहन की स्वतंत्रता की रक्षा करने और नागरिक जहाजों पर हमले रोकने पर भी जोर दिया। इस प्रकार के हमलों का विकासशील देशों पर असमान रूप से अधिक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इससे ईंधन, खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की लागत बढ़ जाती है तथा उनकी उपलब्धता कम हो जाती है।

चुनौतियाँ एवं महत्त्व:

समुद्री मार्गों में व्यवधान, आपूर्ति शृंखलाओं का हथियारीकरण (Weaponisation of Supply Chains), बाजार तक सीमित पहुँच और बाजार में विकृतियाँ विकासशील देशों की आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करती हैं। इस बैठक में वैकल्पिक संपर्क मार्गों, विविधीकृत व्यापार मार्गों और लचीली आपूर्ति शृंखलाओं की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।

निष्कर्ष:

G20 विदेश मंत्रियों की बैठक आतंकवाद, भू-राजनीतिक संघर्षों और आर्थिक कमजोरियों से निपटने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्त्व को रेखांकित करती है। कूटनीति, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला के लचीलेपन पर भारत का जोर एक स्थिर, समावेशी और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

 

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