होम > Blog

Blog / 09 Feb 2026

चाबहार बंदरगाह को फंडिंग

संदर्भ:

हाल ही में विदेश मंत्रालय (MEA) ने संसद को जानकारी दी कि भारत ने चाबहार बंदरगाह के विकास के लिए प्रतिबद्ध 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की पूरी राशि का भुगतान कर दिया है। अंतिम किश्त 26 अगस्त 2025 को स्थानांतरित की गई। यह कदम बाहरी प्रतिबंधों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करने के भारत के इरादे को दर्शाता है।

चाबहार बंदरगाह परियोजना के बारे में:

चाबहार एक गहरे पानी का बंदरगाह है, जो ईरान के दक्षिण-पूर्व में ओमान की खाड़ी पर स्थित है। यह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक प्रत्यक्ष समुद्री पहुँच प्रदान करता है, जिससे क्षेत्रीय संपर्क और रणनीतिक पहुँच सुदृढ़ होती है।

दीर्घकालिक अनुबंध:

13 मई 2024 को भारत और ईरान के बीच 10 वर्षों का समझौता हुआ, जिसके तहत इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) को शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के उपकरण लगाने और संचालन की जिम्मेदारी दी गई। इस समझौते के अंतर्गत भारत ने बंदरगाह उपकरण और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता की।

परियोजना का रणनीतिक महत्व:

      • संपर्क और व्यापार: चाबहार, भारत की कनेक्ट सेंट्रल एशिया नीति का प्रमुख आधार है, जो स्थल-रुद्ध (लैंडलॉक्ड) क्षेत्रों तक पहुँच बेहतर बनाता है और व्यापार मार्गों को सुगम करता है।
      • ग्वादर का विकल्प: यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह (जो चीनी सहयोग से विकसित है) के मुकाबले एक रणनीतिक विकल्प प्रदान करता है, जिससे क्षेत्रीय प्रभाव में संतुलन बनता है।
      • आर्थिक और मानवीय सहभागिता: इस बंदरगाह के माध्यम से पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान को गेहूँ और दालों जैसी मानवीय सहायता भेजी जा चुकी है, जो इसकी परिचालन प्रासंगिकता को दर्शाती है।

चुनौतियाँ और भू-राजनीतिक निहितार्थ:

      • अमेरिकी प्रतिबंधों का वातावरण: प्रतिबंध भारतीय कंपनियों और दीर्घकालिक संचालन के लिए अनिश्चितता पैदा करते हैं।
      • बजटीय परिवर्तन: केंद्रीय बजट 2026–27 में आवंटन का अभाव या तो वित्तपोषण की पूर्णता या सतर्क पुनर्संतुलन का संकेत देता है।
      • कूटनीतिक संतुलन: भारत को ईरान और अमेरिकादोनों के साथ संबंधों का सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखते हुए अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करनी होगी।

आगे की राह:

भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह ईरान सहित सभी प्रमुख हितधारकों के साथ निरंतर और सक्रिय कूटनीतिक सहभागिता बनाए रखे, ताकि परियोजना से जुड़ी राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियों को प्रभावी ढंग से संभाला जा सके। चाबहार बंदरगाह की दीर्घकालिक परिचालन व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी, वित्तीय नवाचार और जोखिम-न्यूनन तंत्रों पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तरदक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जोड़ना क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करेगा और यूरेशियाई देशों के साथ भारत के व्यापार, आपूर्ति शृंखला तथा रणनीतिक पहुँच को नई गति प्रदान करेगा।

निष्कर्ष:

चाबहार बंदरगाह के लिए 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता को पूरा करना, जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक अवसंरचना कूटनीति के प्रति प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करता है। प्रतिबंधों और वित्तीय चुनौतियों के बावजूद, यह बंदरगाह पश्चिम और मध्य एशिया में भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी, रणनीतिक स्वायत्तता और विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।