संदर्भ:
हाल ही में, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री पर प्रतिबंध एवं निषेध) विनियम, 2011 में संशोधन का मसौदा प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य ऐसे उत्पादों को “पनीर” के नाम से प्रस्तुत या बाजार में बेचने पर रोक लगाना है, जो दूध से प्राप्त सामग्री के बजाय गैर-दुग्ध घटकों से बनाए जाते हैं। यह मसौदा 24 सितंबर 2026 को अधिसूचित किया गया है और FSSAI ने इस पर हितधारकों तथा आम जनता से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए हैं।
प्रस्तावित संशोधन में क्या कहा गया है?
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- प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री पर प्रतिबंध एवं निषेध) संशोधन विनियम, 2026 में विनियम 2.1.1 के तहत एक नया प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव है, जो विशेष रूप से ऐसे पनीर से संबंधित है जो दूध से प्राप्त घटकों के बजाय अन्य सामग्री से बनाया जाता है।
- वर्तमान में “डेयरी संदर्भ में एनालॉग (Analogue in Dairy Context)” श्रेणी के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्त या पंजीकृत उत्पादों को, यदि वे दूध से प्राप्त नहीं हैं, तो उनके नामकरण, लेबल या विपणन में “पनीर” शब्द का उपयोग करने की अनुमति नहीं होगी।
- इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी खाद्य उत्पाद का नाम और प्रस्तुतीकरण उसकी वास्तविक प्रकृति एवं संरचना को सही रूप से दर्शाए, ताकि उपभोक्ता सोच-समझकर खरीदारी का निर्णय ले सकें।
- प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री पर प्रतिबंध एवं निषेध) संशोधन विनियम, 2026 में विनियम 2.1.1 के तहत एक नया प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव है, जो विशेष रूप से ऐसे पनीर से संबंधित है जो दूध से प्राप्त घटकों के बजाय अन्य सामग्री से बनाया जाता है।
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एनालॉग पनीर क्या है?
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- एनालॉग पनीर एक कारखाने में तैयार किया जाने वाला ऐसा विकल्प है, जिसे पारंपरिक डेयरी पनीर के समान दिखने, बनावट और पकाने के गुणों वाला बनाया जाता है।
- इसमें दूध से प्राप्त सामग्री पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय वनस्पति वसा, स्टार्च, इमल्सीफायर और स्टेबलाइजर जैसे घटकों का उपयोग किया जा सकता है।
- यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि उपभोक्ता “पनीर” नाम देखकर यह मान सकते हैं कि उत्पाद में पारंपरिक डेयरी पनीर जैसी संरचना और पोषण संबंधी विशेषताएं मौजूद हैं।
- एनालॉग पनीर एक कारखाने में तैयार किया जाने वाला ऐसा विकल्प है, जिसे पारंपरिक डेयरी पनीर के समान दिखने, बनावट और पकाने के गुणों वाला बनाया जाता है।
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नियमन क्यों महत्वपूर्ण है?
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- मौजूदा FSSAI व्यवस्था पहले से ही ऐसे कुछ खाद्य उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाती है, जिनमें निर्धारित मानकों के अनुरूप न होने वाले पदार्थ शामिल होते हैं।
- उदाहरण के लिए, 2011 के विनियमों के विनियम 2.1.1 के तहत निर्धारित दूध और दूध से बने उत्पादों में ऐसे पदार्थों की मौजूदगी पर बिक्री संबंधी प्रतिबंध हैं, जो दूध में स्वाभाविक रूप से नहीं पाए जाते हैं, हालांकि नियामकीय अपवाद लागू हो सकते हैं।
- प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विशेष रूप से “पनीर” शब्द के उपयोग को लेकर अधिक स्पष्टता प्रदान करना और गैर-दुग्ध उत्पादों को भ्रामक तरीके से पनीर के रूप में प्रस्तुत किए जाने से रोकना है।
- मौजूदा FSSAI व्यवस्था पहले से ही ऐसे कुछ खाद्य उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाती है, जिनमें निर्धारित मानकों के अनुरूप न होने वाले पदार्थ शामिल होते हैं।
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उपभोक्ता संरक्षण के दृष्टिकोण से महत्व:
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- यह प्रस्ताव सूचित उपभोक्ता विकल्प (Informed Consumer Choice) के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। सही और स्पष्ट लेबलिंग से उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि वे वास्तव में क्या खरीद रहे हैं और वे उत्पादों की संरचना के आधार पर उनकी तुलना कर सकते हैं।
- इससे खाद्य व्यवसायों पर नियामकीय निगरानी को भी मजबूत किया जा सकता है तथा वास्तविक डेयरी उत्पादों और डेयरी एनालॉग उत्पादों के बीच मौजूद भ्रम को कम किया जा सकता है।
- यह प्रस्ताव सूचित उपभोक्ता विकल्प (Informed Consumer Choice) के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है। सही और स्पष्ट लेबलिंग से उपभोक्ताओं को यह समझने में मदद मिलती है कि वे वास्तव में क्या खरीद रहे हैं और वे उत्पादों की संरचना के आधार पर उनकी तुलना कर सकते हैं।
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FSSAI के बारे में:
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) एक वैधानिक प्राधिकरण है, जिसकी स्थापना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के तहत की गई है। यह भारत में खाद्य सुरक्षा और खाद्य मानकों के नियमन एवं पर्यवेक्षण के लिए जिम्मेदार है।
प्रमुख कार्य:
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- विज्ञान आधारित खाद्य मानक निर्धारित करना।
- खाद्य पदार्थों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री को विनियमित करना।
- खाद्य व्यवसायों का लाइसेंस और पंजीकरण करना।
- खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा की निगरानी करना।
- खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं को मान्यता प्रदान करना।
- खाद्य सुरक्षा के संबंध में उपभोक्ता जागरूकता को बढ़ावा देना।
- विज्ञान आधारित खाद्य मानक निर्धारित करना।
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निष्कर्ष:
प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य सही खाद्य लेबलिंग और सूचित उपभोक्ता विकल्प सुनिश्चित करना है। इसके तहत “पनीर” शब्द को दूध से प्राप्त उत्पादों के लिए सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। इन उद्देश्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण, स्पष्ट नियामकीय व्यवस्था और उपभोक्ता जागरूकता महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
