संदर्भ:
हाल ही में भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच लगभग दो दशकों तक चली गहन और जटिल वार्ताओं के बाद एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप दिया गया है।
समझौते की प्रमुख विशेषताएँ:
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- वस्तुओं पर शुल्क में कटौती:
- व्यापार मूल्य के आधार पर लगभग 96 से 99 प्रतिशत वस्तुओं पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क को चरणबद्ध रूप से कम किया जाएगा अथवा पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।
- यूरोपीय संघ में निर्मित वाहनों पर वर्तमान में लगने वाला आयात शुल्क, जो 110 प्रतिशत तक है, उसे कोटा सीमा के अंतर्गत घटाकर लगभग 10 प्रतिशत तक किया जा सकता है।
- वाइन, बीयर और जैतून के तेल जैसे उत्पादों पर भी शुल्क में उल्लेखनीय कटौती की जाएगी।
- व्यापार मूल्य के आधार पर लगभग 96 से 99 प्रतिशत वस्तुओं पर लगाए जाने वाले आयात शुल्क को चरणबद्ध रूप से कम किया जाएगा अथवा पूरी तरह समाप्त किया जाएगा।
- सेवा क्षेत्र में उदारीकरण:
- यूरोपीय कंपनियों को वित्तीय सेवाओं, समुद्री सेवाओं तथा अन्य चुनिंदा सेवा क्षेत्रों में भारत के बाजार तक अधिक व्यापक और सुगम पहुँच प्राप्त होगी।
- यूरोपीय कंपनियों को वित्तीय सेवाओं, समुद्री सेवाओं तथा अन्य चुनिंदा सेवा क्षेत्रों में भारत के बाजार तक अधिक व्यापक और सुगम पहुँच प्राप्त होगी।
- अपवाद और सुरक्षा प्रावधान:
- घरेलू उत्पादकों और किसानों के हितों की रक्षा के लिए कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों, जैसे चीनी और चयनित दुग्ध उत्पादों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है।
- घरेलू उत्पादकों और किसानों के हितों की रक्षा के लिए कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों, जैसे चीनी और चयनित दुग्ध उत्पादों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है।
- वस्तुओं पर शुल्क में कटौती:
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पृष्ठभूमि:
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- भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2007 में रखा गया था। किंतु बाजार पहुँच, शुल्क दरों और गैर-शुल्क बाधाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद होने के कारण वार्ताएँ कई वर्षों तक ठप रहीं।
- दोनों पक्षों की अपेक्षाओं में बड़े अंतर के चलते एक दशक से अधिक समय तक कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी। वर्ष 2022 में नए राजनीतिक उत्साह और आपसी समझ के साथ बातचीत पुनः आरंभ हुई, जिसका परिणाम वर्ष 2026 में एक राजनीतिक समझौते के रूप में सामने आया।
- भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते का प्रस्ताव पहली बार वर्ष 2007 में रखा गया था। किंतु बाजार पहुँच, शुल्क दरों और गैर-शुल्क बाधाओं को लेकर दोनों पक्षों के बीच गहरे मतभेद होने के कारण वार्ताएँ कई वर्षों तक ठप रहीं।
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लाभ और प्रभाव:
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- भारत के लिए:
- निर्यात में वृद्धि: वस्त्र, चमड़ा, रसायन, रत्न एवं आभूषण तथा समुद्री उत्पाद जैसे भारतीय क्षेत्रों को यूरोपीय बाजारों में बेहतर पहुँच प्राप्त होगी, जिससे निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
- प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार: यूरोपीय संघ द्वारा शुल्क घटाए जाने से भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे और बांग्लादेश तथा वियतनाम जैसे देशों के कारण खोई हुई बाजार हिस्सेदारी को पुनः प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
- वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से गहरा जुड़ाव: यूरोप की उन्नत तकनीकों और उच्च गुणवत्ता वाले इनपुट्स तक बेहतर पहुँच से भारत की विनिर्माण क्षमता मजबूत होगी तथा निर्यात प्रदर्शन में सुधार आएगा।
- सेवाएँ और निवेश प्रवाह: भारतीय कंपनियों को यूरोपीय सेवा बाजारों में नए अवसर मिलेंगे, वहीं भारत की तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था में यूरोपीय निवेश के बढ़ने की भी प्रबल संभावना है।
- निर्यात में वृद्धि: वस्त्र, चमड़ा, रसायन, रत्न एवं आभूषण तथा समुद्री उत्पाद जैसे भारतीय क्षेत्रों को यूरोपीय बाजारों में बेहतर पहुँच प्राप्त होगी, जिससे निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
- यूरोपीय संघ के लिए:
- भारत के विशाल बाजार तक पहुँच: यूरोपीय संघ को लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले, तेजी से बढ़ते भारतीय उपभोक्ता बाजार में व्यापक पहुँच प्राप्त होगी।
- निर्यात में वृद्धि और शुल्क बचत: व्यापार बाधाएँ कम होने से यूरोपीय निर्यातकों को प्रति वर्ष लगभग 4 अरब यूरो की शुल्क बचत होने का अनुमान है।
- सेवा क्षेत्र में लाभ और नियामकीय सहयोग: मजबूत बौद्धिक संपदा संरक्षण और वित्तीय व पेशेवर सेवाओं में आसान बाजार प्रवेश से यूरोपीय कंपनियों को उल्लेखनीय लाभ होगा।
- भारत के विशाल बाजार तक पहुँच: यूरोपीय संघ को लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले, तेजी से बढ़ते भारतीय उपभोक्ता बाजार में व्यापक पहुँच प्राप्त होगी।
- भारत के लिए:
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रणनीतिक और भू-राजनीतिक प्रभाव:
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- यह समझौता वैश्विक व्यापार तनावों और कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते संरक्षणवाद के बीच भारत की व्यापार विविधीकरण रणनीति को मजबूती प्रदान करता है।
- यह समझौता ऐसे समय में भारत और यूरोपीय संघ के बीच रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने का संकेत देता है, जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता बनी हुई है।
- यह समझौता वैश्विक व्यापार तनावों और कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते संरक्षणवाद के बीच भारत की व्यापार विविधीकरण रणनीति को मजबूती प्रदान करता है।
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चुनौतियाँ और विचारणीय बिंदु:
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- अनुमोदन प्रक्रिया: समझौते के प्रभावी होने से पूर्व इसे यूरोपीय संघ के सदस्य देशों तथा भारत की संबंधित विधायी और प्रशासनिक संस्थाओं से अनुमोदन प्राप्त करना होगा।
- कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता: कृषि क्षेत्र में सीमित उदारीकरण घरेलू राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक वास्तविकताओं को दर्शाता है।
- समायोजन का दबाव: कुछ भारतीय उद्योगों पर यूरोपीय आयात के कारण अल्पकालिक प्रतिस्पर्धात्मक दबाव उत्पन्न हो सकता है, जिसके समाधान हेतु सहायक और संतुलित नीतिगत उपाय आवश्यक होंगे।
- अनुमोदन प्रक्रिया: समझौते के प्रभावी होने से पूर्व इसे यूरोपीय संघ के सदस्य देशों तथा भारत की संबंधित विधायी और प्रशासनिक संस्थाओं से अनुमोदन प्राप्त करना होगा।
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निष्कर्ष:
भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुआ यह मुक्त व्यापार समझौता व्यापार और कूटनीति के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह भारत की निर्यात क्षमता, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एकीकरण को सुदृढ़ करता है, वहीं यूरोपीय संघ के लिए विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक के द्वार खोलता है। एक बार अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, यह समझौता आने वाले दशक में वैश्विक व्यापार प्रवाह, आर्थिक रणनीतियों और भू-राजनीतिक संतुलनों को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।


