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Blog / 25 Jul 2026

भारत में फास्ट ट्रैक कोर्ट: अर्थ, विशेषताएँ और चुनौतियाँ

संदर्भ:

परीक्षा प्रश्नपत्रों के बार-बार लीक होने को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रश्नपत्र लीक से संबंधित अपराधियों के त्वरित मुकदमे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs) स्थापित करने की घोषणा की। यह कदम लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 का पूरक है, जिसका उद्देश्य प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा धोखाधड़ी पर रोक लगाना है।

फास्ट ट्रैक कोर्ट क्या हैं?

फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs) विशेष न्यायालय हैं, जिन्हें गंभीर अपराधों, लंबे समय से लंबित मामलों तथा जनमहत्त्व के मुद्दों से संबंधित मामलों के शीघ्र निस्तारण को सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया जाता है। ये वर्तमान न्यायिक व्यवस्था के भीतर, सामान्यतः सत्र न्यायालय (Sessions Court) स्तर पर कार्य करते हैं और राज्य कानूनों या उच्च न्यायालय की अधिसूचनाओं के माध्यम से बनाए जाते हैं। केंद्र सरकार नीतिगत एवं वित्तीय सहायता प्रदान करती है, जबकि राज्य सरकारें अपने-अपने उच्च न्यायालयों से परामर्श करके इन न्यायालयों की स्थापना करती हैं।

Fast Track Courts in India

फास्ट ट्रैक कोर्ट का विकास:

      • फास्ट ट्रैक कोर्ट की अवधारणा 11वें वित्त आयोग (2000) द्वारा प्रस्तुत की गई थी, ताकि न्यायालयों में लंबित मामलों, विशेषकर विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) से संबंधित मामलों की संख्या कम की जा सके। 14वें वित्त आयोग (2015) ने जघन्य अपराधों तथा महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और लंबे समय से लंबित विवादों से जुड़े मामलों के लिए 1,800 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की सिफारिश की।
      • वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने निर्भया फंड से वित्तपोषित एक केंद्र प्रायोजित योजना के तहत फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSCs) शुरू किए, ताकि बलात्कार और POCSO मामलों की विशेष रूप से सुनवाई की जा सके। अप्रैल 2026 तक, 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 775 FTSCs, जिनमें 398 विशेष POCSO न्यायालय शामिल हैं, कार्यरत हैं।

महत्त्व:

      • सतत सुनवाई और समयबद्ध मुकदमों के माध्यम से शीघ्र न्याय सुनिश्चित करते हैं।
      • नियमित न्यायालयों को अन्य मामलों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देकर न्यायिक लंबित मामलों को कम करने में सहायता करते हैं।
      • विशेष रूप से बलात्कार और POCSO मामलों में पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाते हैं।
      • न्याय वितरण प्रणाली में जनता के विश्वास को मजबूत करते हैं।
      • संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त त्वरित सुनवाई के अधिकार (Right to Speedy Trial) को सुनिश्चित करते हैं।

चुनौतियाँ:

महत्त्वपूर्ण होने के बावजूद, FTSCs कई बाधाओं का सामना कर रहे हैं:

      • भारी लंबित मामले: दिसंबर 2025 तक, FTSCs में 2,45,579 मामले लंबित थे। वर्ष 2025 में 1,43,936 नए मामले दर्ज हुए, जबकि केवल 66,500 मामलों का निस्तारण हो सका, जिससे लंबित मामलों की संख्या 2.04 लाख से बढ़कर 2.45 लाख हो गई।
      • न्यायाधीशों की कमी और रिक्त पदों को भरने में देरी।
      • अपर्याप्त अवसंरचना, जिसमें पर्याप्त डिजिटल सुविधाओं और समर्पित न्यायालय कक्षों का अभाव शामिल है।
      • कमजोर जांच और अभियोजन के कारण कई राज्यों में कम दोषसिद्धि दर।
      • पुलिस, अभियोजन और फोरेंसिक एजेंसियों के बीच कमजोर समन्वय, जिससे मुकदमों में देरी होती है।
      • FTSC योजना को केवल सितंबर 2026 तक अस्थायी रूप से बढ़ाया गया है, जिससे दीर्घकालिक संस्थागत समर्थन को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

आगे की राह:

न्यायिक रिक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाना चाहिए तथा अस्थायी नियुक्तियों के स्थान पर स्थायी न्यायिक पद सृजित किए जाने चाहिए। समर्पित अवसंरचना, ई-कोर्ट्स मिशन के अंतर्गत डिजिटल केस प्रबंधन तथा पुलिस, अभियोजन, फोरेंसिक प्रयोगशालाओं और न्यायपालिका के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। केंद्र और राज्य सरकारों को निरंतर वित्तीय सहायता सुनिश्चित करनी चाहिए तथा FTSCs को न्यायिक प्रणाली की स्थायी व्यवस्था के रूप में संस्थागत रूप देना चाहिए। परीक्षा प्रश्नपत्र लीक से जुड़े मामलों में FTC मॉडल का विस्तार पर्याप्त जनशक्ति और अवसंरचना के साथ किया जाना चाहिए, ताकि लंबित मामलों में और वृद्धि न हो।

निष्कर्ष:

फास्ट ट्रैक कोर्ट समय पर न्याय सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों, सुदृढ़ अवसंरचना और संस्थागत समर्थन पर निर्भर करती है। न्यायिक देरी को कम करने तथा भारत की न्याय वितरण प्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ाने के लिए इन न्यायालयों को सुदृढ़ बनाना अत्यंत आवश्यक है।

 

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