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Blog / 13 Jul 2026

इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम: E20, लाभ और चुनौतियाँ

संदर्भ:

हाल ही में भारत के एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम ने देशभर में E20 ईंधन (20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल) को अपनाए जाने के बाद विशेष ध्यान आकर्षित किया है। विरोध के बाद सरकार ने कहा कि E20 ईंधन से कुछ वाहनों की ईंधन दक्षता (Fuel Efficiency) में लगभग 3–5% तक कमी आ सकती है, लेकिन इसके साथ स्वच्छ दहन (Cleaner Combustion), उच्च ऑक्टेन रेटिंग (Higher Octane Rating) तथा कम प्रदूषण जैसे महत्वपूर्ण लाभ भी प्राप्त होते हैं।

एथेनॉल क्या है?

      • एथेनॉल (Ethyl Alcohol) एक नवीकरणीय जैव ईंधन (Renewable Biofuel) है, जिसका उत्पादन पौधों से प्राप्त शर्करा (Sugar) एवं स्टार्च (Starch) के किण्वन (Fermentation) द्वारा किया जाता है।
      • इसका मुख्य उपयोग पेट्रोल में मिश्रण के रूप में किया जाता है, जिससे ईंधन की गुणवत्ता में सुधार होता है और हानिकारक उत्सर्जन कम होता है।
      • पेट्रोल में मिश्रण हेतु उपयोग किए जाने वाले एथेनॉल की शुद्धता 99% या उससे अधिक होनी चाहिए। इसका उत्पादन गन्ना, मक्का, चावल, अन्य अनाज तथा कृषि अवशेषों से किया जा सकता है।

एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के बारे में:

एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम भारत सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना तथा स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना है। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति, 2018 के तहत पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा संचालित किया जाता है। भारत ने 2025-26 में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य निर्धारित समय से 5 वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया।

Flex Fuel Vehicles and Ethanol Blending in India

प्रमुख बिंदु:

      • शुरुआत: जनवरी 2003 (पायलट परियोजना), वर्ष 2006 में पूरे देश में विस्तार।
      • एथेनॉल के स्रोत: गन्ने का शीरा, गन्ना, मक्का, चुकंदर, खराब खाद्यान्न तथा कृषि अवशेष (2G एथेनॉल)।
      • मुख्य लाभ: कच्चे तेल के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा की बचत (₹1.4 लाख करोड़ से अधिक), किसानों की आय में वृद्धि, लगभग 30% तक कार्बन उत्सर्जन में कमी तथा ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा।
      • वाहनों पर प्रभाव: E20 ईंधन सुरक्षित माना गया है। हालांकि, कुछ पुराने वाहनों में 3–5% तक माइलेज में मामूली कमी आ सकती है।

जैव ईंधन (Biofuels) की पीढ़ियाँ:

      • प्रथम पीढ़ी:
        • खाद्य फसलों जैसे गन्ना, मक्का एवं शुगर बीट से तैयार किए जाते हैं।
        • उदाहरण: शीरे (Molasses) से बनने वाला एथेनॉल।
        • चिंता: खाद्य बनाम ईंधन (Food vs Fuel) की बहस।
      • द्वितीय पीढ़ी:
        • गैर-खाद्य स्रोतों जैसे कृषि अवशेष, बगास (Bagasse) तथा नगर निगम के ठोस अपशिष्ट (Municipal Waste) से तैयार किए जाते हैं।
        • इससे पराली जलाने की समस्या कम होती है तथा अपशिष्ट से ऊर्जा (Waste-to-Energy) को बढ़ावा मिलता है।
      • तृतीय पीढ़ी:
        • शैवाल (Algae) एवं अन्य जलीय जैव पदार्थ (Aquatic Biomass) से तैयार किए जाते हैं।
        • इनमें कृषि भूमि की आवश्यकता कम होती है तथा कार्बन अवशोषण (Carbon Absorption) की क्षमता अधिक होती है।
      • चतुर्थ पीढ़ी:
        • आनुवंशिक रूप से संशोधित सूक्ष्मजीवों (Genetically Modified Microorganisms) की सहायता से कार्बन-तटस्थ (Carbon-Neutral) ईंधन विकसित किए जाते हैं।

एथेनॉल मिश्रण के लाभ:

      • ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी 88% से अधिक कच्चे तेल की आवश्यकता आयात करता है। एथेनॉल मिश्रण से आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है तथा विदेशी मुद्रा की बचत होती है।
      • किसानों को लाभ: यह कार्यक्रम गन्ना, अनाज तथा अन्य कृषि उत्पादों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराता है, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
      • पर्यावरणीय लाभ: एथेनॉल, पेट्रोल की तुलना में अधिक स्वच्छ ईंधन है। इससे कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन तथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आती है।
      • अपशिष्ट प्रबंधन: 2G एथेनॉल कृषि अवशेषों को ईंधन में परिवर्तित करता है, जिससे पराली जलाने जैसी समस्याओं का समाधान करने में सहायता मिलती है।

चुनौतियाँ:

      • कुछ वाहनों में माइलेज (ईंधन दक्षता) में कमी।
      • पुराने इंजनों के साथ अनुकूलता (Compatibility) की समस्या।
      • गन्ने जैसी अधिक जल-आवश्यकता वाली फसलों पर निर्भरता।
      • खाद्य सुरक्षा (Food Security) से संबंधित चिंताएँ।
      • उन्नत जैव ईंधन (2G एवं 3G) प्रौद्योगिकी के विस्तार की आवश्यकता।

आगे की राह:

भारत को द्वितीय (2G) और तृतीय (3G) पीढ़ी के जैव ईंधनों को बढ़ावा देने, ईंधन-कुशल वाहनों के विकास, एथेनॉल अवसंरचना को मजबूत करने तथा ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कृषि की सततता के बीच संतुलन स्थापित करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

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