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Blog / 25 Sep 2026

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘शत्रु राष्ट्र’ प्रावधान

संदर्भ:

हाल ही में, जापान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में संयुक्त राष्ट्र चार्टर से “शत्रु राष्ट्र” (Enemy States) से संबंधित प्रावधानों को हटाने की अपनी मांग को फिर से उठाया है।

‘शत्रु राष्ट्र’ क्या है?

      • यह शब्द द्वितीय विश्व युद्ध के दौर से जुड़ा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का निर्माण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ था। उस समय मित्र राष्ट्रों का उद्देश्य पूर्व धुरी राष्ट्रों (Axis Powers), विशेष रूप से जर्मनी, इटली और जापान में सैन्यवाद के पुनरुत्थान को रोकना था।
      • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 53, 77 और 107 में इस शब्द का उल्लेख मिलता है। अनुच्छेद 53 के संदर्भ में “शत्रु राष्ट्र” से आशय ऐसे राष्ट्र से है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चार्टर के किसी हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्र का शत्रु था।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘शत्रु राष्ट्र’ प्रावधान

अनुच्छेद 53, 77 और 107 में क्या प्रावधान हैं?

      • अनुच्छेद 53: इसमें “शत्रु राष्ट्र” के विरुद्ध प्रवर्तन कार्रवाई (Enforcement Action) से संबंधित एक अपवाद का प्रावधान है और इस शब्द की परिभाषा को द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ से जोड़ा गया है।
      • अनुच्छेद 77: यह उन क्षेत्रों से संबंधित है, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप शत्रु राष्ट्रों से अलग किया जा सकता था और जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की न्यासिता प्रणाली (Trusteeship System) के अंतर्गत रखा जा सकता था।
      • अनुच्छेद 107: यह द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप उन देशों के विरुद्ध की गई या अधिकृत कार्रवाइयों की वैधता को बनाए रखता है, जो चार्टर के हस्ताक्षरकर्ता देशों के शत्रु थे।

इस प्रकार, ये प्रावधान मुख्य रूप से द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद की सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखकर बनाए गए थे।

जापान इन प्रावधानों को हटाने की मांग क्यों कर रहा है?

      • जापान का तर्क है कि ये प्रावधान अब अप्रासंगिक (Obsolete) हो चुके हैं, क्योंकि जिन देशों पर मूल रूप से ये प्रावधान लागू होते थे, वे अब संयुक्त राष्ट्र के सदस्य हैं और संगठन की गतिविधियों में भाग लेते हैं।
      • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने स्वयं 1995 में माना था कि ‘शत्रु राष्ट्र’ से संबंधित प्रावधान अप्रासंगिक हो चुके हैं और चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया के माध्यम से इन्हें हटाने का इरादा व्यक्त किया था।
      • इसके बाद 2005 के विश्व शिखर सम्मेलन परिणाम दस्तावेज (World Summit Outcome) में भी अनुच्छेद 53, 77 और 107 से “Enemy States” के संदर्भों को हटाने का निर्णय दोहराया गया। हालांकि, प्रस्तावित संशोधन अभी तक लागू नहीं हुए हैं।

इन्हें अब तक क्यों नहीं हटाया गया?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन के लिए अनुच्छेद 108 के तहत एक कठिन प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।

संशोधन के लिए:

      • महासभा में दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना आवश्यक है।
      • इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा इसका अनुसमर्थन (Ratification) किया जाना आवश्यक है।
      • इसमें सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों की स्वीकृति भी आवश्यक है।
      • सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। इसलिए चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया में इन देशों की निर्णायक भूमिका है।
      • चीन और रूस ने जापान से संबंधित अपनी कूटनीतिक बयानबाजी में इन प्रावधानों का उल्लेख जारी रखा है, जबकि जापान का मानना है कि इनका बने रहना वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार से संबंध:

      • जापान की यह मांग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में व्यापक सुधार की उसकी मांग का भी हिस्सा है।
      • जापान का तर्क है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाती है, जबकि आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था काफी बदल चुकी है।
      • जापान ने सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार की सदस्यता का विस्तार करने का समर्थन किया है, ताकि परिषद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और वैध बनाया जा सके।

भारत के लिए प्रासंगिकता:

      • यह मुद्दा भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है।
      • भारत की स्थायी सदस्यता की मांग निम्नलिखित कारकों से जुड़ी है:
        • भारत की बड़ी जनसंख्या और अर्थव्यवस्था।
        • संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में महत्वपूर्ण योगदान।
        • वैश्विक मामलों में भारत की बढ़ती भूमिका।
        • विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व।
        • वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और समावेशी बनाने की आवश्यकता।
      • इस प्रकार, चार्टर के अप्रासंगिक प्रावधानों को हटाने की बहस द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक संस्थाओं में व्यापक सुधार के प्रश्न से जुड़ जाती है।

निष्कर्ष:

“शत्रु राष्ट्र” से संबंधित प्रावधानों का अभी तक बने रहना संयुक्त राष्ट्र की 1945 के बाद की संस्थागत व्यवस्था और वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच मौजूद अंतर को दर्शाता है। इन प्रावधानों को हटाने के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार यह प्रश्न भी उठाता है कि बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप वैश्विक संस्थाएं स्वयं को कितनी प्रभावी ढंग से ढाल सकती हैं।

 

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