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Blog / 23 Oct 2026

उत्सर्जन अंतर रिपोर्ट 2026: मुख्य निष्कर्ष और जलवायु प्रभाव

संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने अपनी उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2026 जारी की। इसमें चेतावनी दी गई है कि पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखना, बिना इस सीमा को महत्त्वपूर्ण रूप से पार किए, अब संभव नहीं रह गया है।

उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट क्या है?

UNEP द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित यह रिपोर्ट अनुमानित वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन और पेरिस समझौते के तापमान संबंधी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक उत्सर्जन स्तरों के बीच के अंतर का आकलन करती है।

वर्ष 2026 का संस्करण इस रिपोर्ट का 17वाँ संस्करण है।

उत्सर्जन अंतराल रिपोर्ट 2026 (Emissions Gap Report 2026)

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

      • वैश्विक उत्सर्जन: वर्ष 2025 में GHG उत्सर्जन 58.4 गीगाटन CO₂ समतुल्य (GtCO₂e) तक पहुँच गया, जो वर्ष 2024 की तुलना में 0.1 GtCO₂e की मामूली कमी दर्शाता है।
      • जीवाश्म ईंधन से उत्सर्जन: समग्र उत्सर्जन में मामूली गिरावट के बावजूद कोयले, तेल और गैस से होने वाला CO₂ उत्सर्जन लगातार बढ़ता रहा।
      • प्रमुख योगदानकर्ता: अफ्रीकी संघ को छोड़कर G20 के सदस्य देशों का वैश्विक उत्सर्जन में 76% योगदान रहा। भूमि उपयोग में परिवर्तन को छोड़कर इनका उत्सर्जन वर्ष 2025 में 0.7% बढ़ गया।
      • उत्सर्जन की प्रवृत्तियाँ: पिछले दशक में 63 देशों ने उत्सर्जन में कमी दर्ज की, जबकि 124 देशों में उत्सर्जन में वृद्धि दर्ज की गई।
      • तापमान संबंधी रिकॉर्ड: वर्ष 2024 में वैश्विक तापमान 1.5°C के स्तर को पार कर गया, जो जलवायु कार्रवाई की तात्कालिकता को रेखांकित करता है।

1.5°C का लक्ष्य महत्त्वपूर्ण क्यों है?

पेरिस समझौते के तहत 1.5°C की सीमा का उद्देश्य जलवायु संबंधी जोखिमों को सीमित करना है। इस सीमा को पार करने से अत्यधिक गर्मी की लहरों, बाढ़, सूखे, समुद्र-स्तर में वृद्धि और जैव विविधता के नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।

आवश्यक कदम:

      • न्यूनतम संभावित सीमा-अतिक्रमण (Overshoot) के साथ 1.5°C के मार्ग पर वापस लौटने के लिए वैश्विक GHG उत्सर्जन में वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में निम्नलिखित कमी आवश्यक है:
        • वर्ष 2030 तक 18%
        • वर्ष 2035 तक 45%
        • वर्ष 2040 तक 69%
      • सदी के अंत तक तापमान को वापस 1.5°C या उससे नीचे लाने के लिए बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन (Carbon Dioxide Removal) भी आवश्यक होगा।

चुनौतियाँ:

      • जीवाश्म ईंधनों पर निरंतर निर्भरता।
      • अपर्याप्त जलवायु नीतियाँ और उत्सर्जन में कमी लाने संबंधी प्रतिबद्धताएँ।
      • विभिन्न देशों के बीच ऐतिहासिक जिम्मेदारी और उत्सर्जन में असमानता।
      • विकासशील देशों में वित्तीय और तकनीकी बाधाएँ।
      • उत्सर्जन-गहन बुनियादी ढाँचे की निगरानी और उन्नयन में कठिनाई।

आगे की राह:

      • नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण में तेजी लाना और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से कम करना।
      • पेरिस समझौते के तहत राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को मजबूत करना।
      • विकासशील देशों को जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में वृद्धि करना।
      • ऊर्जा दक्षता, सतत परिवहन और वन संरक्षण को बढ़ावा देना।
      • तत्काल उत्सर्जन कटौती को प्राथमिकता देते हुए विश्वसनीय कार्बन निष्कासन प्रौद्योगिकियों का विकास करना।

भारत के लिए महत्त्व:

भारत को जलवायु कार्रवाई के साथ-साथ विकास और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, ऊर्जा दक्षता में सुधार, हरित हाइड्रोजन को बढ़ावा देना और वनों का संरक्षण भारत की जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सहायता कर सकते हैं। जलवायु समानता और साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों एवं संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत के अनुरूप विकसित देशों को पर्याप्त वित्तीय सहायता और प्रौद्योगिकी उपलब्ध करानी चाहिए।

निष्कर्ष:

यह रिपोर्ट संकेत देती है कि 1.5°C की सीमा को पूरी तरह पार होने से रोकना अब व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है। अब प्राथमिकता तत्काल उत्सर्जन कटौती, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई के माध्यम से इस सीमा के अतिक्रमण की मात्रा और अवधि को न्यूनतम करने पर होनी चाहिए।

 

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