संदर्भ:
हाल ही में डस्की ईगल-उल्लू (Dusky Eagle-Owl) को लगभग 15 वर्षों के अंतराल के बाद उत्तराखंड के तराई पश्चिम वन प्रभाग (Terai West Forest Division) के फाटो पर्यटन क्षेत्र में देखा गया है, जो जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय पार्क के आसपास स्थित कॉर्बेट परिदृश्य का हिस्सा है।
डस्की ईगल-उल्लू के बारे में-
डस्की ईगल-उल्लू स्ट्रिगिडी (Strigidae) परिवार से संबंधित है। अधिकांश उल्लू प्रजातियों के विपरीत, जो पूरी तरह निशाचर (Nocturnal) होती हैं, यह आंशिक रूप से दिवाचर (Partly Diurnal) भी है। इसका अर्थ है कि यह विशेष रूप से बादल वाले मौसम में दिन के समय भी शिकार कर सकता है। 
आवास और वितरण-
- यह प्रजाति दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से पाई जाती है, जिनमें भारत, नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ क्षेत्र शामिल हैं।
- यह मुख्यतः निम्नभूमि के नदी तटीय जंगलों (Riparian Forests), वृक्षारोपण क्षेत्रों और पुराने वनों में निवास करना पसंद करती है, जो जल स्रोतों के निकट होते हैं।
- सामान्यतः यह समतल क्षेत्रों में लगभग 250 मीटर की ऊँचाई तक पाई जाती है।
संरक्षण स्थिति:
IUCN रेड लिस्ट: कम चिंताजनक (Least Concern)
प्रमुख विशेषताएँ:
शारीरिक विशेषताएँ-
- यह एक बड़ा धूसर-भूरा उल्लू है जिसकी लंबाई लगभग 48–58 सेमी होती है और इसकी चमकीली पीली आँखें इसकी पहचान हैं।
- इसमें लंबे कान जैसे गुच्छे (Ear Tufts), निचले भाग पर महीन धारियाँ तथा सफेद कंधे के धब्बे होते हैं, जो इसे प्राकृतिक वातावरण में छिपने (Camouflage) में मदद करते हैं।
आहार और व्यवहार-
- यह एक शीर्ष शिकारी (Apex Predator) के रूप में कार्य करता है और इसका आहार विविध होता है, जिसमें पक्षी, छोटे स्तनधारी, मछलियाँ, सरीसृप और कीट शामिल हैं।
- यह अक्सर अपना घोंसला स्वयं बनाने के बजाय चील, गिद्ध या बाज जैसे अन्य पक्षियों द्वारा बनाए गए पुराने टहनियों के घोंसलों का पुनः उपयोग करता है।
- सामान्यतः एक बार में 1 से 3 अंडे देता है।
ध्वनि (Vocalisation)
- इसकी आवाज़ धीमी, भारी और गले से निकलने वाली ध्वनियों से बनी होती है, जो धीरे-धीरे तेज और तीव्र होती जाती हैं और फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं।
पारिस्थितिक महत्व:
डस्की ईगल-उल्लू को अक्सर “लिटमस टेस्ट प्रजाति” माना जाता है, क्योंकि इसकी उपस्थिति स्वस्थ और कम व्यवधान वाले पारिस्थितिकी तंत्र तथा पर्याप्त शिकार उपलब्धता का संकेत देती है।
इसका स्वभाव अत्यंत छिपा हुआ (Elusive) होता है और इसका उत्कृष्ट छद्मावरण (Camouflage) इसे उसके ज्ञात आवासों में भी देखना कठिन बना देता है।
कॉर्बेट क्षेत्र में इसकी हालिया उपस्थिति यह दर्शाती है कि उत्तराखंड के वनों में आवास संरक्षण, मानव हस्तक्षेप में कमी और प्राकृतिक गलियारों के पुनर्स्थापन के प्रयास सफल हो रहे हैं। यह तराई क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को भी रेखांकित करता है, जो केवल बाघों के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य वन्यजीव प्रजातियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष-
उत्तराखंड में 15 वर्षों बाद डस्की ईगल-उल्लू का पुनः दिखाई देना निरंतर संरक्षण प्रयासों और प्रभावी आवास प्रबंधन के महत्व को दर्शाता है। ऐसी घटनाएँ न केवल प्रजातियों के वितरण के वैज्ञानिक अध्ययन को समृद्ध करती हैं, बल्कि उन संवेदनशील वन पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं, जो भारत की समृद्ध जैव विविधता को बनाए रखते हैं।
