सुप्रीम कोर्ट ने भारत में दालों और फसल विविधीकरण पर ज़ोर दिया
संदर्भ:
हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कृषि में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को बढ़ावा देने और किसानों को गेहूँ व धान जैसी अधिक जल-खपत वाली फसलों की बजाय दलहनों (Pulses) की खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने की सलाह दी है। यह टिप्पणी उस याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसे एक किसान संगठन ने घरेलू दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए नीतिगत बदलाव की मांग करते हुए दायर किया था।
नीतिगत पृष्ठभूमि:
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- भारत की कृषि नीति ऐतिहासिक रूप से गेहूँ और चावल के उत्पादन पर केंद्रित रही है। इसका मुख्य कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत सुनिश्चित सरकारी खरीद है। हालाँकि, इससे कई क्षेत्रों विशेषकर उत्तर भारत में एकल फसल प्रणाली (Monocropping) को बढ़ावा मिला है। इसके परिणामस्वरूप कई समस्याएँ सामने आई हैं, जैसे “भूजल का अत्यधिक दोहन, मिट्टी की उर्वरता में कमी, पारिस्थितिक असंतुलन।
- अदालत ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने के प्रयासों के बावजूद किसान गेहूँ और धान को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि इनकी खरीद व्यवस्था स्थिर है और कीमत सुनिश्चित रहती है। इसके विपरीत, दलहन उत्पादकों को अक्सर अनिश्चित बाजार और उचित मूल्य पर अपनी उपज बेचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- भारत की कृषि नीति ऐतिहासिक रूप से गेहूँ और चावल के उत्पादन पर केंद्रित रही है। इसका मुख्य कारण न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत सुनिश्चित सरकारी खरीद है। हालाँकि, इससे कई क्षेत्रों विशेषकर उत्तर भारत में एकल फसल प्रणाली (Monocropping) को बढ़ावा मिला है। इसके परिणामस्वरूप कई समस्याएँ सामने आई हैं, जैसे “भूजल का अत्यधिक दोहन, मिट्टी की उर्वरता में कमी, पारिस्थितिक असंतुलन।
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दलहन खेती का महत्व:
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- पर्यावरणीय स्थिरता: दलहन की फसलें धान की तुलना में कम पानी की आवश्यकता रखती हैं, जिससे भूजल संरक्षण में मदद मिलती है।
- मिट्टी का स्वास्थ्य: दलहन नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) करने वाली फसलें हैं, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं।
- पोषण सुरक्षा: भारत की मुख्यतः शाकाहारी आबादी के लिए दलहन प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत है।
- आयात पर निर्भरता में कमी: घरेलू उत्पादन बढ़ने से दलहन के आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।
- पर्यावरणीय स्थिरता: दलहन की फसलें धान की तुलना में कम पानी की आवश्यकता रखती हैं, जिससे भूजल संरक्षण में मदद मिलती है।
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फसल विविधीकरण क्या है?
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- फसल विविधीकरण का अर्थ है एक ही खेत में विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती करना या किसी एक प्रमुख फसल के स्थान पर कई अलग-अलग फसलों को अपनाना।
- इसमें केवल गेहूँ या चावल पर निर्भर रहने के बजाय दलहन, तिलहन, फल, सब्जियाँ और मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसी फसलों को शामिल किया जाता है।
- यह रणनीति किसानों को बदलती जलवायु, आर्थिक परिस्थितियों और पर्यावरणीय चुनौतियों के अनुकूल बनने में मदद करती है।
- फसल विविधीकरण का अर्थ है एक ही खेत में विभिन्न प्रकार की फसलों की खेती करना या किसी एक प्रमुख फसल के स्थान पर कई अलग-अलग फसलों को अपनाना।
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फसल विविधीकरण के लाभ:
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- पर्यावरणीय स्थिरता: अलग-अलग फसलें मिट्टी के पोषक तत्वों का अलग-अलग तरीके से उपयोग करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और भूमि क्षरण कम होता है।
- जल संरक्षण: धान जैसी फसलें अत्यधिक सिंचाई की मांग करती हैं। इसके विपरीत दलहन, मिलेट्स और तिलहन कम पानी में भी उगाई जा सकती हैं, जिससे भूजल का संरक्षण होता है।
- किसानों के जोखिम में कमी: कई प्रकार की फसलों की खेती करने से कीट, रोग या जलवायु आपदा के कारण पूरी फसल नष्ट होने का जोखिम कम हो जाता है।
- अधिक और स्थिर आय: विविध फसलें किसानों को अलग-अलग बाजारों में उत्पाद बेचने का अवसर देती हैं, जिससे आय में वृद्धि और स्थिरता आती है।
- पोषण सुरक्षा: दलहन, फल, सब्जियाँ और मिलेट्स के उत्पादन से खाद्य प्रणाली में प्रोटीन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
- पर्यावरणीय स्थिरता: अलग-अलग फसलें मिट्टी के पोषक तत्वों का अलग-अलग तरीके से उपयोग करती हैं, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और भूमि क्षरण कम होता है।
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निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ भारत में सतत कृषि (Sustainable Agriculture) और कृषि नीति में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। दलहन खेती को बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य, प्रभावी खरीद व्यवस्था और संतुलित आयात नीति के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाए तो इससे किसानों की आय में स्थिरता, पर्यावरणीय संरक्षण और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

