महिला आरक्षण लागू करने के लिए 2011 जनगणना आधारित परिसीमन पर विचार
संदर्भ:
हाल ही में केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि वह एक संशोधन विधेयक लाने की योजना बना रही है, जिसमें 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन का प्रस्ताव शामिल होगा, ताकि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को लागू किया जा सके। प्रस्तावित संशोधनों के तहत लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है, जिनमें से महिलाओं के लिए 273 सीटें आरक्षित हो सकती है।
महिला आरक्षण के बारे में:
2023 में पारित महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 (जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम भी कहा जाता है) लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है। हालांकि, इसके कार्यान्वयन के लिए दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं, अगली जनगणना और उसके बाद परिसीमन।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना, ताकि जनसंख्या में हुए बदलाव को समायोजित किया जा सके। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के अनुपात के अनुसार न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
2011 की जनगणना पर विचार क्यों?
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- केंद्र सरकार ताज़ा जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किए बिना 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने की संभावना पर विचार कर रही है। इससे महिला आरक्षण को तेजी से लागू किया जा सकता है और इसे 2029 के आम चुनाव से पहले लागू करने का प्रावधान हो सकता है।
- हालांकि, इस प्रस्ताव से कुछ चिंताएँ भी सामने आई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने आंकड़ों पर आधारित परिसीमन से विशेष रूप से तेजी से विकसित हो रहे शहरी और उप-शहरी क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व असंतुलित हो सकता है।
- केंद्र सरकार ताज़ा जनगणना के आंकड़ों का इंतजार किए बिना 2011 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग करने की संभावना पर विचार कर रही है। इससे महिला आरक्षण को तेजी से लागू किया जा सकता है और इसे 2029 के आम चुनाव से पहले लागू करने का प्रावधान हो सकता है।
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राजनीतिक और संघीय दृष्टिकोण:
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- दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या आधारित परिसीमन को लेकर चिंता जताई है। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें आशंका है कि उनकी संसदीय सीटों में कमी आ सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को लाभ मिल सकता है।
- इससे लंबे समय से चल रही उत्तर-दक्षिण विभाजन की बहस फिर से तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि ऐसा परिसीमन उन राज्यों के साथ अन्याय हो सकता है जिन्होंने जनसांख्यिकीय सुधारों में बेहतर प्रदर्शन किया है।
- दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या आधारित परिसीमन को लेकर चिंता जताई है। जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें आशंका है कि उनकी संसदीय सीटों में कमी आ सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले उत्तरी राज्यों को लाभ मिल सकता है।
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संवैधानिक और कानूनी पहलू:
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- संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर किया जाना था। हालांकि, प्रस्तावित संशोधन 2011 के आंकड़ों के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं, जिससे नई जनगणना की प्रतीक्षा किए बिना परिसीमन संभव हो सके। इसमें राज्य विधानसभाओं के विस्तार का प्रावधान भी शामिल हो सकता है।
- ऐसे किसी भी कदम के लिए कानूनी आधार और व्यापक राजनीतिक सहमति आवश्यक होगी, क्योंकि इसके प्रभाव दूरगामी होंगे।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर किया जाना था। हालांकि, प्रस्तावित संशोधन 2011 के आंकड़ों के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं, जिससे नई जनगणना की प्रतीक्षा किए बिना परिसीमन संभव हो सके। इसमें राज्य विधानसभाओं के विस्तार का प्रावधान भी शामिल हो सकता है।
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आगे की राह:
सरकार को महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने और संघीय संतुलन बनाए रखने के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। इसके लिए राज्यों के बीच सहमति बनाना, सीटों के आवंटन और आरक्षण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना तथा भविष्य के लिए जनगणना कार्यों को तेज करना आवश्यक होगा, जिससे अधिक समावेशी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
निष्कर्ष:
केंद्र सरकार का महिला आरक्षण को लागू करने का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया और समय को लेकर विवाद बना हुआ है। 2011 की जनगणना के आधार पर निर्णय लेने से प्रक्रिया तेज हो सकती है, परंतु यदि इसे व्यापक परामर्श और पारदर्शिता के साथ लागू नहीं किया गया, तो यह राजनीतिक मतभेदों को और बढ़ा सकता है।

