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Blog / 30 May 2026

गिर में एशियाई शेर के शावकों की मृत्यु:बेबेसिया संक्रमण और संरक्षण की चुनौतियाँ

संदर्भ:

हाल ही में गुजरात के गिर क्षेत्र में आठ एशियाई शेर के शावकों की मृत्यु संदिग्ध बैबेसिया संक्रमण के कारण हुई है। ये मामले मुख्य रूप से गिर सोमनाथ और अमरेली जिलों के राजस्व क्षेत्रों से रिपोर्ट किए गए हैं।

बैबेसियोसिस क्या है?

      • बैबेसियोसिस (Babesiosis) एक दुर्लभ लेकिन गंभीर टिक-जनित (संक्रमित कीड़ों के काटने से होने वाली) बीमारी है, जो 'बेबेसिया' (Babesia) नामक सूक्ष्म प्रोटोजोआ परजीवी के कारण होती है। यह परजीवी सीधे मानव या जानवरों की लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) को संक्रमित करके उन्हें नष्ट कर देता है, जिससे एनीमिया (खून की कमी) जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।
      • वर्ष 2018 में गिर क्षेत्र में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (CDV) और बैबेसियोसिस के सह-संक्रमण के कारण कई शेरों की मृत्यु दर्ज की गई थी, जिससे इसकी गंभीरता और अधिक स्पष्ट हुई।

एशियाई शेरों की संरक्षण स्थिति:

एशियाई शेर (वैज्ञानिक नाम: Panthera leo persica) केवल भारत के गुजरात राज्य में पाए जाते हैं। इनका मुख्य प्राकृतिक आवास गिर राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य है। आकार में ये अफ्रीकी शेरों से थोड़े छोटे होते हैं और इनके पेट पर त्वचा की एक विशिष्ट लंबवत (उभरी हुई) तह होती है।

      • आईयूसीएन रेड लिस्ट: सुभेद्य (Vulnerable)
      • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची I (सर्वोच्च संरक्षण)
      • CITES: परिशिष्ट I
      • आवास: केवल गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में, मुख्यतः गिर राष्ट्रीय उद्यान और आसपास के क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
      • आबादी: हाल के अनुमानों के अनुसार लगभग 891 शेर।

प्रमुख चिंता:

      • महामारी के प्रति संवेदनशीलता: यदि एक ही बीमारी फैलती है तो पूरी आबादी को खतरा हो सकता है क्योंकि शेर एक ही क्षेत्र में सीमित हैं।
      • राजस्व क्षेत्रों में विस्तार: शेर अब संरक्षित जंगलों से बाहर मानव-प्रधान क्षेत्रों में भी जाने लगे हैं, जिससे रोग संक्रमण और मानव-वन्यजीव संघर्ष का खतरा बढ़ रहा है।
      • कम आनुवंशिक विविधता: सीमित प्रजनन के कारण इनब्रीडिंग होती है, जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता और अनुकूलन क्षमता घटती है।

पारिस्थितिक और प्रबंधन चुनौतियाँ:

      • पशुधन के साथ बढ़ती निकटता से रोगों का अंतर-प्रजातीय प्रसार बढ़ता है।
      • मानव-आबादी वाले क्षेत्रों में निगरानी करना कठिन होता है।
      • जंगली क्षेत्रों में किलनी नियंत्रण जटिल और संसाधन-गहन है।
      • पहले हुए CDV जैसे प्रकोप दिखाते हैं कि मृत्यु दर तेजी से बढ़ सकती है।

आगे की राह:

      • सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार कुनो राष्ट्रीय उद्यान में दूसरी आबादी स्थापित करना दीर्घकालिक संरक्षण के लिए आवश्यक है, ताकि एक ही स्थान पर केंद्रित आबादी के जोखिम को कम किया जा सके। इसके साथ ही वन हेल्थ दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है, जिसमें मानव, पशुधन और वन्यजीव स्वास्थ्य को एक साथ जोड़ा जाता है ताकि ज़ूनोटिक और वेक्टर जनित रोगों को रोका जा सके।
      • इसके अलावा, आसपास के क्षेत्रों में नियमित एंटी-टिक अभियान और पशुधन का टीकाकरण भी रोग प्रसार को कम करने में महत्वपूर्ण हैं। गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर जैसी संस्थाओं के माध्यम से जीनोमिक निगरानी को मजबूत करना भी रोग पैटर्न और उत्परिवर्तन की पहचान में मदद करेगा।

निष्कर्ष:

गिर में शेर के शावकों की मृत्यु केवल एक स्थानीय वन्यजीव स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह इस बात का चेतावनी संकेत है कि किसी प्रजाति को एक ही आवास में केंद्रित रखना कितना जोखिमपूर्ण हो सकता है। यदि आवास का विविधीकरण, मजबूत रोग निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन तुरंत नहीं अपनाया गया, तो एशियाई शेरों के दीर्घकालिक अस्तित्व पर गंभीर अनिश्चितता उत्पन्न हो सकती है।

 

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