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Blog / 14 Aug 2026

क्रीमी लेयर और SC/ST के बीच उप-वर्गीकरण

संदर्भ:

हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के लिए क्रीमी लेयरसिद्धांत लागू करने की मांग का विरोध किया है। यह मुद्दा एक जनहित याचिका (PIL) से उठा, जिसमें सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत परिवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर करने की मांग की गई थी।

क्रीमी लेयर क्या है?

क्रीमी लेयर से आशय किसी पिछड़े वर्ग के अपेक्षाकृत उन्नत वर्गों से है, जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी मामले (1992) के फैसले में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू किया था। न्यायालय ने माना था कि क्रीमी लेयर का सिद्धांत OBCs पर लागू होता है और इसे SCs तथा STs तक विस्तारित नहीं किया जा सकता।

Creamy Layer and Sub-Categorisation among SCs-STs

केंद्र SCs/STs के लिए इसका विरोध क्यों करता है?

केंद्र का तर्क है कि SCs और STs को होने वाली वंचना केवल आर्थिक पिछड़ेपन से अलग और अधिक व्यापक है।

      • SCs को ऐतिहासिक रूप से अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा है।
      • STs को भौगोलिक अलगाव, विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक पिछड़ेपन के कारण नुकसान उठाना पड़ा है।

इसलिए, केवल आर्थिक रूप से आगे बढ़ जाना इस बात का प्रमाण नहीं हो सकता कि जाति या समुदाय आधारित सामाजिक वंचना पूरी तरह समाप्त हो गई है।

SCs/STs का उप-वर्गीकरण:

      • उप-वर्गीकरण का अर्थ है किसी व्यापक आरक्षित वर्ग को छोटे-छोटे समूहों में विभाजित करना, ताकि आरक्षण के लाभ का अधिक समान वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
      • 2024 में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में, सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों और ठोस अनुभवजन्य (empirical) प्रमाणों के अधीन SCs/STs के भीतर उप-वर्गीकरण की अनुमति दी।
      • इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपेक्षाकृत कम प्रतिनिधित्व वाले और अधिक वंचित समुदाय आरक्षण के लाभ से वंचित न रह जाएं, जबकि लाभ का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत बेहतर प्रतिनिधित्व वाले समूहों तक सीमित न हो।

उप-वर्गीकरण का विवादास्पद इतिहास:

      • यह मुद्दा लंबे समय से विवादास्पद रहा है, क्योंकि कुछ राज्यों का तर्क रहा है कि कुछ SC समुदायों को आरक्षण के लाभ का अनुपातहीन रूप से बड़ा हिस्सा मिला है।
      • हालांकि, आलोचकों को आशंका है कि आंतरिक वर्गीकरण से SC समुदायों में विभाजन बढ़ सकता है और इसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है।
      • इसके अलावा, अनुच्छेद 341 और 342 SCs और STs की पहचान के लिए संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करते हैं। अधिसूचित सूचियों में बदलाव करने की शक्ति संसद के पास है।

क्रीमी लेयर बनाम उप-वर्गीकरण:

क्रीमी लेयर

उप-वर्गीकरण

अपेक्षाकृत उन्नत व्यक्तियों/परिवारों को बाहर करता है

विभिन्न उप-समूहों के बीच लाभ का वितरण करता है

सामाजिक/आर्थिक उन्नति पर ध्यान देता है

सापेक्ष पिछड़ेपन पर ध्यान देता है

मुख्य रूप से OBCs से जुड़ा है

SCs/STs के संदर्भ में तेजी से चर्चा में है

आरक्षण के पात्र लाभार्थियों की संख्या कम करता है

उसी आरक्षित वर्ग के भीतर लाभ का पुनर्वितरण करता है

पक्ष और विपक्ष में तर्क:

      • क्रीमी लेयर के पक्ष में: यह आरक्षण के लाभों पर अभिजात वर्ग के वर्चस्व को रोक सकता है, पीढ़ियों के बीच समानता को बढ़ावा दे सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि आरक्षण का लाभ सबसे अधिक वंचित लोगों तक पहुंचे।
      • विरोध में: आर्थिक रूप से उन्नत होने के बावजूद जातिगत भेदभाव जारी रह सकता है। आरक्षण केवल गरीबी दूर करने का साधन नहीं है और आय सामाजिक कलंक तथा जातिगत भेदभाव को पूरी तरह नहीं माप सकती।

आगे की राह:

एक संतुलित दृष्टिकोण के लिए विश्वसनीय जाति एवं सामाजिक-आर्थिक आंकड़े, पारदर्शी मानदंड, समय-समय पर समीक्षा और संवैधानिक सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं। आर्थिक स्थिति को जाति-आधारित वंचना का एकमात्र आधार नहीं माना जाना चाहिए।

निष्कर्ष:

यह चर्चा वास्तविक/सार्थक समानता (Substantive Equality) हासिल करने की व्यापक चुनौती को दर्शाती है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) का लाभ उन लोगों तक पहुंचे जो अब भी संरचनात्मक रूप से वंचित हैं, साथ ही सामाजिक न्याय के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता भी बनी रहे।

 

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