संदर्भ:
बर्लिन स्थित नागरिक संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) 2025 में भारत को 182 देशों में 91वाँ स्थान प्राप्त हुआ है। भारत का स्कोर 0 से 100 के पैमाने पर 39 रहा। इस सूचकांक में 0 का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट सार्वजनिक क्षेत्र से है, जबकि 100 का अर्थ अत्यंत स्वच्छ और पारदर्शी सार्वजनिक व्यवस्था को दर्शाता है।
सीपीआई क्या मापता है?
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- भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की धारणा का आकलन करता है। इसके लिए विश्व बैंक, विश्व आर्थिक मंच तथा अन्य प्रतिष्ठित शोध संस्थानों सहित 13 स्वतंत्र स्रोतों के आकलनों का उपयोग किया जाता है। ये आकलन विशेषज्ञों और व्यापारिक समुदाय के प्रमुखों की धारणाओं पर आधारित होते हैं, जो सार्वजनिक संस्थानों और शासन प्रणाली में भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर अपनी राय व्यक्त करते हैं।
- वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दो-तिहाई से अधिक देशों का स्कोर 50 से कम है। यह तथ्य दर्शाता है कि वैश्विक स्तर पर भ्रष्टाचार को लेकर नकारात्मक धारणा अब भी बनी हुई है। साथ ही, वैश्विक औसत सीपीआई स्कोर घटकर 42 रह गया है, जो यह संकेत देता है कि भ्रष्टाचार-रोधी प्रयासों में या तो ठहराव है या कई देशों में स्थिति और खराब हुई है।
- भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की धारणा का आकलन करता है। इसके लिए विश्व बैंक, विश्व आर्थिक मंच तथा अन्य प्रतिष्ठित शोध संस्थानों सहित 13 स्वतंत्र स्रोतों के आकलनों का उपयोग किया जाता है। ये आकलन विशेषज्ञों और व्यापारिक समुदाय के प्रमुखों की धारणाओं पर आधारित होते हैं, जो सार्वजनिक संस्थानों और शासन प्रणाली में भ्रष्टाचार की स्थिति को लेकर अपनी राय व्यक्त करते हैं।
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भारत का प्रदर्शन: संरचनात्मक चुनौतियों के बीच सीमित सुधार:
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- भारत का 91वाँ स्थान पिछले वर्ष की तुलना में पाँच स्थान का सुधार दर्शाता है तथा उसके स्कोर में एक अंक की वृद्धि हुई है। यद्यपि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन भारत अब भी वैश्विक औसत से नीचे बना हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन से जुड़ी कई संरचनात्मक समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।
- विशेषज्ञों के अनुसार, सुधार की धीमी गति के पीछे प्रशासनिक अपारदर्शिता, नीति और निर्णय-प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों के असमान और कमजोर क्रियान्वयन जैसे कारण प्रमुख हैं। इसी कारण भ्रष्टाचार को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की एक गहरी और प्रणालीगत समस्या के रूप में देखा जाता है।
- रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत उन देशों में शामिल है जहाँ भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए जोखिम अपेक्षाकृत अधिक है। खोजी पत्रकारिता के दौरान मीडिया कर्मियों को धमकी, दबाव या हिंसा का सामना करना पड़ सकता है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था कमजोर पड़ने की आशंका बनी रहती है।
- भारत का 91वाँ स्थान पिछले वर्ष की तुलना में पाँच स्थान का सुधार दर्शाता है तथा उसके स्कोर में एक अंक की वृद्धि हुई है। यद्यपि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन भारत अब भी वैश्विक औसत से नीचे बना हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन से जुड़ी कई संरचनात्मक समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।
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भारत में संस्थागत और कानूनी ढाँचा:
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- भारत में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक विस्तृत और बहु-स्तरीय संस्थागत तथा कानूनी ढाँचा विकसित किया गया है:
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013: यह अधिनियम केंद्र और राज्यों में सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जाँच के लिए लोकपाल और लोकायुक्त संस्थानों की स्थापना का प्रावधान करता है।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी): यह केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में सतर्कता प्रशासन की निगरानी करने वाला शीर्ष पर्यवेक्षी निकाय है।
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई): यह देश की प्रमुख जाँच एजेंसी है, जो भ्रष्टाचार और उससे जुड़े मामलों की जाँच करती है।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018): यह रिश्वतखोरी से संबंधित प्रमुख कानून है। वर्ष 2018 के संशोधन के बाद इसमें रिश्वत देने को भी अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया।
- धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002: यह कानून अवैध धन के शोधन को रोकने और अपराध से अर्जित संपत्तियों को जब्त करने का प्रावधान करता है।
- व्हिसलब्लोअर (Whistle Blowers) संरक्षण अधिनियम, 2014: यह अधिनियम भ्रष्टाचार की जानकारी देने वाले व्यक्तियों को प्रतिशोध और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करता है।
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013: यह अधिनियम केंद्र और राज्यों में सार्वजनिक पदाधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की जाँच के लिए लोकपाल और लोकायुक्त संस्थानों की स्थापना का प्रावधान करता है।
- यह बहु-स्तरीय व्यवस्था भ्रष्ट आचरण के विरुद्ध कानूनी रोकथाम को सशक्त करने और सार्वजनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास करती है।
- भारत में भ्रष्टाचार से निपटने के लिए एक विस्तृत और बहु-स्तरीय संस्थागत तथा कानूनी ढाँचा विकसित किया गया है:
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निष्कर्ष:
भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (सीपीआई) 2025 की रैंकिंग से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने भ्रष्टाचार की धारणा के स्तर पर सीमित सुधार अवश्य किया है, किंतु भ्रष्टाचार अब भी एक गंभीर और संरचनात्मक शासन-संबंधी चुनौती बना हुआ है। नीतियों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच के अंतर को कम करना, संस्थानों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करना तथा सार्वजनिक सेवा में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। इन सभी क्षेत्रों में निरंतर और समन्वित प्रयास ही भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को मजबूत कर सकते हैं और लोकतांत्रिक शासन में जनता के विश्वास को मजबूत बना सकते हैं।

