संदर्भ:
हाल ही में, वैश्विक प्रवाल भित्ति निगरानी नेटवर्क (GCRMN) ने विश्व की प्रवाल भित्तियों की स्थिति पर अपनी सातवीं रिपोर्ट जारी की है।
प्रवाल भित्तियाँ क्या हैं?
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- प्रवाल भित्तियाँ मुख्यतः प्रवाल पॉलीप नामक सूक्ष्म समुद्री जीवों की कॉलोनियों द्वारा निर्मित समुद्री पारिस्थितिक तंत्र हैं। भित्ति-निर्माण करने वाले प्रवाल सूक्ष्म शैवाल, जिन्हें ज़ूज़ैंथेली कहा जाता है, के साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं। ये शैवाल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से प्रवालों को आवश्यक ऊर्जा का एक बड़ा भाग प्रदान करते हैं।
- प्रवाल भित्तियाँ मुख्यतः उथले, गर्म और स्वच्छ उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्णकटिबंधीय समुद्री जल में पाई जाती हैं। इनमें अत्यधिक जैव-विविधता होने के कारण इन्हें प्रायः “समुद्र के वर्षावन” कहा जाता है।
- प्रवाल भित्तियाँ मुख्यतः प्रवाल पॉलीप नामक सूक्ष्म समुद्री जीवों की कॉलोनियों द्वारा निर्मित समुद्री पारिस्थितिक तंत्र हैं। भित्ति-निर्माण करने वाले प्रवाल सूक्ष्म शैवाल, जिन्हें ज़ूज़ैंथेली कहा जाता है, के साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं। ये शैवाल प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से प्रवालों को आवश्यक ऊर्जा का एक बड़ा भाग प्रदान करते हैं।
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प्रवाल भित्तियों का महत्व:
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- समुद्र तल के अत्यंत छोटे हिस्से में होने के बावजूद ये लगभग एक-चौथाई समुद्री प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती हैं।
- मछलियों के प्रजनन एवं पालन-पोषण के क्षेत्र के रूप में कार्य करती हैं।
- मत्स्य पालन तथा तटीय समुदायों की आजीविका को सहारा देती हैं।
- लहरों, तूफानों और तटीय कटाव से समुद्र तटों की रक्षा करती हैं।
- पर्यटन तथा स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में योगदान देती हैं।
- औषधि निर्माण तथा जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में संभावनाएँ प्रदान करती हैं।
- लाखों तटीय समुदायों की खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा में योगदान देती हैं।
- समुद्र तल के अत्यंत छोटे हिस्से में होने के बावजूद ये लगभग एक-चौथाई समुद्री प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती हैं।
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रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:
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- रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कठोर प्रवाल आवरण में लगभग 9.5% की कमी आई है, जब इसकी तुलना 1980–2009 की संदर्भ अवधि से की जाती है। वर्तमान में बड़े व्यवधान हर 4–6 वर्ष में हो रहे हैं, जबकि पहले ऐसे व्यवधान लगभग एक दशक में एक बार होते थे। इसके कारण प्रवाल भित्तियों को पुनः स्वस्थ होने के लिए कम समय मिल रहा है और दीर्घकालिक क्षरण का जोखिम बढ़ रहा है।
- समुद्री ऊष्मा-तरंगें प्रवालों के पतन का सबसे प्रमुख कारण हैं। 1985 से 2025 के बीच प्रवाल भित्तियों के ऊपर समुद्र की सतह के तापमान में लगभग 0.81°C की वृद्धि हुई है। अत्यधिक तापीय दबाव के कारण प्रवाल अपने सहजीवी शैवाल (ज़ूज़ैंथेली) को बाहर निकाल देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रवाल विरंजन होता है।
- चौथी वैश्विक व्यापक प्रवाल विरंजन घटना वर्ष 2023 में शुरू हुई, वर्ष 2024 में तापीय दबाव अपने चरम पर पहुँचा और इसके 2025 तक जारी रहने की संभावना रही। इससे पहले प्रमुख वैश्विक प्रवाल विरंजन घटनाएँ 1998–99, 2010–11, 2016–17 और 2023–24 में हुई थीं।
- वर्ष 2024 में 87% प्रवाल भित्तियों ने अभूतपूर्व तापीय दबाव का सामना किया, जबकि 40% से अधिक प्रवाल भित्तियाँ ऐसे तापीय दबाव से प्रभावित हुईं, जो प्रवाल मृत्यु के जोखिम से जुड़ा था।
- कैरेबियन क्षेत्र विशेष रूप से प्रभावित हुआ। वहाँ औसत कठोर प्रवाल आवरण वर्ष 2024 में घटकर केवल 7.1% रह गया। वहीं, ROPME समुद्री क्षेत्र में 2020 से 2024 के बीच लगभग 50% की कमी दर्ज की गई और प्रवाल आवरण लगभग 15% रह गया।
- ऑस्ट्रेलिया और प्रशांत महासागर क्षेत्र में भी मध्यम स्तर की गिरावट दर्ज की गई।
- रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक कठोर प्रवाल आवरण में लगभग 9.5% की कमी आई है, जब इसकी तुलना 1980–2009 की संदर्भ अवधि से की जाती है। वर्तमान में बड़े व्यवधान हर 4–6 वर्ष में हो रहे हैं, जबकि पहले ऐसे व्यवधान लगभग एक दशक में एक बार होते थे। इसके कारण प्रवाल भित्तियों को पुनः स्वस्थ होने के लिए कम समय मिल रहा है और दीर्घकालिक क्षरण का जोखिम बढ़ रहा है।
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भारत के लिए प्रभाव:
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- भारत में प्रमुख प्रवाल भित्ति पारिस्थितिक तंत्र मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, लक्षद्वीप तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में पाए जाते हैं। ये मत्स्य पालन, पर्यटन, जैव-विविधता तथा तटीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- भारतीय प्रवाल भित्तियाँ जलवायु परिवर्तन से संबंधित खतरों के साथ-साथ स्थानीय दबावों का भी सामना कर रही हैं। इनमें प्रदूषण, तलछट का जमाव, अत्यधिक मछली पकड़ना तथा तटीय विकास प्रमुख हैं।
- भारत में प्रमुख प्रवाल भित्ति पारिस्थितिक तंत्र मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, लक्षद्वीप तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में पाए जाते हैं। ये मत्स्य पालन, पर्यटन, जैव-विविधता तथा तटीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
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आगे की राह:
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- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तीव्र कमी करना।
- समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को सुदृढ़ बनाना।
- तटीय प्रदूषण तथा विनाशकारी मछली पकड़ने की गतिविधियों पर नियंत्रण करना।
- प्रवाल पुनर्स्थापन तथा संरक्षण को बढ़ावा देना।
- दीर्घकालिक वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील प्रवाल भित्तियों का संरक्षण करना।
- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तीव्र कमी करना।
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निष्कर्ष:
प्रवाल भित्तियों का संकट वैश्विक जलवायु परिवर्तन तथा स्थानीय पारिस्थितिक दबावों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है। प्रवाल भित्तियों का अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए एक साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना, सतत तटीय प्रबंधन अपनाना तथा पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन आवश्यक है।

