संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026
संदर्भ:
हाल ही में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 जो परिसीमन और चुनावी सुधारों के बड़े पैकेज का हिस्सा था, लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इस विधेयक का उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण करना और विधानसभाओं एवं संसद में महिला आरक्षण के कार्यान्वयन को सुगम बनाना था।
पृष्ठभूमि और उद्देश्य:
इस विधायी पैकेज के दो प्रमुख उद्देश्य थे:
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- संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू करना (2029 चुनावों को लक्ष्य मानकर)
- अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर परिसीमन के माध्यम से “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत को लागू करना
- संसद और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण लागू करना (2029 चुनावों को लक्ष्य मानकर)
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प्रमुख प्रस्ताव:
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- 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्वितरण
- लोकसभा सीटों की संख्या वर्तमान स्तर से बढ़ाकर लगभग 850 तक करना
- सभी राज्यों में प्रतिनिधित्व में समान वृद्धि सुनिश्चित करना
- 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा क्षेत्रों का पुनर्वितरण
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विधेयक की अस्वीकृति के परिणाम:
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- विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त नहीं कर सका और अस्वीकृत हो गया।
- इसके परिणामस्वरूप पूरा परिसीमन पैकेज भी रोक दिया गया।
- महिला आरक्षण और सीटों के विस्तार की योजना फिलहाल लंबित है।
- विधेयक लोकसभा में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त नहीं कर सका और अस्वीकृत हो गया।
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विवाद के प्रमुख मुद्दे:
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- संघीय चिंता: विपक्ष ने कहा कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से कुछ राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत, का प्रतिनिधित्व घट सकता है।
- उत्तर–दक्षिण विभाजन का आरोप: सरकार ने इसे खारिज करते हुए सभी राज्यों के समान प्रतिनिधित्व की बात कही।
- महिला आरक्षण से जोड़ना: विपक्ष ने महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताई।
- “एक व्यक्ति, एक वोट” सिद्धांत: सरकार ने 1971 की जनगणना के आधार पर लगी रोक से उत्पन्न असंतुलन का हवाला दिया।
- संघीय चिंता: विपक्ष ने कहा कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से कुछ राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत, का प्रतिनिधित्व घट सकता है।
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प्रभाव:
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- परिसीमन प्रक्रिया में देरी
- महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता
- संघीय संबंधों में तनाव
- चुनावी सुधारों की नीति में अस्थिरता
- परिसीमन प्रक्रिया में देरी
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संवैधानिक संशोधन विधेयक के बारे में:
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- संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, संविधान संशोधन विधेयक एक विशेष और कठोर प्रक्रिया से गुजरता है। इसे संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसके लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है, अर्थात सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। मतभेद की स्थिति में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं होता। संसद से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है तथा कुछ मामलों में, कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की पुष्टि भी जरूरी होती है।
- भारतीय संविधान संशोधन प्रक्रिया में कठोरता और लचीलापन दोनों का संतुलन रखता है ताकि मूल संरचना की रक्षा हो सके और शासन की आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तन भी किए जा सकें। परिसीमन से जुड़े संशोधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि ये लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन को प्रभावित करते हैं। अनुच्छेद 81 और 82 के तहत हर जनगणना के बाद परिसीमन किया जाता है ।
- संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत, संविधान संशोधन विधेयक एक विशेष और कठोर प्रक्रिया से गुजरता है। इसे संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसके लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है, अर्थात सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। मतभेद की स्थिति में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं होता। संसद से पारित होने के बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक होती है तथा कुछ मामलों में, कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की पुष्टि भी जरूरी होती है।
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निष्कर्ष:
131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 की अस्वीकृति यह दर्शाती है कि संघीय ढांचे, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय से जुड़े संवैधानिक संशोधन अत्यंत जटिल होते हैं। यह अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया, विशेष बहुमत की आवश्यकता और राजनीतिक सहमति के महत्व को भी रेखांकित करता है, जो भारत में बड़े संवैधानिक सुधारों के लिए अनिवार्य हैं।

