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Blog / 03 Nov 2026

CNGC13: भारतीय वैज्ञानिकों ने पौधों की सुरक्षा का एक नया तंत्र खोजा

संदर्भ:

नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय पादप जीनोम अनुसंधान संस्थान (National Institute of Plant Genome Research-NIPGR) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसे प्रोटीन CNGC13 की पहचान की है, जिसके बारे में पहले विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं थी। यह प्रोटीन पौधों को कीटों द्वारा क्षतिग्रस्त पत्ती से चेतावनी संकेतों को पौधे के अन्य सुरक्षित हिस्सों तक पहुँचाने में मदद करता है। अक्टूबर 2026 में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (PNAS) में प्रकाशित इस शोध के निष्कर्ष पौधों की रक्षा प्रणाली को समझने में नई जानकारी प्रदान करते हैं। साथ ही, यह कीट-प्रतिरोधी फसलों के विकास में भी सहायक हो सकता है।

पौधे खतरे के बारे में कैसे संवाद करते हैं?

      • जानवरों के विपरीत, पौधे खतरों से बचने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं जा सकते और उनमें तंत्रिका तंत्र (Nervous System) भी नहीं होता है। हालाँकि, उनके पास जटिल संकेत तंत्र होते हैं, जो उन्हें क्षति का पता लगाने और रक्षात्मक प्रतिक्रियाएँ सक्रिय करने में सक्षम बनाते हैं।
      • जब कीट किसी पत्ती को खाते हैं, तो पौधे में कैल्शियम आयन, प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन प्रजातियों (Reactive Oxygen Species) और जैस्मोनिक एसिड (Jasmonic Acid) जैसे हार्मोन से संबंधित संकेतों की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ये संकेत रक्षा संबंधी जीन को सक्रिय करते हैं, कोशिका भित्ति (Cell Wall) को मजबूत बनाते हैं तथा पौधे को आगे होने वाली क्षति और रोगजनकों से बचाने में मदद करते हैं।
      • पूर्व के शोधों में ग्लूटामेट रिसेप्टर-जैसे चैनल (Glutamate Receptor-like Channels-GLRs) को पूरे पौधे में खतरे के संकेतों के संचार का एक महत्त्वपूर्ण घटक बताया गया था। नए अध्ययन में CNGC13 की पहचान इस संचार प्रणाली के एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में की गई है। यह एक कैल्शियम चैनल है, जो मुख्य रूप से पौधों के संवहनी ऊतकों (Vascular Tissues), विशेषकर जाइलम (Xylem) और फ्लोएम (Phloem) में पाया जाता है।

CNGC13- Indian Scientists Discover New Plant Defence Mechanism

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

      • शोधकर्ताओं ने अरेबिडोप्सिस थालियाना (Arabidopsis thaliana) नामक पौधे का अध्ययन किया, जिसका वैज्ञानिक अनुसंधान में व्यापक रूप से मॉडल पौधे के रूप में उपयोग किया जाता है। उन्होंने सामान्य पौधों की तुलना उन उत्परिवर्तित पौधों (Mutant Plants) से की, जिनमें CNGC13 जीन मौजूद नहीं था।
      • शोधकर्ताओं ने पाया कि स्पोडोप्टेरा लिटुरा (Spodoptera litura) (तंबाकू की इल्ली) के लार्वा ने उत्परिवर्तित पौधों को खाने पर सामान्य पौधों की तुलना में काफी अधिक वजन प्राप्त किया। यह इन पौधों में कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता कम होने का संकेत देता है। इस जीन को दोबारा सक्रिय करने से पौधों की सामान्य रक्षा प्रतिक्रिया पुनः बहाल हो गई।
      • अध्ययन में यह भी पाया गया कि क्षति पहुँचने के 15 मिनट के भीतर CNGC13 की गतिविधि बढ़ गई। फ्लोरोसेंट इमेजिंग से पता चला कि सामान्य पौधों में कैल्शियम संकेत लगभग 90 सेकंड में दूर स्थित पत्तियों तक पहुँच गए, जबकि अधिकांश उत्परिवर्तित पौधों में इसमें लगभग 150 सेकंड लगे।
      • उत्परिवर्तित पौधों की दूर स्थित पत्तियों में जैस्मोनिक एसिड और ग्लूकोसिनोलेट (Glucosinolate) के कुछ अपघटन उत्पादों का स्तर भी कम पाया गया। ये निष्कर्ष बताते हैं कि CNGC13 तीव्र एवं संपूर्ण पौधे में फैलने वाली रक्षा प्रतिक्रियाओं के समन्वय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कृषि एवं खाद्य सुरक्षा के लिए महत्त्व:

      • कीटों के कारण वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष लगभग 20% फसल का नुकसान होता है तथा जलवायु परिवर्तन से कीटों का खतरा और बढ़ सकता है। वर्तमान में फसलों की सुरक्षा काफी हद तक रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भर है, जो पर्यावरण प्रदूषण, कीटनाशक प्रतिरोध (Pesticide Resistance) तथा गैर-लक्षित जीवों को नुकसान पहुँचाने जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
      • पौधों के संकेत तंत्र को समझने से वैज्ञानिकों को ऐसी फसलें विकसित करने में मदद मिल सकती है, जिनमें प्राकृतिक रूप से अधिक प्रतिरोधक क्षमता मौजूद हो। इसके अलावा, यह लक्षित एवं पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ फसल संरक्षण तकनीकों के विकास में भी सहायक हो सकता है तथा रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता को कम कर सकता है।

निष्कर्ष:

CNGC13 की पहचान पौधों के संचार और रक्षा तंत्र की जटिलता को उजागर करती है। पौधे किस प्रकार खतरों का पता लगाते हैं और उनसे संबंधित संकेतों का संचार करते हैं, इसे समझकर वैज्ञानिक अनुसंधान अधिक लचीली एवं प्रतिरोधी फसलों, टिकाऊ कृषि और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में योगदान दे सकता है।

 

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