संदर्भ:
लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी तथा गैर-सरकारी संगठन (Associação Projeto Biodiversidade) द्वारा काबो वर्दे में 17 वर्षों तक किए गए विस्तृत अध्ययन में यह सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन लॉगरहेड कछुओं के जीवन चक्र पर गंभीर और बहुआयामी प्रभाव डाल रहा है।
लॉगरहेड कछुओं पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव:
1. आकार में कमी और घटती प्रजनन क्षमता: कछुओं का शारीरिक आकार धीरे-धीरे छोटा होता जा रहा है। वे पहले की तुलना में प्रत्येक घोंसले में कम अंडे दे रहे हैं तथा कुल अंडों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है।
2. प्रजनन अंतराल में वृद्धि: समुद्री उत्पादकता में कमी के कारण कछुओं को अपनी ऊर्जा पुनः संचित करने में अधिक समय लग रहा है। जहाँ पहले वे लगभग हर दो वर्ष में प्रजनन करते थे, अब यह अंतराल बढ़कर चार वर्ष तक पहुँच गया है।
3. मादा शिशुओं का बढ़ता अनुपात: घोंसलों के तापमान में वृद्धि के कारण अधिक संख्या में मादा शिशु जन्म ले रहे हैं। वर्तमान में केप वर्डे में लगभग 84% नवजात मादा हैं। यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहा, तो वर्ष 2100 तक यह अनुपात 99.86% तक पहुँच सकता है, जिससे भविष्य में प्रजनन संतुलन पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
4. आवास क्षरण और प्रवास में व्यवधान: समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण अंडे देने वाले तटीय क्षेत्र कटाव का शिकार हो रहे हैं। साथ ही, समुद्री धाराओं में परिवर्तन से कछुओं के प्रवासन मार्ग और नवजात शिशुओं के समुद्र में फैलाव की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
लॉगरहेड कछुए के बारे में:
• लॉगरहेड कछुआ (Caretta caretta) एक समुद्री सरीसृप है, जो चेलोनिडे (Cheloniidae) परिवार से संबंधित है। इसका नाम इसके बड़े सिर और शक्तिशाली जबड़ों के कारण पड़ा है।
• यह विश्व का सबसे बड़ा कठोर खोल वाला कछुआ है और यह आकार में लेदरबैक समुद्री कछुए के बाद दूसरे स्थान पर आता है।
• इनकी आयु 80 वर्ष से अधिक हो सकती है। ये अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागरों सहित भूमध्य सागर में भी पाए जाते हैं।
• ये सर्वाहारी होते हैं और मुख्यतः समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले जीवों जैसे घोंघे, शंख और केकड़ों का आहार लेते हैं।
• संरक्षण स्थिति: IUCN के अनुसार यह प्रजाति “असुरक्षित (Vulnerable)” अर्थात संकटग्रस्त श्रेणी में है। जलवायु परिवर्तन, आवास हानि, समुद्री प्रदूषण तथा मछली पकड़ने के जाल में फँसना इनके प्रमुख खतरे हैं। 
व्यापक पारिस्थितिक प्रभाव:
• लॉगरहेड कछुए एक संकेतक प्रजाति माने जाते हैं, अर्थात इनकी स्थिति समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को दर्शाती है।
• इनके शरीर के आकार, प्रजनन क्षमता और प्रवास में कमी यह संकेत देती है कि समुद्री पर्यावरण पर जलवायु परिवर्तन का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
• संरक्षण प्रयासों को केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित न रखकर, भोजन क्षेत्रों की सुरक्षा, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और जलवायु शमन उपायों तक विस्तारित किया जाना चाहिए।
संरक्षण हेतु प्रमुख सुझाव:
• अंडे देने वाले तटों के साथ-साथ महत्वपूर्ण भोजन क्षेत्रों की सुरक्षा और पुनर्स्थापना सुनिश्चित की जाए।
• मत्स्य उद्योग में अनजाने में होने वाली पकड़ (बायकैच) तथा समुद्री प्रदूषण को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएँ।
• घोंसलों के तापमान और लिंग अनुपात की नियमित निगरानी की जाए तथा असंतुलन की स्थिति में प्रबंधन उपाय लागू किए जाएँ।
• समुद्री कछुओं के संरक्षण कार्यक्रमों में जलवायु अनुकूलन और सहनशीलता को समाहित किया जाए, क्योंकि वैश्विक तापवृद्धि बहुआयामी खतरे उत्पन्न कर रही है।
निष्कर्ष:
लॉगरहेड कछुए स्वाभाविक रूप से अनुकूलनशील प्रजाति हैं, किंतु वर्तमान जलवायु परिवर्तन उनके प्रजनन, विकास और प्रवासन चक्र पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। इस प्रजाति की दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आवश्यक है, जिसमें आवास संरक्षण, सतत मत्स्य प्रबंधन तथा प्रभावी जलवायु कार्रवाई को समान महत्व दिया जाए।
