संदर्भ:
हाल ही में चीन द्वारा किए गए समुद्र-आधारित अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) परीक्षण ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक वातावरण को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। यह परीक्षण चीन की बढ़ती परमाणु क्षमताओं और पनडुब्बी-आधारित परमाणु बलों के माध्यम से अपनी दूसरे प्रहार की क्षमता (Second-Strike Capability) को मजबूत करने के प्रयासों को दर्शाता है। इस घटनाक्रम का भारत, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
मिसाइल परीक्षण की प्रमुख बातें:
चीन ने 6 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में अपना पहला ज्ञात समुद्र-आधारित लंबी दूरी का बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षण किया।
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- मिसाइल को एक चीनी पनडुब्बी से लॉन्च किया गया, जो संभवतः जू लैंग-2 (JL-2) या उन्नत जू लैंग-3 (JL-3) पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) थी।
- मिसाइल ने लगभग 7,300 किलोमीटर की दूरी तय की और दक्षिणी प्रशांत महासागर में जाकर गिरी।
- इसमें एक नकली वारहेड (Dummy Warhead) लगाया गया था और यह कई देशों के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Exclusive Economic Zones - EEZs) के ऊपर से गुजरी।
- इस परीक्षण ने चीन की पनडुब्बियों के माध्यम से परमाणु हथियारों को तैनात करने की बढ़ती क्षमता और उसकी परमाणु त्रिकोण (Nuclear Triad) को मजबूत करने की दिशा में प्रगति को प्रदर्शित किया।
- मिसाइल को एक चीनी पनडुब्बी से लॉन्च किया गया, जो संभवतः जू लैंग-2 (JL-2) या उन्नत जू लैंग-3 (JL-3) पनडुब्बी-प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) थी।
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अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) के बारे में:
ICBM एक लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल होती है, जो 5,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक यात्रा कर सकती है और परमाणु या पारंपरिक वारहेड ले जा सकती है। ये मिसाइलें किसी देश की रणनीतिक प्रतिरोध क्षमता (Strategic Deterrence Capability) का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
परमाणु त्रिकोण (Nuclear Triad)के बारे में:
परमाणु त्रिकोण का अर्थ है किसी देश की वह क्षमता जिसके माध्यम से वह तीन अलग-अलग माध्यमों से परमाणु हथियारों का प्रक्षेपण कर सकता है:
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- भूमि आधारित मिसाइलें (ICBMs)
- समुद्र आधारित मिसाइलें (परमाणु पनडुब्बियों से छोड़ी जाने वाली SLBMs)
- रणनीतिक बमवर्षक विमान (Strategic Bombers)
- चीन का नवीनतम परीक्षण उसके अधिक विश्वसनीय परमाणु त्रिकोण के विकास में प्रगति को दर्शाता है।
- भूमि आधारित मिसाइलें (ICBMs)
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दूसरे प्रहार की क्षमता (Second-Strike Capability) क्या है?
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- दूसरे प्रहार की क्षमता का अर्थ है किसी देश की वह क्षमता जिसके तहत वह शत्रु के पहले परमाणु हमले को झेलने के बाद भी जवाबी परमाणु हमला कर सके।
- परमाणु पनडुब्बियां इस क्षमता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि उन्हें खोज पाना और नष्ट करना कठिन होता है।
- दूसरे प्रहार की क्षमता का अर्थ है किसी देश की वह क्षमता जिसके तहत वह शत्रु के पहले परमाणु हमले को झेलने के बाद भी जवाबी परमाणु हमला कर सके।
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चीन के परमाणु विस्तार का महत्व:
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- परंपरागत रूप से चीन ने न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध नीति (Minimum Nuclear Deterrence Policy) अपनाई है। हालांकि, हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि चीन अधिक बड़े और उन्नत परमाणु ढांचे की ओर बढ़ रहा है।
- यह परीक्षण निम्नलिखित पहलुओं को उजागर करता है:
- पनडुब्बी-आधारित परमाणु बलों में सुधार
- उन्नत मिसाइल तकनीक का विकास
- प्रारंभिक चेतावनी (Early Warning) और जवाबी हमले की क्षमताओं पर अधिक ध्यान
- चीन की स्वयं को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा
- पनडुब्बी-आधारित परमाणु बलों में सुधार
- परंपरागत रूप से चीन ने न्यूनतम परमाणु प्रतिरोध नीति (Minimum Nuclear Deterrence Policy) अपनाई है। हालांकि, हाल के घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि चीन अधिक बड़े और उन्नत परमाणु ढांचे की ओर बढ़ रहा है।
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हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर प्रभाव:
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- चीन की मिसाइल क्षमताओं में वृद्धि से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
- अमेरिका को अपनी मिसाइल रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने और पूर्वी एशिया पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता हो सकती है।
- जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे क्षेत्रीय देशों के लिए चीन की बढ़ती परमाणु और नौसैनिक क्षमताएँ क्षेत्रीय स्थिरता और संभावित हथियारों की दौड़ को लेकर चिंता पैदा करती हैं।
- चीन की मिसाइल क्षमताओं में वृद्धि से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
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भारत पर प्रभाव:
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- यह परीक्षण भारत और चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक अंतर को दर्शाता है। भारत को अपनी परमाणु प्रतिरोध क्षमता और समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।
- इसके लिए महत्वपूर्ण कदम हैं:
- K-5 और K-6 जैसी लंबी दूरी की पनडुब्बी-प्रक्षेपित मिसाइलों (SLBMs) का विकास
- परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (SSBN) बेड़े का विस्तार
- पनडुब्बी रोधी युद्ध (Anti-Submarine Warfare) क्षमताओं में सुधार
- हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्र तल निगरानी और जागरूकता (Seabed Domain Awareness) को मजबूत करना
- K-5 और K-6 जैसी लंबी दूरी की पनडुब्बी-प्रक्षेपित मिसाइलों (SLBMs) का विकास
- यह परीक्षण भारत और चीन के बीच बढ़ते रणनीतिक अंतर को दर्शाता है। भारत को अपनी परमाणु प्रतिरोध क्षमता और समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की आवश्यकता है।
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रारोटोंगा संधि और परमाणु-मुक्त क्षेत्र:
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- मिसाइल जिस क्षेत्र में गिरी, वह रारोटोंगा संधि (Treaty of Rarotonga) के अंतर्गत आता है, जिसके तहत दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र (South Pacific Nuclear Free Zone) स्थापित किया गया है।
- यह संधि क्षेत्र में परमाणु विस्फोट परीक्षण और परमाणु हथियारों की तैनाती पर प्रतिबंध लगाती है। हालांकि, बिना परमाणु वारहेड वाली मिसाइलों के परीक्षण को परमाणु विस्फोट नहीं माना जाता।
- मिसाइल जिस क्षेत्र में गिरी, वह रारोटोंगा संधि (Treaty of Rarotonga) के अंतर्गत आता है, जिसके तहत दक्षिण प्रशांत परमाणु-मुक्त क्षेत्र (South Pacific Nuclear Free Zone) स्थापित किया गया है।
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आगे की राह:
भारत को विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध (Credible Minimum Deterrence) की नीति बनाए रखते हुए अपनी परमाणु त्रिकोण क्षमता को मजबूत करना चाहिए। इसके साथ ही समुद्री निगरानी, रक्षा तकनीक और हिंद-प्रशांत साझेदारों के साथ सहयोग को बढ़ाना आवश्यक है।
निष्कर्ष:
चीन का समुद्र-आधारित ICBM परीक्षण उसकी बढ़ती परमाणु क्षमताओं और बदलती रणनीतिक प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यह चीन की दूसरे प्रहार की क्षमता को मजबूत करता है, लेकिन साथ ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा चुनौतियों को भी बढ़ाता है।

