संदर्भ:
हाल ही में राजस्थान में दो बच्चों की मृत्यु तथा गुजरात में चांदीपुरा वायरस (CHPV) के कई प्रयोगशाला-पुष्ट मामलों के सामने आने के बाद राज्य के स्वास्थ्य अधिकारियों ने रोग निगरानी को और सुदृढ़ किया है। इस प्रकोप ने इस दुर्लभ लेकिन अत्यधिक घातक वायरस की ओर पुनः ध्यान आकर्षित किया है, जो मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है और तेजी से तीव्र मस्तिष्कशोथ सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome - AES) का कारण बन सकता है।
चांदीपुरा वायरस क्या है?
चांदीपुरा वायरस (CHPV) एक तंत्रिका-आकर्षी (न्यूरोट्रॉपिक), एकल-सूत्रीय RNA वायरस है, जो रैब्डोविरिडी (Rhabdoviridae) परिवार से संबंधित है। यह वही परिवार है जिसमें रेबीज (Rabies) वायरस भी शामिल है। इसे पहली बार वर्ष 1965 में महाराष्ट्र के चांदीपुरा गाँव से पृथक किया गया था, जिसके नाम पर इसका नाम रखा गया। यह वायरस मुख्य रूप से 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों को संक्रमित करता है तथा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर आक्रमण कर मस्तिष्क में सूजन (एन्सेफलाइटिस) उत्पन्न करता है।
संचरण और लक्षण:
-
-
- CHPV एक वाहक-जनित (Vector-borne) रोग है, जो मुख्य रूप से फ्लेबोटोमाइन सैंडफ्लाई (Phlebotomine Sandflies) द्वारा फैलता है, हालांकि एडीज़ एजिप्टी (Aedes aegypti) सहित कुछ मच्छरों की प्रजातियाँ भी इसके वाहक हो सकती हैं। यह वायरस कीट के काटने के माध्यम से रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है और मस्तिष्क तक फैल सकता है।
- प्रारंभिक लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द तथा उल्टी शामिल हैं। गंभीर मामलों में रोग तेजी से दौरे (Seizures), चेतना में परिवर्तन, श्वसन कष्ट तथा एन्सेफलाइटिस में परिवर्तित हो जाता है। रोग की तीव्र प्रगति के कारण अस्पताल में भर्ती होने के 24–48 घंटे के भीतर मृत्यु भी हो सकती है।
- CHPV एक वाहक-जनित (Vector-borne) रोग है, जो मुख्य रूप से फ्लेबोटोमाइन सैंडफ्लाई (Phlebotomine Sandflies) द्वारा फैलता है, हालांकि एडीज़ एजिप्टी (Aedes aegypti) सहित कुछ मच्छरों की प्रजातियाँ भी इसके वाहक हो सकती हैं। यह वायरस कीट के काटने के माध्यम से रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है और मस्तिष्क तक फैल सकता है।
-
कुछ क्षेत्र अधिक संवेदनशील क्यों हैं?
यह रोग मुख्य रूप से मध्य भारत में स्थानिक (Endemic) है, विशेषकर महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश में, जहाँ सैंडफ्लाई की संख्या अधिक होती है। कच्चे मकानों, खराब स्वच्छता तथा सैंडफ्लाई के अधिक प्रजनन वाले ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्र अधिक संवेदनशील होते हैं। मानसून की परिस्थितियाँ वाहकों की संख्या में और वृद्धि करती हैं, जिससे प्रकोप का जोखिम बढ़ जाता है।
उपचार और रोकथाम:
-
-
- वर्तमान में चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या टीका उपलब्ध नहीं है। उपचार मुख्यतः सहायक (Supportive) होता है, जिसमें दौरों को नियंत्रित करना, मस्तिष्क की सूजन कम करना, शरीर में जल की पर्याप्त मात्रा बनाए रखना तथा गहन चिकित्सा (Intensive Care) प्रदान करना शामिल है।
- रोकथाम के लिए कीटनाशकों का छिड़काव, मच्छरदानी का उपयोग, कीट-प्रतिरोधक (Repellents) का प्रयोग, स्वच्छता बनाए रखना तथा वाहकों के प्रजनन स्थलों को समाप्त करना आवश्यक है। शीघ्र पहचान और प्रभावी निगरानी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- वर्तमान में चांदीपुरा वायरस के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार या टीका उपलब्ध नहीं है। उपचार मुख्यतः सहायक (Supportive) होता है, जिसमें दौरों को नियंत्रित करना, मस्तिष्क की सूजन कम करना, शरीर में जल की पर्याप्त मात्रा बनाए रखना तथा गहन चिकित्सा (Intensive Care) प्रदान करना शामिल है।
-
वन हेल्थ दृष्टिकोण:
यह प्रकोप "वन हेल्थ (One Health)" दृष्टिकोण के महत्व को रेखांकित करता है, जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की परस्पर निर्भरता को स्वीकार करता है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा कार्यान्वित राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन (National One Health Mission) का उद्देश्य एकीकृत रोग निगरानी को सुदृढ़ करना, महामारी संबंधी तैयारी में सुधार करना तथा स्वास्थ्य, पशु चिकित्सा और पर्यावरण क्षेत्रों के बीच समन्वय को मजबूत बनाना है।
निष्कर्ष:
चांदीपुरा वायरस का पुनः उभरना मजबूत रोग निगरानी, प्रभावी वाहक नियंत्रण, जन-जागरूकता तथा वन हेल्थ (One Health) दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। भविष्य में ऐसे प्रकोपों की रोकथाम के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों और अनुसंधान को सुदृढ़ करना आवश्यक होगा।

