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Blog / 25 Sep 2026

विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की

संदर्भ:

हाल ही में, विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने के संकेत दिए हैं। यह कदम भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठी चिंताओं के बाद सामने आया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, विपक्ष दोनों सदनों में इस संबंध में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।

भारत निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्थिति:

      • भारत निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है। इसे संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए होने वाले चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है।
      • वर्तमान में निर्वाचन आयोग एक तीन सदस्यीय निकाय के रूप में कार्य करता है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल हैं। आयोग की निर्णय प्रक्रिया में मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘समानों में प्रथम’ (First among Equals) माना जाता है।

निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति:

      • मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत राष्ट्रपति, एक चयन समिति की सिफारिश पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। इस चयन समिति में शामिल हैं:
        • प्रधानमंत्री- अध्यक्ष
        • लोकसभा में विपक्ष के नेता- सदस्य
        • प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल का एक मंत्री- सदस्य
      • इस कानून के तहत कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, निर्धारित है।

CEC को कैसे हटाया जा सकता है?

      • मुख्य चुनाव आयुक्त को संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत उच्च स्तर की संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है। संविधान के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल “उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर” पद से हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
      • संविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को केवल सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity) के आधार पर हटाया जा सकता है।
      • इसलिए, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए इन्हीं आधारों पर संसदीय हटाने की प्रक्रिया अपनानी होती है।

हटाने की प्रक्रिया:

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया में निम्नलिखित प्रमुख चरण शामिल हैं:

      • किसी भी सदन में कदाचार या अक्षमता का आरोप लगाते हुए हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए नोटिस दिया जाता है।
      • नोटिस पर कम से कम 100 लोकसभा सदस्यों या 50 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
      • प्रस्ताव स्वीकार किए जाने पर आरोपों की जांच की जाती है।
      • जांच के बाद प्रस्ताव को दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है, सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन।
      • दोनों सदनों से आवश्यक संसदीय स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति CEC को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
      • यह कठोर प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बनाई गई है।

CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों में अंतर:

      • CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण अंतर है।
      • जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान हटाने की सुरक्षा प्राप्त है, वहीं किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को राष्ट्रपति द्वारा केवल CEC की सिफारिश पर पद से हटाया जा सकता है।

लोकतंत्र के लिए महत्व:

      • यह विवाद चुनावों में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए स्वतंत्र और विश्वसनीय निर्वाचन आयोग के महत्व को रेखांकित करता है।
      • साथ ही, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए निर्धारित कठोर संवैधानिक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को मनमाने या राजनीतिक कारणों से आसानी से हटाया न जा सके।

निष्कर्ष:

मुख्य चुनाव आयुक्त को प्राप्त संवैधानिक सुरक्षा चुनावी स्वतंत्रता और संस्थागत स्थिरता के महत्व को दर्शाती है। वहीं, कठोर संसदीय हटाने की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि संवैधानिक संरक्षण का अर्थ जवाबदेही से पूर्ण छूट नहीं है। इस प्रकार, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और उसकी संस्थागत जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।

 

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