संदर्भ:
यूरोपीय संघ (EU) के एक नए नियम के अंतर्गत 1 जनवरी 2026 से भारत से यूरोप निर्यातित स्टील और एल्युमिनियम पर अब उत्पादन के दौरान हुए कार्बन प्रदूषण के आधार पर अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता, लाभ मार्जिन तथा मौजूदा व्यापारिक अनुबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है।
भारतीय निर्यात पर प्रभाव:
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- यूरोपीय संघ भारत के स्टील और एल्युमिनियम निर्यात का लगभग 22% हिस्सा है, जिसका कुल मूल्य वित्त वर्ष 2024–25 में लगभग 5.8 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के लागू होने से निर्यात से प्राप्त वास्तविक बिक्री मूल्य में लगभग 16–22% तक की गिरावट आ सकती है, जिसके कारण मौजूदा अनुबंधों का पुनःमूल्यांकन करना पड़ेगा तथा यूरोपीय बाज़ार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति कमजोर होने की आशंका है।
- यूरोपीय संघ भारत के स्टील और एल्युमिनियम निर्यात का लगभग 22% हिस्सा है, जिसका कुल मूल्य वित्त वर्ष 2024–25 में लगभग 5.8 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।
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कार्बन सीमा समायोजन तंत्र की कार्यप्रणाली और विस्तार क्षेत्र:
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- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के माध्यम से यूरोपीय संघ अपनी घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्था को आयातित वस्तुओं पर भी लागू करता है। जहाँ यूरोपीय संघ की कंपनियाँ यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के अंतर्गत कार्बन लागत का भुगतान करती हैं, वहीं विदेशी उत्पादकों पर भी समान लागत लगाई जाती है।
- इस तंत्र के अंतर्गत स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली तथा हाइड्रोजन जैसे प्रमुख उत्सर्जन-गहन क्षेत्र शामिल हैं और भविष्य में इसके दायरे को अन्य क्षेत्रों तक विस्तारित किए जाने की संभावना है।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के अंतर्गत लागत का निर्धारण संयंत्र स्तर पर प्रत्यक्ष (स्कोप-1) तथा अप्रत्यक्ष (स्कोप-2) कार्बन उत्सर्जन के आधार पर किया जाता है। प्रमाणित उत्सर्जन आँकड़ों के अभाव में पूर्वनिर्धारित (डिफ़ॉल्ट) उत्सर्जन मान लागू किए जाते हैं, जिससे कुल लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के माध्यम से यूरोपीय संघ अपनी घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्था को आयातित वस्तुओं पर भी लागू करता है। जहाँ यूरोपीय संघ की कंपनियाँ यूरोपीय उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) के अंतर्गत कार्बन लागत का भुगतान करती हैं, वहीं विदेशी उत्पादकों पर भी समान लागत लगाई जाती है।
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वित्तीय प्रभाव:
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- कोयला आधारित ब्लास्ट फर्नेस–बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF–BOF) पद्धति से बने स्टील में प्रति टन लगभग 2.4 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है। यदि यूरोपीय कार्बन मूल्य €80 प्रति टन हो, तो कार्बन सीमा समायोजन तंत्र की लागत लगभग €192 प्रति टन तक पहुँच सकती है।
- आमतौर पर खरीदार इस लागत का 50–70% हिस्सा भारतीय निर्यातकों पर डाल देते हैं, जिससे लाभ मार्जिन में 16–22% तक की गिरावट हो सकती है।
- उत्पादन तकनीक के अनुसार कार्बन सीमा समायोजन तंत्र का बोझ भिन्न होता है:
- BF–BOF (कोयला आधारित): उच्चतम लागत
- गैस आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI): मध्यम लागत
- इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF): न्यूनतम लागत
- BF–BOF (कोयला आधारित): उच्चतम लागत
- कोयला आधारित ब्लास्ट फर्नेस–बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF–BOF) पद्धति से बने स्टील में प्रति टन लगभग 2.4 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है। यदि यूरोपीय कार्बन मूल्य €80 प्रति टन हो, तो कार्बन सीमा समायोजन तंत्र की लागत लगभग €192 प्रति टन तक पहुँच सकती है।
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रणनीतिक प्रभाव:
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- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र केवल अस्थायी व्यापार बाधा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक स्थायी और संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है।
- विकसित देश अब कार्बन मूल्य निर्धारण का उपयोग न केवल जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति के लिए बल्कि व्यापार संरक्षण और राजस्व सृजन के साधन के रूप में भी कर रहे हैं।
- भारत जैसे देशों को घरेलू कार्बन मूल्य निर्धारण की सीमित व्यवस्था और उच्च उत्सर्जन तीव्रता के कारण असमान प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र केवल अस्थायी व्यापार बाधा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक स्थायी और संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देता है।
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भारत के लिए नीति सुझाव:
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- कूटनीतिक उपाय: भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के माध्यम से कार्बन सीमा समायोजन तंत्र से संबंधित मुद्दों को उठाकर छूट या संक्रमणकालीन व्यवस्था की माँग की जाए।
- घरेलू सुधार: कार्बन लेखांकन और निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ किया जाए, स्वच्छ और कम उत्सर्जन वाली उत्पादन तकनीकों को प्रोत्साहित किया जाए, तथा प्रमाणित उत्सर्जन आँकड़ों की विश्वसनीय व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- उद्योग स्तर पर अनुकूलन: निर्यातकों को उत्पादन प्रक्रियाओं में सुधार करना होगा, कार्बन फुटप्रिंट का सही मूल्यांकन करना होगा और कार्बन सीमा समायोजन तंत्र से होने वाली लागत को अनुबंधों में उचित रूप से शामिल करना होगा।
- कूटनीतिक उपाय: भारत–ईयू मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के माध्यम से कार्बन सीमा समायोजन तंत्र से संबंधित मुद्दों को उठाकर छूट या संक्रमणकालीन व्यवस्था की माँग की जाए।
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निष्कर्ष:
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र ने कार्बन को एक नए व्यापारिक मूल्य में बदल दिया है, जहाँ प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन लागत पर नहीं बल्कि उत्सर्जन स्तर पर भी निर्भर करती है। भारत के लिए यूरोपीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखना, निर्यात को सुरक्षित करना और अनुकूल व्यापारिक शर्तें सुनिश्चित करना इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इस उभरती हुई कार्बन-संवेदनशील वैश्विक व्यापार व्यवस्था का प्रभावी रूप से सामना कैसे करता है।

