संदर्भ:
हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे (आईआईटी बॉम्बे) के शोधकर्ताओं ने कैंसर इम्यूनोथेरेपी के लिए प्रयोगशाला में विकसित टी कोशिकाओं को सुरक्षित और प्रभावी ढंग से पुनः प्राप्त करने की एक अधिक अधिक कोमल और प्रभावी विधि विकसित की है। यह चरण कार टी-सेल थेरेपी जैसी उन्नत उपचार तकनीकों को विश्वसनीय और किफ़ायती बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अध्ययन बायोमैटीरियल्स साइंस नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और यूरोपीय बायोमैटीरियल्स सोसायटी के सम्मेलन संग्रह में भी शामिल किया गया है।
शोध के बारे में:
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- कार टी-सेल थेरेपी में सबसे पहले रोगी के शरीर से टी कोशिकाएँ निकाली जाती हैं। इसके बाद प्रयोगशाला में इन्हें इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को बेहतर ढंग से पहचान सकें। फिर इन संशोधित कोशिकाओं की संख्या बढ़ाई जाती है और अंततः इन्हें दोबारा रोगी के शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है। हालाँकि टी कोशिकाओं को विकसित करने की तकनीकों में काफ़ी प्रगति हुई है, लेकिन उन्हें पूरी तरह सुरक्षित, जीवित और कार्यक्षम अवस्था में पुनः प्राप्त करना अब भी एक बड़ी तकनीकी चुनौती बना हुआ है।
- पारंपरिक रूप से टी कोशिकाओं को समतल प्लास्टिक सतहों पर उगाया जाता है, जो मानव शरीर के प्राकृतिक वातावरण की सही नकल नहीं कर पातीं। इस समस्या के समाधान के लिए अब त्रि-आयामी रेशेदार ढाँचों का उपयोग किया जा रहा है, जो मानव ऊतकों जैसी संरचना प्रदान करते हैं। इससे टी कोशिकाएँ अधिक तेज़ी से बढ़ती हैं और बेहतर तरीके से विभाजित होती हैं, लेकिन इन रेशेदार ढाँचों से टी कोशिकाएँ बहुत मज़बूती से चिपक जाती हैं, जिससे उन्हें बिना नुकसान पहुँचाए अलग करना कठिन हो जाता है।
- आईआईटी बॉम्बे की शोध टीम ने टी कोशिकाओं को पुनः प्राप्त करने के लिए तीन अलग-अलग विधियों का परीक्षण किया:
- पोषण माध्यम की सहायता से हाथों द्वारा कोशिकाओं को बाहर निकालना
- ट्राइपएल नामक एक शक्तिशाली एंज़ाइम का उपयोग
- एक्यूटेज़ नामक अपेक्षाकृत सौम्य एंज़ाइम घोल का उपयोग
- पोषण माध्यम की सहायता से हाथों द्वारा कोशिकाओं को बाहर निकालना
- तीनों विधियों से लगभग समान संख्या में टी कोशिकाएँ प्राप्त हुईं, लेकिन एक्यूटेज़ विधि कोशिकाओं की जीवन क्षमता और प्रतिरक्षा से जुड़ी कार्यक्षमता को बनाए रखने में सबसे प्रभावी साबित हुई। एक्यूटेज़ से प्राप्त टी कोशिकाएँ आगे भी स्वस्थ रूप से बढ़ती रहीं और सामान्य टी कोशिकाओं की तरह कार्य करती रहीं। इसके विपरीत, अधिक कठोर विधियों से निकाली गई कोशिकाओं में उन सतही प्रोटीनों को क्षति पहुँची, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय करने के लिए आवश्यक होते हैं।
- कार टी-सेल थेरेपी में सबसे पहले रोगी के शरीर से टी कोशिकाएँ निकाली जाती हैं। इसके बाद प्रयोगशाला में इन्हें इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को बेहतर ढंग से पहचान सकें। फिर इन संशोधित कोशिकाओं की संख्या बढ़ाई जाती है और अंततः इन्हें दोबारा रोगी के शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है। हालाँकि टी कोशिकाओं को विकसित करने की तकनीकों में काफ़ी प्रगति हुई है, लेकिन उन्हें पूरी तरह सुरक्षित, जीवित और कार्यक्षम अवस्था में पुनः प्राप्त करना अब भी एक बड़ी तकनीकी चुनौती बना हुआ है।
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टी कोशिकाओं और कार टी-सेल थेरेपी के बारे में:
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- टी कोशिकाएँ क्या हैं?
- टी कोशिकाएँ श्वेत रक्त कणिकाएँ होती हैं, जिन्हें प्रतिरक्षा प्रणाली की रीढ़ माना जाता है। ये कोशिकाएँ शरीर में लगातार निगरानी करती रहती हैं, असामान्य कोशिकाओं (जैसे कैंसर कोशिकाओं) की पहचान करती हैं और या तो उन्हें सीधे नष्ट करती हैं या अन्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को सक्रिय करती हैं। इसी कारण इम्यूनोथेरेपी में टी कोशिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
- टी कोशिकाएँ श्वेत रक्त कणिकाएँ होती हैं, जिन्हें प्रतिरक्षा प्रणाली की रीढ़ माना जाता है। ये कोशिकाएँ शरीर में लगातार निगरानी करती रहती हैं, असामान्य कोशिकाओं (जैसे कैंसर कोशिकाओं) की पहचान करती हैं और या तो उन्हें सीधे नष्ट करती हैं या अन्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाओं को सक्रिय करती हैं। इसी कारण इम्यूनोथेरेपी में टी कोशिकाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
- कार टी-सेल थेरेपी क्या है?
- कार टी-सेल थेरेपी एक उन्नत उपचार पद्धति है, जिसमें रोगी की अपनी टी कोशिकाओं को इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को अधिक सटीकता और प्रभावशीलता से पहचान सकें और उन पर हमला कर सकें। इस प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
- रोगी के रक्त से टी कोशिकाओं को एकत्र करना
- प्रयोगशाला में टी कोशिकाओं में कार रिसेप्टर से संबंधित जीन को प्रविष्ट कराना
- संशोधित टी कोशिकाओं की संख्या बढ़ाकर उन्हें पुनः रोगी के शरीर में डालना
- रोगी के रक्त से टी कोशिकाओं को एकत्र करना
- विश्व स्तर पर कार टी-सेल थेरेपी को कुछ रक्त कैंसरों (जैसे ल्यूकेमिया और लिम्फोमा) के उपचार के लिए स्वीकृति मिल चुकी है। इस उपचार ने उन रोगियों में भी उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं, जिन पर पारंपरिक उपचार प्रभावी सिद्ध नहीं हुए। हालाँकि यह उपचार अभी भी महँगा है और ठोस ट्यूमर वाले कैंसरों के लिए इस पर शोध जारी है।
- कार टी-सेल थेरेपी एक उन्नत उपचार पद्धति है, जिसमें रोगी की अपनी टी कोशिकाओं को इस प्रकार संशोधित किया जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को अधिक सटीकता और प्रभावशीलता से पहचान सकें और उन पर हमला कर सकें। इस प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:
- टी कोशिकाएँ क्या हैं?
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इम्यूनोथेरेपी में कोशिका पुनः प्राप्ति का महत्व:
केवल टी कोशिकाओं को विकसित करना ही पर्याप्त नहीं है। इम्यूनोथेरेपी की सफलता के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि कोशिकाएँ पुनः प्राप्ति की प्रक्रिया के दौरान जीवित, पूरी तरह क्रियाशील और बिना क्षति के बनी रहें। आईआईटी बॉम्बे के शोध से यह स्पष्ट हुआ है कि एक्यूटेज़ जैसी कोमल विधि से टी कोशिकाओं को सुरक्षित रूप से अलग किया जा सकता है। इससे अधिक स्वस्थ और प्रभावी टी कोशिकाएँ प्राप्त होती हैं, जो इम्यूनोथेरेपी को विश्वसनीय और बड़े स्तर पर लागू करने योग्य बनाती हैं।
निष्कर्ष:
आईआईटी बॉम्बे का यह अध्ययन कैंसर इम्यूनोथेरेपी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण तकनीकी चुनौती “प्रयोगशाला में विकसित टी कोशिकाओं को बिना नुकसान पहुँचाए पुनः प्राप्त करना” का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। यह शोध यह सिद्ध करता है कि पुनः प्राप्ति तकनीकें कोशिकाओं की सेहत और कार्यक्षमता को बनाए रखती हैं। इससे प्रभावी, बड़े पैमाने पर लागू होने योग्य और अधिक किफ़ायती कैंसर उपचार विकसित करने की दिशा में एक मज़बूत आधार तैयार होता है, जो भारत में उन्नत चिकित्सा को अधिक सुलभ बनाने के लक्ष्य को भी सशक्त समर्थन देता है।

