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Blog / 23 May 2026

यूएपीए अधिनियम के तहत जमानत: स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस

यूएपीए अधिनियम के तहत जमानत

संदर्भ:

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ (Larger Bench) के पास भेज दिया है। मामला 2020 दिल्ली दंगा साजिश प्रकरण की सुनवाई के दौरान उठा, जिसमें विभिन्न आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अलग-अलग न्यायिक दृष्टिकोण सामने आए।

मुख्य विवाद क्या है?

UAPA की धारा 43D(5) जमानत पर कठोर प्रतिबंध लगाती है। इसके अनुसार, यदि अदालत को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आरोप सही प्रतीत होते हैं, तो आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती।

जमानत पर दो परस्पर विरोधी न्यायिक दृष्टिकोण:

      • उदार दृष्टिकोण (Liberal View): वर्ष 2021 के केंद्रीय गृह मंत्रालय बनाम के. ए. नजीब मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि:
        • मुकदमे में अत्यधिक देरी अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो सकती है।
        • लंबे समय से जेल में बंद आरोपी को संवैधानिक अदालतें जमानत दे सकती हैं।
        • UAPA की कठोर धाराएँ मौलिक अधिकारों को पूर्णतः समाप्त नहीं कर सकतीं।
        • यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देने वाला माना गया।
      • कठोर दृष्टिकोण (Strict View): जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ ने उमर खालिद एवं शारजील इमाम की जमानत याचिकाएँ खारिज करते हुए कहा कि:
        • राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत अत्यंत सावधानी से दी जानी चाहिए
        • अनुच्छेद 21 का उपयोग ट्रम्प कार्डके रूप में नहीं किया जा सकता
        • केवल मुकदमे में देरी जमानत का स्वतः आधार नहीं बन सकती
        • यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।

Bail under the UAPA Act

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी:

      • अदालत ने स्पष्ट किया कि समान शक्ति वाली दो समन्वय पीठें (Coordinate Benches) एक-दूसरे के निर्णयों की आलोचना नहीं कर सकतीं। यदि किसी निर्णय से असहमति हो, तो उचित प्रक्रिया के तहत मामले को बड़ी पीठ के पास भेजना आवश्यक है।
      • न्यायालय ने यह भी कहा कि के. ए. नजीब का फैसला कोई गणितीय सूत्रनहीं है, जिसके आधार पर हर लंबे समय से बंद आरोपी को स्वतः जमानत मिल जाए। प्रत्येक मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच व्यावहारिक संतुलन आवश्यक है।

महत्व:

सर्वोच्च न्यायालय का यह संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी पीठ निम्न प्रश्नों पर स्पष्टता प्रदान करेगी:

      • UAPA के तहत जमानत की सही कानूनी व्याख्या क्या होगी
      • क्या लंबी अवधि तक कारावास अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है
      • राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए

गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के बारे में:

गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 भारत का प्रमुख आतंकवाद-रोधी कानून है।

मुख्य उद्देश्य:

      • भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा
      • आतंकवाद एवं गैर-कानूनी गतिविधियों की रोकथाम
      • आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध
      • आतंक वित्तपोषण एवं साजिशों को दंडित करना

UAPA की प्रमुख विशेषताएँ:

      • व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने की शक्ति: 2019 के संशोधन के बाद सरकार किसी व्यक्ति को भी आतंकवादी घोषित कर सकती है। पहले यह प्रावधान केवल संगठनों तक सीमित था।
      • जमानत प्राप्त करना अत्यंत कठिन: धारा 43D(5) के अनुसार यदि आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती। इसी कारण UAPA को भारत के सबसे कठोर आपराधिक कानूनों में गिना जाता है।
      • आरोपपत्र दाखिल करने की विस्तारित अवधि: सामान्य कानून के तहत आरोपपत्र 60–90 दिनों में दाखिल करना आवश्यक होता है। परंतु UAPA के तहत जांच अवधि 180 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है। इससे मुकदमे से पहले लंबी हिरासत संभव हो जाती है।

निष्कर्ष:

यह मामला भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच मौजूद संवैधानिक संतुलन को रेखांकित करता है। बड़ी पीठ का निर्णय UAPA के तहत जमानत से जुड़े कानूनों में स्पष्टता, एकरूपता और भविष्य की न्यायिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

 

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