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Blog / 26 May 2026

असम समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक

संदर्भ:

हाल ही में असम सरकार ने एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code - UCC) विधेयक प्रस्तुत किया है, जिसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार तथा लिव-इन संबंधों से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता लाना है। यह विधेयक असम के सभी निवासियों के लिए एक समान कानूनी ढाँचा तैयार करने का प्रयास करता है। हालांकि, इसमें अनुसूचित जनजातियों को छूट दी गई है, जो राज्य की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

विधेयक का उद्देश्य:

असम UCC विधेयक का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों को नियंत्रित करने के लिए एक समान व्यवस्था स्थापित करना है। इसके अंतर्गत विवाह और तलाक के नियमों का मानकीकरण, लिव-इन संबंधों का विनियमन तथा एक समान उत्तराधिकार व्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, यह विधेयक राज्य के भीतर तथा राज्य से बाहर रहने वाले असम के सभी निवासियों के लिए कानूनी एकरूपता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।

Assam UCC Bill

प्रमुख प्रावधान:

      • विवाह संबंधी प्रावधान: विधेयक के अनुसार पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तथा महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है। विवाह के लिए स्वतंत्र सहमति अनिवार्य होगी और किसी प्रकार के दबाव, धोखाधड़ी या मिथ्या प्रस्तुति को मान्य नहीं माना जाएगा। विधेयक 37 निषिद्ध संबंधों (जिसमें प्रथम चचेरे संबंध भी शामिल हैं) के भीतर विवाह पर प्रतिबंध लगाता है। सभी विवाहों का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण अनिवार्य होगा, चाहे विवाह असम के बाहर ही क्यों न संपन्न हुआ हो। विवाह संबंधी अभिलेख सार्वजनिक निरीक्षण हेतु खुले रहेंगे।
      • तलाक संबंधी प्रावधान: विधेयक एक समान तलाक व्यवस्था लागू करता है, जिसके अंतर्गत न्यायालय के आदेश के 60 दिनों के भीतर तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा। तलाक के मान्य आधारों में क्रूरता, परित्याग तथा आपसी सहमति शामिल हैं। इसका उद्देश्य विभिन्न समुदायों में तलाक संबंधी प्रक्रियाओं का मानकीकरण करना है।
      • लिव-इन संबंधों का विनियमन: विधेयक लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान करता है, जिसमें राज्य से बाहर रहने वाले असम के निवासी भी शामिल होंगे। संबंध समाप्त होने पर उसका पंजीकरण भी आवश्यक होगा। निम्न परिस्थितियों में पंजीकरण अस्वीकार किया जाएगा:
        • यदि कोई पक्ष अल्पवयस्क हो
        • यदि कोई पक्ष पहले से विवाहित हो
        • यदि संबंध निषिद्ध श्रेणी में आता हो
        • यदि सहमति वैध न हो
      • दंडात्मक प्रावधान:
        • पंजीकरण न कराने पर : 3 माह तक का कारावास या ₹10,000 तक का जुर्माना या दोनों
        • सरकारी नोटिस के बाद भी नियमों का पालन न करने पर : 6 माह तक का कारावास या ₹25,000 तक का जुर्माना या दोनों
        • विधेयक परित्यक्त महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार भी प्रदान करता है तथा ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना गया है।
      • उत्तराधिकार और संपत्ति: विधेयक बिना वसीयत (Intestate Succession) की स्थिति में एक समान तथा लैंगिक-तटस्थ उत्तराधिकार व्यवस्था लागू करता है। श्रेणी-I उत्तराधिकारियों में पति/पत्नी, संतान तथा माता-पिता शामिल होंगे। इसका उद्देश्य उत्तराधिकार विवादों को सरल बनाना और विभिन्न समुदायों में समानता सुनिश्चित करना है।

समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में:

      • समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में किया गया है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) का हिस्सा है। इसका उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और संपत्ति से संबंधित एक समान व्यक्तिगत कानून लागू करना है।
      • वर्तमान में भारत में धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानून लागू हैं, हालांकि उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों ने UCC से संबंधित व्यवस्थाओं की शुरुआत की है। UCC का उद्देश्य समानता, लैंगिक न्याय तथा राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना है, किन्तु धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक विविधता से जुड़ी चिंताओं के कारण इसकी आलोचना भी की जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय:

      • सरला मुद्गल मामला (1995): सरला मुद्गल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने बहुविवाह के लिए धार्मिक परिवर्तन के दुरुपयोग को रोकने हेतु समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर बल दिया।
      • शायरा बानो मामला (2017): शायरा बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करते हुए लैंगिक न्याय और समानता को भेदभावपूर्ण व्यक्तिगत कानूनों से ऊपर प्राथमिकता दी।

निष्कर्ष:

असम UCC विधेयक व्यक्तिगत कानूनों में कानूनी एकरूपता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह समानता, स्पष्टता तथा पारिवारिक कानूनों के आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास करता है, किन्तु साथ ही निजता, विविधता और संवैधानिक संतुलन से जुड़ी महत्वपूर्ण बहसों को भी जन्म देता है। इसका भविष्य भारत में समान नागरिक संहिता पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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